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آه
يـا
حسـرتا
علـى
مـا
لعبت
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مـال
قلـبي
وكلمـا
مـال
عبـت
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كيـف
تقوى
نفسي
على
غير
تقوى
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وأرانــي
بعـد
الشـبيبة
شـبت
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عبثـت
بـي
يد
الهوى
والتصابي
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مـا
دعـاني
داعيـه
إلا
استجبت
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كـان
مغناطيسـا
وكنـت
حديـداً
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ولهــذا
طبعـا
إليـه
انجـذبت
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جبـت
هـذي
مـن
القطا
كل
بيدا
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فـي
ضـلال
مـا
عنـه
قـط
نكبـت
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يرتـوي
الشـرب
بالشراب
وأظما
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وإذا
مـا
راحونـا
شباعي
سغبت
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حــالتي
حالــة
الخلاف
وفقــا
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أن
يكونــوا
مخرنبقيـن
وثبـت
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نفـس
تـوبي
فقـد
خسـرت
نفيسا
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نفس
مه
مه
كفى
كفى
ما
اكتسبت
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كـم
رمـاة
قد
اخطأوا
في
مرام
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وإذا
أخطــأوا
المـرام
أصـبت
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تبـت
ممـا
جنيـت
يا
رب
فاقبل
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وعسـى
أن
تتـوب
إذا
أنـا
نبت
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فلقـد
طـال
مـا
حضرت
المعاصي
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وإذا
شــوهد
المطيعــون
غبـت
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ضـاع
عمري
لهوا
ولم
أدر
يومي
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اخميسـا
قـد
كـان
أم
هـو
سبت
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ذهــب
الاطيبــان
منــى
وإنـي
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ســأراني
عمــا
قليــل
ذهبـت
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فـإلام
التفريـط
فـي
جنـب
ربي
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لسـت
أخشـى
مـن
لام
هلا
اجتنبت
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لـم
يـا
قلـب
لـم
تـرق
حنانا
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أبــدا
فيــك
للقســاوة
نبـت
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أب
إلى
الله
وانف
عنك
التآبي
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فعلــى
رغــم
أنفـك
الآن
أبـت
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رب
وفــق
للصـدق
قلـبي
فـإني
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حيـث
لـم
يصـدق
الفـؤاد
كذبت
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جئت
لا
خيـر
فـي
صـحيفة
فعلـى
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بـل
لظنـى
الجميـل
فيـك
صحبت
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رب
عفــوا
عنـي
وثبـت
فـؤادي
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وأنلنــي
مثابــة
حيــث
ثبـت
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رب
يســـر
ولا
تعســر
حســابي
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وبحســبي
إنــي
إليــك
أنبـت
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رب
أكـرم
شـيبي
وأعـف
وسـامح
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رب
آمــن
خــوفي
فمنـك
رهبـت
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رب
هـب
لـي
الأمـان
إنـي
ضعيف
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وإلــى
أكـرم
الأنـام
انتسـبت
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هبـت
أنـي
أضـام
وهـو
ضـميني
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إذ
لا
ولاده
الكـــرام
وهبـــت
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أنـا
فـي
جـاهه
فاحسـن
خلاصـي
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وارض
ربــي
ففـي
رضـاك
رغبـت
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وعليـــه
مــولاي
صــل
وســلم
|
مـا
لحسـن
الختـام
منك
اطلبت
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