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جلنــار
الخـدين
نـارى
أذكـى
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وشـذا
نفحـه
مـن
المسـك
أذكى
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يـا
مليـك
الجمـال
رفقـا
بصب
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قـد
تصـرفت
فيـه
ملكـا
وملكا
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لــم
يمـل
عنـك
صـبوة
وهـواه
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ليـس
يرضـى
توحيـده
لـك
شركا
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ويـح
روحـي
من
حور
أحورا
حوى
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فيــه
بـدلت
باسـتناري
هتكـا
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أســرت
مهجــتي
لــه
لَفَتــاتٌ
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فعلهـا
بالحشى
من
السهم
أنكى
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بنبـال
الأهـداب
يصمي
الرمايا
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ويبيـح
الـدماء
سـفحا
وسـفكا
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لحظــه
يظهــر
الأمـان
لقلـبي
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وهو
ما
انفك
عنه
بالغدر
فتكا
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باسـم
الثغـر
عـن
عقـود
جمان
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تبهــر
النـاظمين
درا
وسـلكا
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روِّح
الـروح
يـا
مشـير
غرامـي
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وأرحنـي
مـن
عشـق
ذاك
وتلكـا
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واتركـي
النوح
يا
هتوف
هياما
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كم
على
الدوح
قبل
مبكاك
مبكى
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وابـك
يا
مدمعي
على
فقد
أنسى
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فعلــى
مثلــه
ينــاح
ويبكـي
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واكفـف
اللـوم
يـا
خلي
وأقصر
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لا
تطـل
لوعـتي
ودعنـي
أدعكـا
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ذاب
قلـبي
وسـال
يقطـر
دمعـا
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صـب
فـي
قـالب
المـدامع
سبكا
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يـا
غريقا
في
لج
بحر
التصابي
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عـد
ودع
واجعـل
الندامة
فلكا
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وإلــى
ربــك
اشـك
لوعـة
صـب
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مثلهـا
مـن
لظى
الصبابة
يشكي
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ليـس
عبـد
عـن
العبـادة
لاهـى
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مثــل
عبـد
صـلى
وصـام
وزكـى
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رب
وفــق
قلـبي
ويسـر
عسـيري
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رب
واكشـف
عنـي
غمومـا
وضنكا
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وامـح
ذنـبي
واثبت
العفو
عني
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فـذنوبي
زادت
علـى
الصـك
صكا
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رب
وارحـم
شـيبي
ونـور
ضريحي
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وتقبــل
منــي
دعــاء
ونسـكا
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وانلنـي
المنـى
وأحسـن
خلاصـي
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فمنى
العبد
أن
يرى
المن
منكا
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وارض
عنـي
بجـاه
طـه
الذي
ما
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جـاء
بـدعا
كلا
ولا
قـال
إفكـا
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خـاتم
الرسـل
أوّل
الخلـق
بدأ
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مــن
هــداه
محـا
ضـلالا
وشـكا
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وعليــه
أزكــى
صــلاة
شـذاها
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بــذكى
الســلام
يعبــق
مسـكا
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