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مـا
أنـس
لا
أنـس
أيامـاً
نعمت
بها
|
فــي
ظلــه
وكلانــا
ضـاحك
الجـذل
|
|
وقـــوله
لـــي
فــي
دل
ومعتبــة
|
وقـد
رآنـي
عـن
السـمار
فـي
شـغل
|
|
يـا
قاتـل
اللَه
وسواس
الغرام
وما
|
كسـاك
مـن
صـنعة
الأشـجان
والغلـل
|
|
أنصـب
حبائلـك
اللاتـي
عرفـت
بهـا
|
فــإن
شــعرك
ســحر
نافـذ
العمـل
|
|
مــاذا
تريـد
بـأطراق
وقـد
ضـحكت
|
وجــوه
ليلتنــا
علـى
غـرة
الأمـل
|
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هـذا
الشـراب
وهـذي
الكـأس
مترعة
|
فاشـرب
وهـات
اسـقنيها
غير
محتفل
|
|
أمـا
نهيتـك
عـن
هـذا
أمـا
وأبـى
|
لأوســعنك
تأديبــاً
علــى
الزلــل
|
|
نفسـي
فـداؤك
مـن
جـاف
كلفـت
بـه
|
ســقاني
الشـهد
فـي
أيامنـا
الأول
|
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وليلـــة
كظلام
اليـــأس
طاخيـــة
|
بلا
نجــــوم
ولا
بـــدر
ولا
شـــعل
|
|
مضــيت
فيــه
إليــه
غيــر
مـتئد
|
يحـدوني
الشـوق
حـدوا
غير
ذي
مهل
|
|
وقلــت
إنــي
ضــيف
لا
يريـد
قـرى
|
ألا
الحــديث
ومـا
أنتـم
ذوي
بخـل
|
|
وظلـــت
أروي
خرافـــات
وأســمعه
|
حــديث
قلــبي
منحــولاً
إلـى
الأول
|
|
وســرني
أننــي
فيمــا
رويـت
لـه
|
عنهـم
أقـول
لـه
فـي
غيـر
ما
وجل
|
|
إنــي
أحبــك
حبــا
طاغيـاً
فزعـاً
|
عفّـاً
ومـالي
بهـذا
الحـب
مـن
قبل
|
|
وليــس
قــدماً
ولا
غــراً
فاخــدعه
|
لكـن
نصـيباه
مـن
فهـم
ومـن
خجـل
|
|
فقــال
ويحــك
إمــا
أنـت
مختبـل
|
أو
أنـت
تلهـو
أصـناف
مـن
الخطـل
|
|
فقلـت
لـم
تخـط
بـي
خبـل
وبي
عبث
|
ممـا
دهـاني
مـن
الأوجـاع
والعلـل
|
|
وفــي
الفـؤاد
ضـرام
لا
دخـان
لـه
|
وأخبـث
النـار
مـا
تخفي
عن
المقل
|
|
وفــي
العــروق
سـمو
لا
طيـب
لهـا
|
وفــي
المحـاجر
دمـع
غيـر
منهمـل
|
|
فلا
يغرنــك
ضــحكي
حيــن
تبصـرني
|
فــذاك
ســخر
فــؤاد
ضـيق
الحيـل
|
|
والمـرء
يضـحك
مـن
يـأس
ومـن
جذل
|
وقـد
ترى
الوشي
في
الأكفان
والحلل
|
|
كـم
هـم
قلـبي
بإفصـاح
ولـم
يقـل
|
وهــم
دمعــي
بتســكاب
ولـم
يسـل
|
|
صـب
الزمـان
بقلـبي
النـار
سائلة
|
وجـف
دمعـي
فيهـا
لهفي
على
البلل
|
|
فـإن
تطـق
فاسـل
دمعـاً
شـقيت
بـه
|
إن
الشـفاء
مسـيل
المـدمع
الخضـل
|
|
فلــم
يطــق
وبكـى
عنـي
فـواحزني
|
ليـت
الـذي
سـح
من
عينيه
يقسم
لي
|
|
إنــي
لأذكــر
يومــاً
صـالحاً
معـه
|
مـا
زلـت
مـن
حسنه
كالشارب
الثمل
|
|
والشــمس
جانحــة
حــتى
لتحسـبها
|
لاذت
أمــام
جيـوش
الليـل
بالجفـل
|
|
والنيـل
يجـري
كمـا
نجري
لغايتنا
|
وكـل
شـيءٍ
مـن
الـدنيا
إلـى
أجـل
|
|
فقــال
بعــد
ســكوت
خفـت
روعتـه
|
أنظـر
إلـى
الشمس
في
ثوب
من
الأصل
|
|
فقلــت
ألهــو
بــه
والجـد
متبـة
|
وأحسـن
القـول
مـا
ألهى
عن
الملل
|
|
لقـد
سـبت
قبلـك
الشمس
التي
غربت
|
رب
البحــار
ذوات
الغـارب
الزجـل
|
|
ألســت
تعلــم
أن
الشــمس
زوجتـه
|
تبغيـه
تحـت
سـتار
الليـل
والطفل
|
|
فقــال
لا
تهـذ
يـا
هـذا
لتضـحكنا
|
لقــد
عرتــك
وربـي
لوثـة
الـدخل
|
|
أمــا
تــزال
فـتى
العقـل
طائشـه
|
كهـل
المجانـة
وثابـاً
إلـى
الخبل
|
|
أمــا
يجــل
حــديث
عــن
مهازلـة
|
ولا
يــدرك
عنهــا
قحمــة
العقــل
|
|
فقلـت
واللَـه
مـا
إن
افـترى
كذباً
|
لكنمـا
أنـت
فـي
ليـل
مـن
الجهـل
|
|
سـل
عنهمـا
صادة
الأسماك
هل
سمعوا
|
فـي
فحمـة
الليـل
مثلي
رنة
القبل
|
|
وربمـــا
هــاجه
صــيفاً
تلكؤهــا
|
فـأمطر
السـخط
شـؤبوبا
مـن
العذل
|
|
وظلــت
أضــحك
منـه
وهـو
ينهرنـي
|
حتى
انقضى
الليل
لم
يقصر
ولم
يطل
|
|
ليـت
المحـبين
مثـل
الشـمس
كلهـم
|
قد
زوجوا
النار
ماء
القرب
والغزل
|
|
ويــوم
قلــت
لــه
والسـن
ضـاحكة
|
والعيـن
شاخصـة
والقلـب
فـي
ثكـل
|
|
أزمعــت
عنــك
رحيلاً
لا
أيــاب
لـه
|
فقــال
بـل
أنـت
ظـلٌّ
غيـر
منتقـل
|
|
فقلــت
بشــرى
ولكنــي
علـى
سـفر
|
مـن
ذا
أقـام
كنجـم
القطب
لم
يحل
|
|
فقـال
ألشـام
قلـت
الشـام
فاتنـةٌ
|
جناتهــا
وســماء
الأعيــن
النجـل
|
|
لكننــي
لســت
طياشــاً
ولا
رهقــا
|
ولسـت
أحسـن
لعـن
الـدين
والملـل
|
|
فقــال
بئس
لعمـري
أنـت
مـن
دعـب
|
فـي
كـل
أمر
وبئس
الخلق
في
الرجل
|
|
فقلــت
ويحــي
إنــي
لا
أريـد
ردى
|
لكــن
حيــاة
وإنـي
لسـت
بالبطـل
|
|
وفــي
الشـآم
لحـاظ
لا
أمـان
لهـا
|
يحوطهــا
كــل
مقـدام
علـى
الأجـل
|
|
لكــن
تأمـل
نجـوم
الليـل
قاطبـةً
|
وأيــن
نجمــي
بـي
الأنجـم
الحلـل
|
|
أظنــه
ضــل
بيــن
الشـهب
غـايته
|
مثلـي
على
الأرض
بين
الوهد
والقلل
|
|
يـا
معرضـاً
أنت
نجمي
غبت
عن
نظري
|
ومــا
ضــللت
ولكـن
شـيمة
الملـل
|
|
وأنــت
فـي
العيـن
أنـوارٌ
ملمعـة
|
وأنـت
في
القلب
برد
العارض
الهطل
|
|
وأنــت
تـاج
خلـود
لـي
أتيـه
بـه
|
وقـد
غنيـت
عـن
النسـرين
والنفـل
|
|
وأنــت
بالليـل
حلـم
غيـر
منقطـع
|
وأنـت
فـي
الصـبح
عـزم
غيـر
متصل
|
|
وأنـت
جبريـل
تـوحي
لـي
وأنظم
ما
|
تــوحيه
مـن
غـرر
الآيـات
والجمـل
|
|
وأنـت
فينـا
نـبي
الحسـن
لا
كـذبا
|
وللهــو
مرســل
مـن
أفصـح
الرسـل
|
|
إن
كنـت
فكـرت
فـي
هجـر
وفـي
بعد
|
فـأنت
فـي
القلـب
ثـاوٍ
غير
مرتحل
|
|
لا
يخـــدعنك
حســـن
أنــت
لابســه
|
فلابـس
الحلـى
فـي
الدنيا
إلى
عطل
|
|
يـا
زهـرة
الحسـن
لا
يخدعك
رونقها
|
إن
الربيــع
قصـير
العمـر
والأجـل
|
|
إن
النـدى
لحيـاة
الزهـر
يضـر
به
|
والحـب
للحسـن
طلّـق
ليـس
بالوشـل
|
|
فصــن
جمالـك
إمـا
شـئت
فـي
كلـلٍ
|
وادفنـه
إن
شـئت
في
قبر
من
الجهل
|
|
ليـس
اختيـاراً
رضـانا
مـا
يكلفنا
|
صــرف
الغــرام
تكـثر
مـن
العـذل
|