|
بعــض
بغضــائكم
أولـى
البغضـاء
|
إنمـــا
الشــم
شــيمة
الســفاء
|
|
ليــس
يشــفى
السـباب
غـل
حسـود
|
قــد
طـووى
صـدره
علـى
الشـحناء
|
|
إن
داء
القلــــوب
داءٌ
عيــــاء
|
مثـــل
داء
المنـــون
للأحيـــاء
|
|
فاسـتر
الضـغن
إن
تشـأ
أو
فجاهر
|
قـــد
عرفنــاك
فاســد
الأهــواء
|
|
أنــت
كالــذئب
خـدن
غـدر
ولـؤم
|
ليـس
للـذئب
فـي
الـورى
من
وفاء
|
|
مــا
رأينــاك
بالإخــاء
خليقــاً
|
ورأينــاك
أهــل
هــذا
الجفــاء
|
|
قــد
تكلفــت
أن
أعــارض
طبعــي
|
وأجاريـــك
مــرة
فــي
الهجــاء
|
|
فرأيـــت
الكريــم
يعجــز
عنــه
|
عجــز
بــرد
الشـتاء
عـن
أدفـاء
|
|
ورأيـــت
الهجــاء
يرفــع
منــك
|
إن
ذم
الوضـــــيع
كـــــالإطراء
|
|
مــا
يبلــى
مســتهتكٌ
نلـت
منـه
|
أم
عليـــه
وقفـــت
كــل
ثنــاء
|
|
لا
تغـــض
العيـــوب
طــرف
بغــي
|
نشــــأت
بيــــن
بيئة
شـــنعاء
|
|
كيـف
ينـدى
جـبين
مـن
غـاض
منـه
|
كـــل
مــاء
وغــار
كــل
حيــاء
|
|
رب
قـولٍ
لـو
كـان
فـي
الصـم
بضت
|
لــم
يــؤثر
فـي
أنفـس
اللؤمـاء
|
|
ومقـــال
تســـوخ
منـــه
جبــالٌ
|
عــاد
كالسـيف
نابيـاً
عـن
مضـاء
|
|
يــا
حمــاة
الآداب
نمتـم
طـويلاً
|
نومــــة
نبهـــت
جيـــوش
البلاء
|
|
مـن
لسـتر
الحيـاء
يهتكـه
الغـر
|
ويفـــري
فـــي
جــوفه
كالــداء
|
|
مـن
لـوجه
الأحسـاب
يخدشـه
الغـر
|
وينعـــى
بالخدشـــة
النكـــراء
|
|
ولقلـــب
الأخلاق
يطعنـــه
الغــر
|
ويجـــــري
دمــــاء
كالمــــاء
|
|
ولــــروض
الآداب
جـــف
وأمســـى
|
ظــاهر
الجــدب
لابسـاً
مـن
عفـاء
|
|
ذهــب
الــود
والحيــاء
جميعــاً
|
لهــف
أرضــي
عليهمــا
وســمائي
|
|
وتبـــدلت
مـــن
رجـــال
وفــاء
|
كــل
غــر
ممــاذق
فــي
الوفـاء
|
|
يتلقـــاك
بالطلاقـــة
والبشـــر
|
وفـــي
قلبـــه
قطــوب
العــداء
|
|
كالسـراب
الرقـراق
يحسـبه
الظمآ
|
ن
مـــاء
ومــا
بــه
مــن
مــاء
|
|
عــاجز
الـرأي
والمـروءة
والنـف
|
س
ضــــئيل
الآمـــال
والأهـــواء
|
|
ألـــف
الــذل
فاســتنام
إليــه
|
وتبـــاهى
بــه
علــى
الشــرفاء
|
|
ينســج
الــزور
والأباطيـل
نسـجاً
|
والأكـــاذيب
ملجـــأ
الضـــعفاء
|
|
لــو
تـراه
بالليـل
يخطـر
عجبـاً
|
فــي
مســوك
الفرنجــة
السـوداء
|
|
قلــت
قــردٌ
منــآل
درويـن
نـاشٍ
|
أخـــذت
منــه
ســورة
الصــهباء
|
|
مســتميت
إلــى
المكاسـب
والـرب
|
ح
دنــــئ
الأســـف
والكبريـــاء
|
|
فاســق
يظهــر
العفــاف
ويخفــي
|
تحتـه
الخـزي
يـا
لـه
مـن
مـراء
|
|
مظلــم
الحــس
والبصـيرة
كـالتم
|
ثــال
خلـو
مـن
الحجـا
والـذكاء
|
|
قـد
زهـاه
الشـموخ
فاختـال
تيهاً
|
ولـــوى
شــدقه
علــى
الخلصــاء
|
|
وعـــدا
طــوره
فــأركبه
الجــه
|
ل
جموحــاً
ألقتــه
فــي
عوصــاء
|
|
فغـدا
كالحمـار
أو
همـه
الشـيطا
|
ن
أمــــراً
فصــــار
مـــن
خيلاء
|
|
هـو
حمـى
الجليـس
يـدفع
في
الصد
|
ر
ثقيـــــل
الكلام
والإيمـــــاء
|
|
أعجمـــي
اللســـان
فـــةٌّ
عيــيٌّ
|
يـــدعي
أنـــه
مـــن
الفصــحاء
|
|
يملأ
الســمع
والقلــوب
كمـا
يـز
|
عــم
رطــب
اللســان
عـذب
الأداء
|
|
يـا
قطيـع
اللسـان
مالـك
والشـع
|
ر
وصـــوغ
الكلام
جـــم
العنــاء
|
|
أنـت
فـي
الأرض
نقمـة
اللَـه
للنا
|
س
جميعـــاً
قريبهـــم
والنــائي
|
|
قـد
لعمـري
نكبـت
عـن
جـدد
الرش
|
د
وأوغلــت
فــي
شــعاب
الريـاء
|
|
أنـت
فـي
الزهـو
والسـفاة
واللؤ
|
م
عـــديم
المثـــال
دون
مــراء
|
|
لــو
علـى
قـدر
بطـء
حسـك
يومـاً
|
كنــت
كيســاً
ذا
أربــة
وذكــاء
|
|
لبلغــت
السـنام
مـن
قلـل
المـج
|
د
وجـــاوزت
رتبـــة
الأنبيـــاء
|
|
ضــج
مــن
لؤمـك
الخلائق
فـي
الأر
|
ض
وعـاذوا
مـن
شـره
فـي
السـماء
|
|
صــار
إبليــس
عنــد
ربـك
مقبـو
|
لاً
وقــد
كـان
قبـل
فـي
الأشـقياء
|
|
عششـت
اللـؤم
فـي
فـؤادك
وارتـا
|
ش
فيارحمــــة
علـــى
الأحيـــاء
|
|
لا
أقـال
الإلـه
مـن
خـانني
الغيب
|
وجـــازى
الحفـــاظ
شــر
جــزاء
|
|
ظــن
أنــي
علــى
التحلــم
مـاضٍ
|
فمضـــى
ضـــلةً
علــى
الغلــواء
|
|
وغلا
فــي
الضــلال
فاشـتبه
الأمـر
|
عليـــه
وبـــات
فـــي
عشـــواء
|
|
وأراه
الغـــرور
أنـــا
ســـواءٌ
|
فتبـــاهى
وليــس
مــن
نظــرائي
|
|
كيــف
تعطــو
وليــس
عنـدك
نـوطٌ
|
وتســامى
وأنــت
فــي
البوغــاء
|
|
أســـفاً
للعقــول
ضــلت
وزاغــت
|
عـن
سـبيل
الهـدى
ووضـح
السـواء
|
|
كنــت
فـي
ظلنـا
الوريـف
مقيمـاً
|
آمـــن
البـــال
وأدع
الأحشـــاء
|
|
فاسـتثرت
المنسـي
من
فارط
الذنب
|
وأوغــــرت
صـــدرنا
بالبـــذاء
|
|
أنــت
أســخطتنا
عليــك
فخلنــا
|
عنــك
لمــا
جهلـت
وجـه
الرضـاء
|
|
أنــت
وثبتنــا
عليـك
وقـد
كنـت
|
مـــوقى
علـــى
غـــرة
ورخـــاء
|
|
أنــت
ضــاغنتنا
وخشــنت
صــدرا
|
كــان
يحنـو
عليـك
فـي
البأسـاء
|
|
أنــت
قطعــت
حبــل
خلـك
بالغـد
|
ر
وأيبـــس
ثــدي
هــذا
الإخــاء
|
|
أنــت
ناوأتنـا
وعلمتهـا
الثلـب
|
فرشـــنا
لكــم
ســهام
الهجــاء
|
|
حــزت
ذمــي
وللريــاح
السـوافي
|
مثـــل
ذم
الـــتراب
والحصــباء
|
|
لا
يغرنــك
مــا
تـرى
مـن
أنـاتي
|
واحتبـــائي
بــالحلم
والأغضــاء
|
|
ربمـا
اسـتنزل
الحليـم
عن
الرفق
|
وثــــارت
ســــكينة
الحكمـــاء
|
|
قـد
أذقنـاك
حيـن
أصـفيتنا
الود
|
وفــاءً
أعــذب
بــه
مــن
وفــاء
|
|
كـــان
ودي
مصــفقاً
لــم
أعــره
|
برنـــقٍ
مــن
القلــى
والريــاء
|
|
ولقـد
أينـع
الـوداد
علـى
الأيـا
|
م
واستحصـــفت
حبـــال
الإخـــاء
|
|
كـم
ركضـنا
إلـى
المسـرة
واللهو
|
برغــــم
الهمـــوم
والبرحـــاء
|
|
واغتبقنلا
الشـراب
حـتى
اصـطبحنا
|
لـــم
نشعشــع
صــراحه
بالمــاء
|
|
لـم
أطـع
فيـك
واشياً
يزرع
الحقد
|
ويجنــي
ثمــاره
فــي
الخلفــاء
|
|
ضـــمنا
عــاطف
المــودة
دهــراً
|
وافترقنـا
علـى
القلـى
والجفـاء
|
|
فلــك
اليـوم
فـي
المحافـل
ذمـي
|
ولماضـــيك
عنفـــوان
الثنـــاء
|
|
لسـت
أبكـي
علـى
فراقـك
مـا
عشت
|
فـــإن
البكــا
علــى
الأوفيــاء
|
|
لـن
تـرى
البين
فاجعي
أبد
الدهر
|
فمــــا
كــــل
خلـــة
بســـواء
|
|
كـان
شـأني
الحفـاظ
والرعي
فالآ
|
ن
أرى
الرعــــي
أعظـــم
الأرزاء
|
|
فيــك
أبصــرت
كيـف
يكـدر
صـفوي
|
بصــــنوف
الأكـــدار
والأقـــذاء
|
|
كنــت
أرجــوك
للزمـان
فـأنت
ال
|
يـوم
دائي
فـي
البعـد
منك
شفائي
|
|
رب
قـــرب
أضـــى
إلـــى
بضــرا
|
ء
وبعيــدٍ
أفضــى
إلــى
السـراء
|
|
طبـت
نفسـاً
عـن
ذكركم
وشفا
السل
|
وان
قلــبي
مــن
لاعـج
العـررواء
|
|
كنـت
بالـذكر
بيـن
عينـي
وقلـبي
|
فجررنــا
عليــك
ذيــل
العفــاء
|
|
قــد
كبـا
بيننـا
لـوداد
فلا
قـا
|
م
وغــص
الهــوى
بمــاء
الهجـاء
|
|
خلـــت
جهلاً
أن
الفـــؤاد
هــواءٌ
|
ليـــس
يصــميه
كــثرة
الإيــذاء
|
|
لا
أرتنـي
الأيـام
وجهـك
مـا
عشـت
|
ولا
قربــــت
بعــــد
الثنـــائي
|
|
وتنــائي
الــدارين
خيـرٌ
وأحـرى
|
مــن
تــدانيهما
علــى
البغضـاء
|
|
قـد
مضـينا
كمـا
مضـيت
ومـا
دمت
|
ودمنــا
فمــا
لنــا
مــن
إخـاء
|
|
لـن
ترانـي
بالبـاب
بابـك
استغز
|
ر
فيــــض
الدجنـــة
الوطفـــاء
|
|
أقــرع
الســن
نادمـاً
وأذم
الـد
|
دهـــر
ذمّـــاً
ولات
حيــن
عــزاء
|
|
عــل
مــاء
الشـؤون
يطفـئ
نـاراً
|
قـــد
أذابــت
لقــائف
الأحشــاء
|
|
واقفــاً
أنــدب
اعتــدال
زمــانٍ
|
طــال
فيـه
بيـن
الكـرام
ثـوائي
|
|
بيـن
أهـل
الليـان
والخلق
انسكب
|
الشـــأبيب
والحجـــا
والــذكاء
|
|
حيـث
عـز
الوقـار
والجانب
السهل
|
وذلــــت
طيــــرورة
الضرســـاء
|
|
يا
خليلي
قد
صرت
جلداً
على
الهجر
|
مــتين
العــرى
وســيع
الفنــاء
|
|
ولئن
قـــدر
الزمــان
اجتماعــا
|
فبكرهــــي
يكـــون
لا
برضـــائي
|
|
بـــأبي
أنـــت
أنــت
أول
ألــفٍ
|
ردنـــي
مـــن
بلابلــي
للعــراء
|
|
كنــت
لا
أملــك
الـدمو
فقـد
صـر
|
ت
ألاقـــي
النـــوى
بالاســتهزاء
|
|
حبــذا
أنــت
غيــر
أنــك
تبغـي
|
أن
تـداني
أهـل
السـنى
والسـناء
|
|
تلـــك
أحلام
نـــائم
وأحـــاديثٌ
|
لمستمســــكٍ
بحــــب
الهبــــاء
|
|
وغــبي
الأنــام
مـن
ظـن
أن
الـز
|
رع
يركــو
فـي
التربـة
المظمـاء
|
|
كـال
مـا
ضـيك
قـد
وسـعت
بحلمـي
|
غيــر
مــا
جئت
ليلــة
الأربعـاء
|
|
قضـــى
الأمـــر
بيننـــا
فســلامٌ
|
وســقى
اللَــه
عهــد
ذاك
الإخـاء
|