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ذكـر
الـديار
فخـاض
فـي
عبراته
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يتنفّــس
الصــعداء
مـن
زفراتـه
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مســتغرَم
لــو
شـُق
عـن
كلكـاله
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لتلهّـــب
الثقلان
مــن
جمراتــه
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كتـــم
الأســى
لكنمــا
أيــامه
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حسـرت
قنـاع
الصـبر
عـن
حسراته
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القتـه
فـي
تيـه
اغتراب
قد
مضى
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بشــبابه
وقضــى
بفــلّ
شــبانه
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ورمتـه
فـي
محـن
تحـط
النجم
من
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أبراجــه
والبــدر
مــن
هـالاته
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متغلغلاً
فــي
الأرض
بيــن
مجاهـل
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جهـل
الغـراب
بهـا
طريـق
نجاته
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متنقلاً
مــــن
قريـــة
لِقُرَّيـــةٍ
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فيهـا
حيـاة
المـرء
مثـل
مماته
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يتكلـف
الصـبر
الجميـل
بها
على
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فقــد
الخليـل
وثـمّ
سـُمّ
حيـاته
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وتَحمّـــلُ
الأرواح
عشــرة
ضــدّها
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مستصــعب
كــالموت
فـي
سـكراته
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وامـرّ
مـا
يلقى
الفتى
ان
يُبتلى
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بالبعــد
عــن
أشـكاله
ولِـداته
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يبكــي
علــى
زمـن
قضـاه
لاهيـاً
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مـا
بيـن
ريـم
المنحنـى
ومهاته
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أيـام
كـان
العيـش
غضـّا
والصفا
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روضـاً
يعيـش
الميّـت
مـن
نفحاته
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تقتـاده
الفتيـات
فـي
لفتاتهـا
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ويــذوده
الغمّــاز
فـي
لحظـاته
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فـإذا
تغـزّل
فـي
معـاني
حسـنها
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أو
حســنه
فالسـحر
فـي
نفثـاته
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وإذا
تخلّـص
فـي
مديح
أبي
الهدى
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تتفّجــر
الأنــوار
مــن
أبيـاته
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ذاك
الـذي
سـطعت
على
أوج
العلى
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أضــواء
غُرتــه
وشــُهب
صــفاته
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مــن
آل
بيــت
احمـديّ
لـم
تـزل
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تتفــاخر
الأشــراف
فـي
سـاداتِهِ
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رفعـت
لـه
ذمـم
الرفـاعي
منزلاً
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في
المجد
يهوى
النجم
عن
شرفاته
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فرقــان
ديـن
كـل
علـم
أو
تقـى
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يســتمنح
الاشــراق
مــن
آيـاته
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يختـــص
وارده
بصـــفو
ســريرة
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ويفــوز
بـالتوفيق
فـي
طاعـاته
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قـد
طـار
فـي
الأقطـار
صيت
علائه
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واسـتغرق
الـدنيا
نـدى
راحـاته
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يُنشـي
الطلاقـة
فـي
وجـوه
وفوده
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حــتى
كـأن
الحسـن
مـن
حسـناته
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وكــأن
أيــام
الضــيافة
عنـده
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عصـر
الشـبيبة
عـاد
بـع
فـواتِهِ
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يرتــاد
قاصــده
حمــاه
واثقـاً
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مــن
فضــله
بنــوال
أمنيــاته
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وإذا
اسـتماح
العفـو
منـه
مقّصر
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مثلــي
جــزاه
بحلمــه
وأنـاته
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مـولاي
يـا
صـدر
الصـدور
وتاجها
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وعظيــم
أبطـال
الحمـى
وحمـاته
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بأبيـك
مولانـا
أبـي
البركات
مَن
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تحيـى
لنـا
الآمـال
فـي
بركـاته
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وبشـيخك
المهـديّ
مصـباح
الهـدى
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مَـن
يسـتمدّ
البـدر
مـن
مشـكاته
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وبجـدك
العـالي
أبي
العلمين
مَن
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تتــدفق
الخيــرات
فـي
سـاحاته
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جـد
بـالمراحم
لـي
كمـا
عودتني
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فــالغيث
لا
ينكــف
عـن
عـاداته
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واغفـر
قصـور
فـتى
وهـت
أفكاره
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ممــا
رمـاه
الـدهر
فـي
ويلاتـه
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ألقـاه
فـي
بصر
الحرير
وما
رأى
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بلـداً
أنـاخ
بهـا
الخراب
كهاته
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أبياتهــا
مثـل
القبـور
كأنمـا
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اخنـى
عليهـا
الـدهر
في
نكباته
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وشــتاؤها
غَــرق
واهـون
صـيفها
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حُـرَق
تحـاكي
الجمـر
فـي
لهباته
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اوطنتُهــا
سـنتين
لـم
أحسـبهما
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فــي
العمــر
إلّا
غمـزة
بقنـاته
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حـتى
سـئمت
وقـد
تضـاءل
بالضنى
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جســدي
ونـال
الهـم
مـن
همـاته
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وتركتهــا
مسـتعفياً
عـن
حكمهـا
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ولقـد
يُعـاف
الـورد
عنـد
قذاته
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وسـعيت
نحـو
رحـاب
عـزّك
اشـتكي
|
ضـيم
الزمـان
إلـى
اجـلّ
أُبـاته
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