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أبــدور
زهــت
بأبهــج
طلعــه
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أم
جلا
المبســم
الأقـاحي
طلعـه
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أم
محيـا
سـاقي
الحميـا
تبـدي
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فبـدت
مـن
لوامـع
الـبرق
لمعه
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أم
عــروس
الـدنان
حيـث
تجلـت
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لاح
فــي
الحــان
للأشـعة
سـطعه
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أم
حلـى
المجـد
والكمال
تباهت
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بفـتى
فـي
المضـيق
يبـذل
وسعه
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كــل
مــن
أمــه
ووافـى
حمـاه
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حــل
فــي
حيــه
بـأكرم
بقعـه
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ليـس
يسـعى
فـي
غيـر
صنع
جميل
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شـكر
اللَـه
فـي
مسـاعيه
صـنعه
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أبــداً
دأبــه
إذا
عــن
خطــب
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بعـد
كشـف
الأضـرار
يجلـب
نفعه
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كـم
لوفـد
النـدا
مناديه
نادى
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أن
هلمـوا
سـعياً
إلى
خير
نجعه
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حسـب
مـن
يطلب
الغنى
والمعالي
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فــي
مـدى
دهـره
مكـارم
جمعـه
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هــو
بــرأ
يــديه
بحــر
خضـم
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وســواها
لــدى
التكـرم
ترعـه
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روض
فضــل
طـابت
مجـاني
جنـاه
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مـن
أتـى
دوحـه
جنـى
منه
ينعه
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يـا
راعـي
اللَه
وادياً
قد
رعاه
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وحمـــى
ضــرعه
ونضــر
زرعــه
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يفعــل
المركمـات
سـراً
وجهـراً
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لا
يـرائي
بهـا
ولـم
يبـغ
سمعه
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قـد
تحـامى
اسـتحباب
كـل
حرام
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وتجـافى
عـن
كـل
مكـروه
بـدعه
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رب
بكــر
عــذارء
إن
زوجوهــا
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بـابن
مـزن
تلـد
من
الدر
بضعه
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حرمــت
بعــد
وهــي
بنــت
حلال
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رب
أصـل
قـد
حـرم
اللَـه
فرعـه
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كـم
مـدير
دعـاه
يومـاً
إليهـا
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فــأبى
منكــراً
أســاغه
جرعـه
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وكــأين
مـن
شـادن
قـام
يسـعى
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وهــي
فـي
كفـه
كمصـباح
شـمعه
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بريــاض
ترقــص
البــان
فيهـا
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مذ
على
العود
أنشد
الطير
سجعه
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أصـبح
الزهـر
ضـاحكاً
في
رباها
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حيـث
بـات
الغمـام
يرسـل
دمعه
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إن
جلا
كاســـه
عليــه
عروســاً
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ولعيــن
الرقيـب
إذ
ذاك
هجعـه
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قــال
لا
تجلهــا
حرامــاً
وأرخ
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أجــل
لـي
سـنة
النـبي
وشـرعه
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مــا
حلالـي
سـوى
حلالـي
فـدعني
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لسـت
أرضـى
بيـع
الثمان
بسبعه
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قـد
خلعـت
العـذار
في
حب
عذرا
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ء
عليهــا
مـن
المحاسـن
خلعـه
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شــفع
الــدهر
وترهــابي
حـتى
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صـرت
جـاراً
لهـا
وللجـار
شفعه
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وتهـاني
السـرور
وافـت
وقـالت
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بالرفـا
والبنيـن
وافيـت
سرعه
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أيهـا
الماجـد
الـذي
عـز
شانا
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وحمــى
بــالعلى
حمـاه
وربعـه
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هــاك
منــي
هديــة
هــي
عقـد
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مـن
حلـى
قـد
سمت
فخاراً
ورفعه
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درر
كلهــــا
صـــفات
كمـــال
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لــك
نظمتهــا
بأكمــل
صــنعه
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وعســى
مـن
سـعى
إليـك
وأنهـى
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أنــه
بــالمنى
يشــنف
ســمعه
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