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لعمـرك
إن
دمـع
العيـن
جار
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لأنـي
حنظـل
التفريـق
جـارع
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ومـا
لي
غير
شهد
الوصل
شاف
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فهل
لي
في
اجتناء
منه
شافع
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وقلـبي
للوصـول
إليـك
صـاد
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ونظمـي
بالثنـاء
عليك
صادع
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وهمــي
ليثـه
الفتـاك
ضـار
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ولــولاه
لمـا
أمسـيت
ضـارع
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ولـوني
أصـفر
والـدمع
قـان
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وطرفـي
منكـم
بـالطيف
قانع
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ومـذ
غبتـم
فصـبحي
شبه
قار
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لــدي
واصـبعي
للسـن
قـارع
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وإنــي
للتواصــل
منـك
راج
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فهل
ذاك
الزمان
العذب
راجع
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وإنــي
بالــذي
تهـواه
راضٍ
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أيـا
مـولى
لدر
الفضل
راضع
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فيالـك
مـن
كريـم
الأصل
سام
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لهمـس
المجتـدين
نداه
سامع
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هزبـر
عنـه
سـيف
الضـد
ناب
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وينبـوع
الفضـائل
منه
نابع
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وطـرف
الخـائف
المذعور
ساج
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بمغنـاه
وطيـر
المـدح
ساجع
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وبحــر
علـومه
للنـاس
طـام
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فكــل
منهــم
بـالري
طـامع
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وغيـث
نـداه
طول
الدهر
هام
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وغيـث
الافق
بعض
العام
هامع
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ومعشـره
أولـوا
سـلم
وضـال
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لـديهم
سـابق
الكرماء
ضالع
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لـه
سـيف
غـداة
الحـرب
دام
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وطـرف
خشـية
الجبـار
دامـع
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ونسـك
مـن
ريـاء
الخدع
خال
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وطبــع
للخلاعــة
راح
خـالع
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وشــعر
رائق
كشــراب
جــام
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لحسـن
نفـايس
الأشـعار
جامع
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وقلـب
قلـب
فـي
الحـرب
ساط
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ووجـه
فـي
ظلام
الخطـب
ساطع
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وإحســان
لحـر
الـدمع
شـار
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ورمـح
عزيمـة
مـا
زال
شارع
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حليـم
للعـدى
بالصـفح
جـاز
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ومـن
هول
الحوادث
غير
جازع
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وزاك
علمــه
للجهــل
نــاف
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وطــب
ان
يضـرك
فهـو
نـافع
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وشـهم
مـاله
فـي
الناس
زار
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لحـب
هـواه
في
الأحشاء
زارع
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لمـا
لا
يرتضـيه
اللـه
قـال
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ألـم
تـره
لضـرس
هواه
قالع
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وقـاه
اللَـه
نظـرة
كـل
راء
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فــإن
جمـاله
بالعقـل
رائع
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