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ســيدي
والظنــون
فيــك
جميلـة
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وأياديـــك
بالأمـــاني
كفيلــه
|
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لا
تحــل
عــن
جميـل
رأيـك
إنـي
|
مـا
لـي
اليـوم
غيـر
رأيك
حيله
|
|
واصـطنعني
كمـا
اصـطنعت
بإسـدا
|
ء
يــد
مــن
شــفاعة
أو
وسـيله
|
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لا
تضــعني
فلســت
منــك
مضـيعاً
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ذمــة
الحـب
والأيـادي
الجميلـه
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وأجرنــي
فــالخطب
عــض
بنــاب
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بيـه
وأجـرى
إلـى
حمـاي
خيـوله
|
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ولــو
أنــي
دعــا
بنصــري
داع
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كنــت
لــي
خيـر
معشـر
وفصـيله
|
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أنـه
أمـري
إلـى
الـذي
جعل
الل
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ه
أمــور
الــدنيا
لـه
مكفـوله
|
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وأراه
فــي
ملكــه
الآيــة
الـك
|
بــرى
فــولاه
ثــم
كـان
مـديله
|
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أشـهدته
عنايـة
اللـه
فـي
التم
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حيــص
أن
كــان
عــونه
ومنيلـه
|
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العزيـز
السـلطان
والملـك
الظا
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هـر
فخـر
الـدنيا
وعـز
القبيله
|
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ومجيــر
الإســلام
مــن
كـل
خطـب
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كــاد
زلــزال
بأسـه
أن
يزيلـه
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ومـديل
العـدو
بالطعنـة
النجلا
|
ء
تفــــري
مـــاذيه
ونصـــوله
|
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وشـــكور
لأنعــم
اللــه
يفنــي
|
فـــي
رضـــاه
غــدوه
وأصــيله
|
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وتلطــف
فـي
وصـف
حـالي
وشـكوى
|
خلـــتي
يـــا
صــفيه
وخليلــه
|
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قـل
لـه
والمقـال
يكـرم
مـن
مث
|
لــك
فـي
محفـل
العلا
أن
يقـوله
|
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يـا
خونـد
الملـوك
يا
معدل
الد
|
هــر
إذا
عــدل
الزمـان
فصـوله
|
|
لا
تقصـر
فـي
جـبر
كسـرى
فما
زل
|
ت
أرجيـــك
للأيــادي
الطويلــة
|
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أنــا
جــار
لكـم
منعتـم
حمـاه
|
ونهجتــم
إلـى
المعـالي
سـبيله
|
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وغريــب
أنســتموه
علـى
الـوحش
|
ة
والحــزن
بالرضــى
والسـهوله
|
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وجمعتــم
مـن
شـمله
فقضـى
الـل
|
ه
فراقــاً
ومــا
قضــى
مـأموله
|
|
غـاله
الدهر
في
البنين
وفي
الأه
|
ل
ومــا
كــان
ظنــه
أن
يغـوله
|
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ورمتـه
النـوى
فقيـداً
قـد
اجـت
|
احــت
عليــه
فروعــه
وأصــوله
|
|
فجــــذبتم
بضـــبعه
وأنلتـــم
|
كــل
مـا
شـاءت
العلا
أن
تنيلـه
|
|
ورفعتــم
مـن
قـدر
قبـل
أن
يـش
|
كــو
إليكــم
عيــاءه
وخمــوله
|
|
وفرضــــتم
لــــه
حقيقـــة
ود
|
حــاش
للــه
أن
تــرى
مسـتحيله
|
|
همـــة
مــا
عرفتهــا
لســواكم
|
وأنــا
مـن
خـبرت
دهـري
وجيلـه
|
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والعــدا
نمقــوا
أحـاديث
إفـك
|
كلهـــا
فــي
طــرائق
معلــوله
|
|
روجــوا
فــي
شـأني
غـرائب
زور
|
نصــــبوها
لأمرهـــم
أحبـــوله
|
|
ورمـوا
بالـذي
أرادوا
مـن
الـب
|
هتــان
ظنــاً
بأنهــا
مقبولــة
|
|
زعمـوا
أننـي
أتيـت
مـن
الأقـوا
|
ل
مــا
لا
يظــن
بــي
أن
أقـوله
|
|
كيــف
لـي
أغمـط
الحقـوق
وأنـي
|
شــكر
نعمــاكم
علــي
الجزيلـه
|
|
كيـف
لـي
أنكـر
الأيادي
التي
تع
|
رفهــا
الشـمس
والظلال
الظليلـه
|
|
إن
يكـن
ذا
فقـد
بـرئت
مـن
الل
|
ه
تعــالى
وخنــت
جهـراً
رسـوله
|
|
طوقونــا
أمــر
الكتـاب
فكـانت
|
لقــداح
الظنــون
فينـا
مجيلـه
|
|
لا
ورب
الكتـــاب
أنزلــه
الــل
|
ه
علــى
قلـب
مـن
وعـى
تنزيلـه
|
|
مــا
رضــينا
بـذاك
فعلاً
ولا
جـئ
|
نـاه
طوعـاً
ولا
اقتفينـا
دليلـه
|
|
إنمــا
ســامنا
الكتــاب
ظلـوم
|
لا
يرجـــى
دفـــاعه
بـــالحيله
|
|
ســـخط
نـــاجز
وحلـــم
بطيــء
|
وســلاح
للــوخز
فينــا
صــقيله
|
|
ودعــوني
ولسـت
مـن
منصـب
الـح
|
كــم
ولا
ســاحباً
لـديهم
ذيـوله
|
|
غيــر
أنــي
وشــى
بــذكري
واش
|
يتقصــــى
أوتـــاره
وذحـــوله
|
|
فكتبنـــا
معــولين
علــى
حــل
|
مـك
تمحـو
الاصـار
عنـا
الثقيله
|
|
مــا
أشــرنا
بـه
لزيـد
ولا
عـم
|
رو
ولا
عينـــوا
لنــا
تفصــيله
|
|
إنمــا
يــذكرون
عمــن
وفيمــن
|
مبهمـــات
أحكامهـــا
منقــوله
|
|
ويظنـــون
أن
ذاك
علـــى
مـــا
|
أضــمروا
مـن
شـناعة
أو
رذيلـه
|
|
وهــو
ظــن
عــن
الصـواب
بعيـد
|
وظلام
لـــم
يحســـنوا
تــأويله
|
|
وجنـاب
السـلطان
نزهـه
اللـه
ع
|
ن
العــاب
بالهــدى
والفضــيله
|
|
وأجــل
الملــوك
قــدراً
صــفوح
|
يرتجــي
ذنــب
دهــره
ليقيلــه
|
|
فاقبلوا
العذر
إننا
اليوم
نرجو
|
بحيــاة
السـلطان
منكـم
قبـوله
|
|
وأعينــوا
علـى
الزمـان
غريبـاً
|
يشــتكي
جــدب
عيشــه
ومحــوله
|
|
جــاركم
ضــيفكم
نزيــل
حمـاكم
|
لا
يضــيع
الكريـم
يومـاً
نزيلـه
|
|
جــددوا
عنــده
رســوم
رضــاكم
|
فرســوم
الكــرام
غيــر
محيلـه
|
|
داركـــوه
برحمـــة
فلقـــد
أم
|
ســت
عقــود
اصــطباره
محلـوله
|
|
وانحلــوه
جــبراً
فليــس
يرجـي
|
غيــر
إحسـانكم
لهـذي
النحيلـه
|
|
يـا
حميـد
الآثـار
فـي
الدهر
يا
|
ألطنبغـا
يـا
روض
العلا
ومقيلـه
|
|
كيــف
بالخانقــاه
ينقــل
عنـي
|
لا
لـــذنب
أو
جنحـــة
منقــوله
|
|
بــل
تقلــدتها
شــغوراً
بمرسـو
|
م
شــــريف
وخلعـــة
مســـدوله
|
|
ولقــــد
كنـــت
آملاً
لســـواها
|
وســـواها
بوعـــده
أن
ينيلــه
|
|
وتــــوثقت
للزمـــان
عليهـــا
|
بعقــود
مــا
خلتهــا
محلــوله
|
|
أبلغــن
قصــتي
فمثلـك
مـن
يـق
|
صـد
فعـل
الحسـنى
بمن
ينتمي
له
|
|
واغنمــوا
مـن
مثوبـتي
ودعـائي
|
قربـــة
عنــد
ربكــم
مقبــوله
|
|
واصــحب
العـز
ظـافراً
بالأمـاني
|
واتـرك
العصـبة
العـدا
مفلـوله
|
|
واعتمـل
فـي
سـعادة
الملك
الظا
|
هـــر
أن
تمحــو
الأذى
وتزيلــه
|
|
وتعيــد
الــدنيا
لأحســن
شــمل
|
حيــن
تضــحي
بســعده
مشــموله
|
|
واطلـب
النصـر
مـن
سـعادته
يـص
|
حبـك
دابـاً
في
الظعن
والحيلوله
|
|
وارتقــب
مــا
يحلــه
بالأعـادي
|
فـي
جمـادى
أو
زد
عليـه
قليلـه
|
|
وخـــذوه
فـــألاً
بحســن
قبــول
|
صـدق
اللـه
فـي
الزمـان
مقـوله
|
|
فلقـد
كـان
يحسـن
الفال
عند
ال
|
مصــطفى
دائمــاً
ويرضـى
جميلـه
|