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كــل
قـول
فيـه
ثنـاء
ومـدح
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بســـوى
آل
جعفـــرٍ
لا
يصــح
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وقصـارى
تجـارة
الشـعر
خسـر
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وهـو
فـي
مـدحهم
زكـاة
وربح
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لئة
فيــــؤهم
ظلال
وفيهـــم
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كـل
مـن
عام
في
الضلالة
يصحو
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يعـدلون
القضا
لو
الكون
جور
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ويجـــودون
والزمــان
يشــح
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جنحـوا
للعلـى
فراشوا
جناحي
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هـا
فهـاهم
لآمـل
الـدهر
نجح
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شــرف
يفـرش
الثريـا
مهـاداً
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ولــه
الأطلــس
المبجـل
سـطح
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وسماء
يزينها
من
أبي
العباس
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غـــر
مــن
المكــارم
صــبح
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ســابع
كـل
حلبـةٍ
مـا
تخطـي
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لمــدى
شــأوه
جــواد
ملــح
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قــرن
اللَــه
نجمــه
بسـعود
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فهـو
قـرن
بـه
مع
الدهر
صلح
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وهــو
غــوث
لخـائف
مسـتجير
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وبــه
للهــدى
وللَــه
صــلح
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شــرح
اللَــه
صــدره
لعلـوم
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وبمعنــى
صــفاته
طـال
شـرح
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ومهــاب
مؤيـد
بسـداد
اللَـه
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فيمــا
يــأتي
إليـه
وينحـو
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متحـف
بالسـداد
فيمـا
يـراه
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ولــه
أينمــا
تــوجه
فتــح
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وإذا
مـا
خبـا
زنـاد
ففي
كل
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زمــان
لزنــد
عليــاه
قـدح
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وإذا
اســتدت
أحــاديث
مجـدٍ
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فلآبـــائه
الحـــديث
الأصــح
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يـا
بنـي
جعفر
الذي
من
يديه
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كــل
غيــثٍ
بكــل
جـود
يسـح
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ملـح
مـن
قصـائدي
فيـك
تتلى
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ولعمـري
مـا
فـي
سـواهن
ملح
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أنــا
والٍ
وفــي
ودادك
غـالٍ
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لا
أبـالي
بعـاذلٍ
فيـك
يلحـو
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لـك
منـي
حسن
الثنا
ولنا
من
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عزمـك
المسـتطيل
سـيف
ورمـح
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