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لـك
الهنـاءُ
بنيـل
المجـد
والنعمِ
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يـا
مـن
يقـال
علـى
أقـوالهِ
نعـمِ
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أولاك
ولاك
اجلالاً
ومكرمـــــــــــةً
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فكنـت
بيـن
الـورى
كالمفرد
العلمِ
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إن
أجـدب
النـاس
والأنـواءُ
ماسـكةٌ
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فجــود
كفيـك
يغنينـا
عـن
الـديمِ
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جـاد
الإلـه
علـى
هـذا
الزمان
بكم
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حــتى
تفـاخر
أهـل
الأعصـر
القـدمِ
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وإن
يكـن
بـالغ
المـدّاح
فـي
سـلفٍ
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لكـــن
فيـــك
خلالاً
فــوق
مــدحهمِ
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فكلمــا
كــرّرت
عيــنٌ
بكـم
نظـراً
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رأت
مـن
الحسـن
معنـى
قبل
لم
يُشمِ
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تبـدي
ابتسـاماً
بما
توليهِ
من
نعمٍ
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فيالهــا
نعمــاً
مـن
خيـر
مبتسـمِ
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تســقي
يمينـك
للأحبـاب
غيـث
نـدى
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وللرمــاح
مــن
الأعــداء
غيـث
دمِ
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ممـا
عمرهـا
احنـفٌ
مـا
حاتمٌ
كرماً
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فعنــد
ذكـراك
يطـوى
نشـر
ذكرهـمِ
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ومـن
يلـذ
بـذرى
عليـاك
مـن
وجـلٍ
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إن
خاصـم
الـدهر
والآسـاد
لـم
يضمِ
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لـولا
حسـامك
يـا
فتـاك
مـا
نشدوا
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الســيف
أصـدق
أنبـاءً
مـن
القلـمِ
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إن
ضـلّ
ابـن
شـهابٍ
مـن
اجـرتَ
دحى
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تهـديهِ
نسـبتك
الغـراء
فـي
الظلمِ
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وإن
يؤمك
يا
نعم
البشير
بنوا
الآ
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مـال
كـان
اسـمك
البشـرى
بفـوزهمِ
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للَـــه
لبنــان
إذ
شــرفت
قمتــهُ
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باخمصــيك
فاضــحى
مــورد
الأمــمِ
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وسـاد
حـتى
غـدا
فـوزاً
لـذي
أمـلٍ
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لكنــهُ
مــانعٌ
بــالكظم
لـم
يُـرَمِ
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ســما
بهمتــك
العليــاء
مفتخـراً
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بمــا
اشــدت
لـهُ
مـن
شـامخ
الأدمِ
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جعلتــهُ
بسـيوف
العـدل
نعـم
حمـى
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يرعـى
بـهِ
الذئب
في
أمنٍ
مع
الغنمِ
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أقبلـت
بالنصـر
لمـا
أبـت
من
سفر
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أحييـت
فيـه
البرى
كالهاطل
العرمِ
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زهــت
منـازل
بيـت
الـدين
مشـرقة
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بكــم
وجــوّدت
الأطيــار
بــالنغمِ
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وعـود
المجـد
فـي
لقيـاك
زد
همماً
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فـالعود
أحمد
يا
ذا
الفضل
والهممِ
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فــاز
كــل
مقــام
حـل
ركبـك
فـي
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رياضــه
بالثنــا
واعـتز
ذا
شـممِ
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أصـبحت
كـالكوكب
السـيار
مبتهجـاً
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وبـات
أعـداك
فـي
غيـظٍ
وفـي
ألـمِ
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وقابلتــك
المعــالي
وهـي
باسـمةٌ
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تميـس
بـالعز
مثـل
الشـارب
النهمِ
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مــا
زرت
بعـاولاً
أمسـيت
فـي
بلـدٍ
|
إلا
وأصــبح
خصــباً
موضــع
القـدمِ
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لـو
زرت
بحـراً
غـدا
عـذباً
لشاربهِ
|
وفــاز
راكبــهُ
بــالأمن
والســلمِ
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أشـرقت
فـي
كـل
قطـرٍ
منك
نور
سناً
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كالبـدر
يشـرق
فـي
سـهلٍ
وفـي
علمِ
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قاسـوك
بالبـدر
مـن
جهل
فقيل
لهم
|
مـن
أيـن
للبـدر
كـفٌّ
فـاض
بالكرمِ
|
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سـريت
فـي
سـاحل
الرومـي
فانبسطت
|
ربــوعهُ
واكتسـت
بالرنـد
والخـزمِ
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جـاءت
للقيـاك
كـل
النـاس
مسـرعةً
|
مــا
بيـن
مستنصـر
منكـم
ومغتنـمِ
|
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واقبلــوا
بازدحـامٍ
يهرعـون
إلـى
|
رؤيــاك
بعضــهمُ
ينــبي
لبعضــهمِ
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يـا
خجلـة
البحـر
لمـا
جئت
ساحلهُ
|
ببحــر
جــودٍ
عــذيبٍ
غيـر
ملتطـمِ
|
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وســرت
بـالأمن
مصـحوباً
إلـى
بلـدٍ
|
أضـحت
لا
يـدي
المعـالي
غير
مستلمِ
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عكــاءُ
قــاهرة
الآســاد
فـي
أجـم
|
عليـــاء
فـــاخرت
الأفلاك
بــالأجمِ
|
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مــا
مثلهـا
بلـدٌ
بالمجـد
سـاميةٌ
|
بالســعد
طيبـةٌ
مـن
بعـد
ذي
سـلمِ
|
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مـن
أمّهـا
وهـو
ذو
عسـرس
ومسـكنةٍ
|
نــال
اليسـار
وعـزّاً
خيـر
منهـدمِ
|
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سـمت
بخيـر
وزيـرً
قـد
سـما
اصـفاً
|
إذ
هـو
سـليمان
هذا
العصر
بالحكمِ
|
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ولـى
لـه
الفضـل
فـي
خلق
وفي
خُلُق
|
كمـا
لـهُ
العـدل
فـي
سلمٍ
وفي
كظمِ
|
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انعــم
بـهِ
مـن
همـامٍ
دام
سـؤددهُ
|
للحـــق
منتصــرٍ
بــاللَه
معتصــمِ
|
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ضــاءَت
سـيادته
بـالحلم
وافتخـرت
|
بـه
الـوزارة
بيـن
العـرب
والعجمِ
|
|
عــمَّ
الأنــام
برفــدٍ
مـن
سـماحته
|
وعلّــم
الـدهر
طبـعً
وافـي
الـذممِ
|
|
شـهمٌ
إذا
سـلّ
فـي
الهيجـاء
صارمهُ
|
قــدّ
الجبــال
وردّ
الســهل
للأكـمِ
|
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لمـــا
رآك
تعــزّى
بعــد
لهفتــهِ
|
علــى
علــيٍّ
علـيّ
الجـاه
والشـيمِ
|
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ذاك
الـذي
كـان
بـدراً
للعلى
وقضى
|
فيالبـــدر
بفـــم
الأرض
ملتقـــمِ
|
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لـو
كـان
للنـاس
خلـدٌ
أو
لهم
قدمٌ
|
لكــان
أجــدر
بالتخليـد
والقـدمِ
|
|
أو
كــان
يمنـع
خاضـت
دونـهُ
أسـدٌ
|
بحـر
المنايـا
بعـزمٍ
غيـر
منفصـمِ
|
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ومنـك
قـد
طـاب
عنـه
النفس
سيدنا
|
وســيد
الـوزرا
المبعـوث
بـالعظمِ
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وهـام
فيـك
لمـا
أبـديت
مـن
شـيمٍ
|
أنّــى
يـراك
اخـو
مجـدٍ
ولـم
يهـمِ
|
|
شـــرفت
منـــه
بانعــامٍ
مجمّلــةٍ
|
اذ
أنـت
ذو
شـرفٍ
يـا
خيـر
محتشـمِ
|
|
والبســتك
أيــادي
مجــده
خلعــاً
|
قـد
شـرفت
بنـوال
اللثـم
كـل
كمي
|
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ومــذ
أتيـت
بتقريـر
الولايـة
قـد
|
أحيـى
السـرور
قلـوب
النـاس
كلهمِ
|
|
وأصــبحوا
يتهـادون
الـدعا
سـحراً
|
سـد
فـي
علاك
مـدى
الأيـام
واحتكـمِ
|
|
إليـك
أهـدي
الهنـا
يا
من
لرتبتهِ
|
يهـدي
التهـاني
وحسن
المدح
كل
فمِ
|
|
وحيــث
مــدحك
فــرضٌ
والثناسـنني
|
أرخــت
خـذ
نعمـةً
دامـت
نعـم
ودُمِ
|