|
سـكنتم
سـويد
القلب
في
برزخ
الصدر
|
فـذاب
لكـم
قلـبي
وغـاب
بكـم
فكري
|
|
وحـــاولتمو
إتلاف
كلـــي
بحبكـــم
|
فطــاوعكم
كلــي
وراح
ولــم
يــدر
|
|
طـويتم
ضـلوعي
فـي
هـواكم
على
لظى
|
غـرام
لمـن
يـدريه
أدهـى
من
الجمر
|
|
أمــوت
لكـم
إن
غـاب
عنـي
جمـالكم
|
وأحيـا
بـذكر
بكـم
إذا
جال
في
سرى
|
|
وأصـحو
إذا
الحـادي
تغنـى
بمـدحكم
|
وأســكر
فـي
معنـى
ثنـاكم
بلا
خمـر
|
|
أدور
بكـم
فـي
شـطحة
الفكـر
دائماً
|
فـاقطع
فيكـم
قطعـة
الـبر
والبحـر
|
|
واشــغل
عــن
هـذا
الزمـان
وأهلـه
|
بـدولتكم
أرضـى
لـدى
النهـى
والأمر
|
|
وإنــي
غريــب
بيـن
أهلـي
لشـأنكم
|
جمعــت
بكـم
سـرى
وأعطيتهـم
جهـرى
|
|
فأيــامي
الأعيـاد
فـي
بـاب
ديركـم
|
وكـل
الليـالي
عنـدكم
ليلـة
القدر
|
|
وللَــه
كـم
مـن
ليلـة
فـي
رحـابكم
|
بهـا
رقصـت
روحـي
إلـى
مطلع
الفجر
|
|
تغزلـــت
فيكــم
لا
بغــزلان
أجــرع
|
وفيكــم
ضــيائي
لا
بطالعـة
البـدر
|
|
وأنتـم
سـما
روحـي
ومصـباح
أفقهـا
|
وأبراجهـا
العليـا
وكوكبهـا
الدرى
|
|
بكــم
نعشــت
أجــزاء
ذات
وطلمسـت
|
بنشــأتها
عـن
غيركـم
مـدة
العمـر
|
|
طرقتــم
رحــاب
السـر
منـي
بصـدمةٍ
|
مـن
العشـق
فانهد
القوى
ووهى
أمري
|
|
لكــم
منكــم
أشــكو
وإنـي
وحقكـم
|
تجــرت
عـن
زيـد
لـديكم
وعـن
عمـر
|
|
وإنـي
غنـي
عـن
شـؤون
الـورى
بكـم
|
ولكــن
لعليــا
عــز
سـدتكم
فقـري
|
|
تجلجلــت
فـي
نعمـاكم
بيـن
عروتـي
|
ففــاق
علــى
قـومي
بعزتكـم
قـدري
|
|
وأصــبحت
محفــوظ
الجنـاب
ومظهـري
|
رفيـع
ومجلـى
مركـزي
أشـرف
الصـدر
|
|
وليــس
بقلــبي
مقصــد
دون
قربكـم
|
علـى
أنـه
قـد
ذاب
مـن
ألـم
الهجر
|
|
بحقكــم
يـا
جيـرة
الشـعب
اتحفـوا
|
عبيــدكم
بالوصـل
إن
الجفـا
يـزري
|
|
ومنــوا
لـه
يـا
سـادتي
بالتفاتـة
|
يطيــب
بمعنـى
طيبهـا
طيـب
العطـر
|
|
ولا
تقطعــوا
آمــاله
مــن
وصـالكم
|
فقـد
غـاب
مـن
ضر
البعاد
عن
الصبر
|
|
وإن
الهــوى
اسـتولى
عليـه
بعسـكر
|
جريـء
عظيـم
الفتـك
بالبيض
والسمر
|
|
وراح
أســيراً
فــي
هــواكم
ومـاله
|
ســواكم
منـج
مـن
هنـا
ذلـة
الأسـر
|
|
لســـعتم
بحيــات
الــذوائب
لبــه
|
فهـل
مـن
دواء
مـن
رحيق
لمى
الثغر
|
|
وهــل
مـن
يـد
بيضـاً
تقـوم
بحـاله
|
وتتحفــه
مـن
عسـر
بلـواه
باليسـر
|
|
فهجتــه
حــرى
ومــن
ظــرف
دارهـا
|
رمـت
شـرراً
يحكـي
عـن
الحال
القصر
|
|
ومقلتـــه
وســنى
ولكــن
ســحابها
|
تسلسـله
الموصـول
زاد
علـى
القطـر
|
|
علمتـم
بـه
يـا
أعلم
الناس
بالهوى
|
فما
ذا
الجفا
منكم
حميتم
من
الغدر
|
|
فـإن
كـان
هـذا
الصـد
عـن
زلة
بدت
|
فعفــوكم
العـالي
أجـل
مـن
الـوزر
|
|
وإن
كــان
عــدواناً
عليـه
فمثلكـم
|
تنــزه
أخلاقـاً
عـن
الظلـم
والجـور
|
|
لكـم
ينسـب
الإحسـان
والعطف
والثنا
|
ومـن
بحركـم
فيض
العطا
دائماً
يجري
|
|
فبـاللَه
يـا
أقمـار
سمك
الورى
ويا
|
شـموس
دجـى
الكـوان
عند
ذوي
الفكر
|
|
دعـوا
القطـع
إن
القطـع
قتل
لعاشق
|
وعن
جرم
أمر
القتل
قد
نص
في
الذكر
|
|
وداووا
مســيكين
الغــرام
بنظــرةٍ
|
يطيــر
بعلياهـا
إلـى
عـالم
الأمـر
|
|
ويشــهد
أمــر
القـرب
فعلاً
وتنجلـي
|
لـه
حضـرة
التقريـب
من
داخل
الخدر
|
|
ويحظـى
بكـم
فـي
خلـوةٍ
قـد
تجللـت
|
بســتر
خفــي
حــوله
نعمـة
السـتر
|
|
ويكشــف
أســراراً
بكـم
قـد
أكنهـا
|
عن
الكون
خوف
الطي
في
الأمر
والنشر
|
|
وقولـوا
لـه
هـا
نحـن
أقبل
ولا
نخف
|
نجـوت
مـن
الهجـران
والنكـد
المـر
|
|
أحيبـاب
قلـب
الـواله
الـدنف
الذي
|
بكـم
صـاغ
در
الفكـر
في
قلم
الشعر
|
|
خطفتــم
بلــى
الشــعر
لـب
شـعوره
|
وراح
بهـز
الخصـر
يسـبح
فـي
الحصر
|
|
ومـن
سـحر
عيـن
دونهـا
سـحر
بابـل
|
غـدت
عينـه
الرمـداء
تقـرأ
والعصر
|
|
وقـد
أنكـر
العـذال
بلـواه
والعنا
|
وحــاربه
الواشــي
وكـل
علـى
عـذر
|
|
وطـــال
ملام
اللائميـــن
وقــد
علا
|
علـى
ضـعفه
صـوت
الرقيب
إلى
المكر
|
|
وزاد
مقـــال
الحاســـدين
عليكــم
|
بــه
عــدوة
إن
الحسـود
لفـي
خسـر
|
|
وفــي
كــل
آنٍ
فـي
مجـالي
جمـالكم
|
ونشــأتها
يـزداد
سـكراً
علـى
سـكر
|
|
فلا
تهملـوا
تلـك
الحقـوق
وتنزعـوا
|
وداد
أمـرئ
قـد
غاب
فيكم
عن
الطور
|
|
ينـاديكمو
غوثـاه
يـا
سـادتي
فقـد
|
تلفـت
وبلـوى
حملـتي
أثقلـت
ظهـري
|
|
وليـــس
لآمـــالي
ســـواكم
وأنــت
|
بعينـي
نـور
العيـن
للعبـد
والحـر
|
|
ولــو
أن
عــذالي
رواكـم
كمـا
أرى
|
لطـاب
لهـم
حـالي
وساروا
على
سيري
|
|
رضــيت
بكــم
والظـن
أن
ترتضـونني
|
علـى
كـل
حـال
سـادتي
منكـم
جـبري
|