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قـد
عـاد
عصـر
الصبا
غضاً
وريعان
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واســترجع
الـدهر
أيـام
بنعمـان
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من
بعد
ما
قد
غدا
بالشيب
مشتعلا
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فــودي
والبســني
أطمـار
رهبـان
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خلعــت
ثوبيهمــا
عنـي
فسـربلني
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مــن
الشــبيبة
والأفـراح
ثوبـان
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فأسـفر
البشـر
فـي
ديجور
أحزاني
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فقمــت
أسـحب
بالنعمـاء
أردانـي
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فأصـبحت
روضـة
النـادي
وقد
يبست
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ريانـة
الشـيح
والقيصـوم
والبان
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علــت
فوقهــا
ورق
النهـى
طربـا
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تشــدو
فتمــزج
ألحانـاً
بألحـان
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إن
لـم
تكـن
طـوّقت
جيدي
بحليتها
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فإنهــا
شــنفت
بالصــدح
آذانـي
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فبــات
ســاهر
جفنــي
كلـه
وسـن
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وطالمــا
بـت
ليلـى
غيـر
وسـنان
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هـذي
ركـائب
أهـل
المجد
قد
وفدت
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تطـوي
المفـاوز
أحزانـاً
بـأحزان
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خـوص
مراسـيل
مثل
القود
قدر
قلت
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بمثلهـا
منبنـي
فهـر
بـن
عـدنان
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فاليوم
نعلو
على
الدنيا
بمقدمهم
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فلا
يطاولنـــــا
قــــاص
ولا
دان
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وافــت
ركـائبهم
حـتى
إذا
عطنـت
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تــأرجت
بالحمــا
أضـغاث
ريحـان
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فأشــرقت
مـن
ذرى
أكوارهـا
شـهب
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كــأن
أكوارهــا
مقبــول
قربـان
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نـور
التقـي
تجلّـى
خيـر
من
رقصت
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بـه
الركـائب
مـن
حـي
ومـن
فـان
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سامي
الدعام
خدين
العلم
من
شمخت
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بـه
العلـوم
علـى
أكنـاف
كيـوان
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فقـل
لمـن
قـد
غـدا
جهلا
يطـاوله
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مـا
بيـن
أوج
السـما
والأرض
شتان
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بحـران
للعلـم
في
الدنيا
فأولها
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مهـدي
الـورى
وتقـي
بحره
الثاني
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لـو
أن
بهـرام
يـدري
فـي
تولـده
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لمــا
تكلــف
أهرامــا
وبرانــي
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أو
أن
ســحبان
يـدري
فـي
بلاغتـه
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لمــا
رضـي
خطبـا
تنمـي
لسـحبان
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جلــت
مفــاخره
عمــن
يماثلهــا
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كـــأن
آياتهـــا
آيــات
قــرآن
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طـارت
بـه
حيـث
حـك
النجم
منكبه
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مـن
غـامض
العلم
والتقوى
جناحان
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أشـادت
للعلـم
أركانـا
فأحكمهـا
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مـن
بعد
ما
قد
غدا
من
غير
أركان
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ألقـت
لـه
علمـاء
الـدهر
مقودها
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وقبلهـا
العلـم
ألقـى
فضل
أرسان
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قـالوا
وقـال
ولكـن
كـان
مقـوله
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مـا
بيـن
أقـوالهم
روحـا
بأبدان
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مـن
يـدعي
الفضـل
محتـاج
لبينـة
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وفضــله
واضــح
مـن
غيـر
برهـان
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يمـــت
فـــي
ملأ
شــم
معاطســهم
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أهــل
العبـا
وصـفايا
آل
عـدنان
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بنـي
الرضـا
قد
أقر
الله
أعينكم
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قـرت
لعمـري
عيـون
الأنـس
والجان
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فلا
تـزال
التهـاني
فـي
محـافلكم
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مـا
غـرّد
الـورق
في
طلح
وفي
بان
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