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ما
لي
من
الشوق
يدعوني
إلى
الغزل
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وإن
كــبرت
وجـد
الجـد
فـي
هزلـي
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فكلمــا
غــردت
ورقــاء
فـي
فنـن
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ثنــت
فــؤادي
لـذكر
الأعصـر
الأول
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أزمــان
ان
قطعـت
سـعدي
زيارتهـا
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عنـي
إلـى
الليل
أشكوها
فيشفع
لي
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وان
حــذرت
عليهــا
عيـن
جارتهـا
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جعلــت
غمـز
حواجيـبي
لهـا
رسـلي
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نصــبت
سـود
تماسـيحي
لهـا
شـركاً
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فليــس
تفلــت
إلا
مـن
يـدي
أملـي
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وقايـداي
إلـى
مـن
قـد
علقـت
بها
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زهــو
الشــباب
وعـز
غيـر
مبتـذل
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فكــم
طرقـت
فتـاة
الحـي
يصـحبني
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مهنـــد
غيـــر
هيـــاب
ولا
وكــل
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وكـــم
قضــيت
لبانــات
بكاظمــة
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مـع
أهيـف
القدر
رامي
من
بني
ثعل
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أصــمى
فـؤادي
بسـهم
مـن
لـواحظه
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والمـوت
أيسـر
خطـب
الأعيـن
النجل
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فكــم
خلعـت
وقـاري
للعقـار
وكـم
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حـاك
العنـاق
لنـا
ثوباً
من
القبل
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واهــاً
لقلــبي
كـم
تحـى
صـبابته
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بيـض
الخـدود
وسـود
الشعر
والمقل
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مـن
كـل
مايسـة
الأعطاف
مثقلة
الأ
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رداف
تخطـو
باقـدام
الـوحي
الوجل
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تثنـي
علـى
جيـدها
وشـيا
معصـفرة
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والحسـن
يظهـر
حسـن
الحلي
والخلل
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ماسـت
بقـد
كخـوط
البـان
والتفـت
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إلــي
ترنــو
بعينــي
جـؤذر
وجـل
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فقــل
لعــاذلتي
فـي
حـب
قـاتلتي
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كفـي
معـاتبتي
مـا
العذل
من
شغلي
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أنــي
يصــيخ
لتــأنيب
اخـو
فـرح
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طــارت
بــأحزانه
خفافــة
الجـذل
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فـي
عـرس
مـن
غرسـت
نعمـاه
عارفة
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عنـدي
مدى
الدهر
ما
حالت
ولم
تحل
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مهــدي
الخليقـة
محمـود
الطريقـة
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ميمـون
النقيبـة
مـأمون
من
الزلل
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مــن
عنصــر
شـرفت
قـدما
ارومتـه
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ومــن
نجــار
بأصـل
المجـد
متصـل
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مـن
آل
جعفـر
خيـر
النـاس
قاطبـة
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ومـن
بنـي
الجود
والعلياء
آل
علي
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لمهــدي
ابــن
علــي
كــل
مكرمـة
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لـو
رام
أخمصـها
العيـوق
لـم
ينل
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مهـــذب
كرمـــت
أخلاقـــه
وزكــت
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أعراقــه
فتعــدى
رتبــة
المثــل
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وكيــف
لا
يسـمون
مـن
كـان
والـده
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علــي
قـدر
علـى
كـل
الأنـام
علـي
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غيــث
العفــاة
وفكــاك
العنــاة
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ورغـام
العـداة
بـرأي
منـك
معتدل
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إذا
رأيــــت
ســـجاياه
وعفتـــه
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عــن
الـدنا
وعـن
الخيلاء
والخـول
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ورمـــت
وفــر
عطايــاه
ونــائله
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خلـت
الامامـة
لـم
تفقـد
ولـم
تزل
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فاهنـأ
اخـي
بمـن
زفـت
اليـك
ولا
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برحـت
ترمـي
اكـف
الـدهر
بالشـلل
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ولــم
تـزل
ترغـم
الأعـدا
فضـائلك
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اللاتـي
تسامت
على
الجوزاء
والحمل
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