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لكــل
أمــر
تســول
بـابن
عـدنان
|
فـذاك
بـاب
الرجـا
للأنـس
والجـان
|
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والجـأ
بأعتـابه
العليـا
فإن
بها
|
حبل
النجاة
القاصي
الدار
والداني
|
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محمــد
الأرض
محمـود
السـماء
أحـي
|
د
الكـل
أحمـد
أهـل
الجاه
والشان
|
|
بحـر
المكـارم
سـلطان
الأكـارم
عي
|
ن
الكائنـات
معيـن
العاجز
العاني
|
|
لـوح
الـبراهين
ختم
المرسلين
ملا
|
ذ
الخـاطئين
مغيـث
المذنب
الجاني
|
|
مصـــباح
نـــور
الهــبى
طلاســمه
|
حلـف
فجـاء
لنـا
فـي
شـكل
إنسـان
|
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أشـتات
أشـرف
أنـواع
الصـفات
بـه
|
تجمعــت
فهــو
مــولى
كـل
برهـان
|
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طــه
بتعريــف
عليـا
شـانه
نزلـت
|
وجـاء
بـالكوثر
التبـتير
للشـاني
|
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بــالجزء
الأول
مـن
تفسـير
حكمتـه
|
حـل
المثاني
وآي
الذكر
في
الثاني
|
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بحـر
المعـارف
مـن
مكنـون
انبجـس
|
عيــــونه
بإشــــارات
وفرقـــان
|
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وجــاء
يـذكر
فـي
الإنجيـل
مظهـره
|
مــع
الثنــا
برمـوز
بعـد
تبيـان
|
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وفـي
الزبـور
وفـي
التوراة
مدحته
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مســطورة
ولســان
المــدح
ربـاني
|
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موســى
وعيســى
بــه
لاذ
وآدم
مـذ
|
بـه
اسـتجار
نجـا
مـن
أتـم
عصيان
|
|
والأنبيــاء
بــه
حطــت
بواحلهــا
|
لنيــل
قـرب
مـن
المـولى
وإحسـان
|
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مـا
الكـون
إلاه
إذ
لـولاه
ما
بنيت
|
أركـانه
ولـه
قـد
شـادها
البـاني
|
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سـر
الطريقـة
مصـباح
الحقيقـة
مف
|
تــاح
الشـريعة
مبـدى
كـل
عرفـان
|
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معراجـه
لـذرى
العليـا
بثـم
دنـا
|
حـاز
التـدلى
فنعـم
الأقرب
الداني
|
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وحضــرة
القـدس
قـد
حفـت
لزورتـه
|
بكـل
معنـى
عجيـب
النسـق
نـوراني
|
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لقـاب
قوسـين
أو
أدنـى
دنـا
ولقد
|
رأى
جنابــاً
مـن
الجبـار
رحمـاني
|
|
قـد
أسعفنه
يد
الحظ
العظيم
من
ال
|
عهــد
القــديم
بإحســان
ووصــلان
|
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واللَــه
يعصــمك
احتـاطت
بطلعتـه
|
للحفـظ
مـن
كيـد
ذرى
زور
وبهتـان
|
|
وحفـه
العسـكر
الغيـبي
بنـور
هدى
|
وجيـــش
نصــر
وتوفيــق
وإيمــان
|
|
جلــت
جلالتــه
عــن
وهــم
متقــد
|
ونزهـت
ذاتـه
الحسـناء
عـن
ثـاني
|
|
مـولى
مدينـة
حسـن
في
العمى
عمرت
|
بحســـن
طــرز
وعنــوان
واتقــان
|
|
ســلطان
حضــرة
قـدس
ضـمن
حضـرته
|
فــي
كــل
زاويــةٍ
ملـك
سـليماني
|
|
بـاهت
بـه
الناس
أملاك
السما
شرفاً
|
والأرض
سـامت
ذرى
العليـا
بعلـوان
|
|
بكــــل
خـــط
إلهـــي
مـــدائحه
|
أتــت
وقــد
نقشــت
قـدماً
بقـرآن
|
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وفـي
لغـات
جميـع
الخلـق
قد
ذكرت
|
أوصــافه
فعلــت
عـن
وصـف
نقصـان
|
|
مـا
للمسـاكين
حمـال
الـذنوب
حمى
|
ســواه
مــن
هــم
ميـزان
ونيـران
|
|
نعـم
هو
الغيث
إن
حبل
الرجا
فصمت
|
عــراه
مــن
غـوث
أنصـار
وأعـوان
|
|
أتييـــه
بـــذنوب
لأعــداد
لهــا
|
وطيلســان
الخطايــا
قـد
تغشـاني
|
|
وجهــل
عاقبــة
الأحــوال
أضـحكني
|
وعلـم
عرضـي
علـى
الـديان
أبكاني
|
|
وسـوء
سـيري
إلـى
الأهـوال
قربنـي
|
وقبــح
فعلـى
عـن
الآمـال
أقصـاني
|
|
جيـش
المعاصـي
عـن
الأوطـان
شتتني
|
حــتى
بقيــت
فريــداً
دون
خلانــي
|
|
وهـاتف
الغفلـة
اسـتولى
علـيَّ
فكم
|
بســر
ذاتــي
نــاداني
وناجــاني
|
|
وهـــا
أنـــا
بيــن
آلام
معقــدةٍ
|
مــن
التحســر
فـي
قلـبي
وأحـزان
|
|
وكـــل
آن
لــدينا
غيــر
دائمــة
|
موثــــوق
هـــم
بلا
أه
وإخـــوان
|
|
مــا
تلـك
واللَـه
إلا
لقمـة
حصـلت
|
وخرقـة
سـترت
ذا
القـالب
الفـاني
|
|
مـولاي
يـا
روح
جسـم
الأنبيـاء
أغث
|
فقـد
وهـت
حملـتي
والخطـب
أعياني
|
|
بســر
قربـك
مـن
مـولاك
جـد
كرمـاً
|
بوصـل
حبلـي
فهـذا
القطـع
أضناني
|
|
وارحـم
غريبـاً
ضـعيفاً
لاذ
فيك
فما
|
إلاك
أرجــو
لعــزي
بيــن
أقرانـي
|
|
ضـاقت
مـذاهب
فكـري
والهمـوم
دهت
|
صـبري
وراهـص
هـذا
الكـرب
أفناني
|
|
وقـد
أخـذتك
لـي
حصـناً
الـوذ
بـه
|
مــن
كــل
خــوفٍ
بإيمـان
وإذعـان
|
|
فـاعطف
علـي
وقـل
أصـبحت
في
دركي
|
بــالأمن
مـن
ضـنك
أزمـان
وسـلطان
|
|
وأقلـب
غوايـة
قلـبي
للهداية
بال
|
لطــف
الخفـي
وتمـم
نـور
عرفـاني
|
|
وأقبـل
خضـوعي
فـي
أعتاب
عزك
واذ
|
كرنــي
بخيـر
وشـيد
فيـك
أركـاني
|
|
وارحـم
أبـي
وبنـى
عمـى
وطـائفتي
|
وأهـــل
بيــتي
وأولادي
وجيرانــي
|
|
واقبـل
علـى
حـزب
إخـواني
بمرحمةٍ
|
ورد
بالمـــدد
القدســـي
خــواني
|
|
فقـد
تركـت
بنـى
الدنيا
وجئت
إلى
|
أبــواب
فضـلك
فـي
عـبي
ونقصـاني
|
|
عرفتـك
الرحمـة
العظمـى
وبابك
با
|
ب
اللَـه
فابدل
لكنز
الربح
خسراني
|
|
صـلى
عليـك
إلـه
العـرش
مـا
ظهرت
|
أنــوار
مجــدك
فـي
عجـم
وعربـان
|
|
وآلـك
الغـر
أهـل
الـبيت
سـادتنا
|
والصــحب
أعظــم
قــادات
وشـجعان
|
|
والتـابعين
لهـم
مـا
قلـت
ملتجئا
|
لكــل
أمــر
توســل
بـابن
عـدنان
|