|
أكـؤوس
تجلـى
ببنـت
الدوالي
|
أم
شـهى
الرضاب
فيه
الدوالي
|
|
فأدرهـا
يا
ساقي
الراح
صرفاً
|
وامـزج
الكاس
من
لماك
الزلال
|
|
واسـقنيها
علـى
أقـاحي
ثغـر
|
وجنــى
وجنــة
وعنــبر
خـال
|
|
بريـاض
إذا
شـدا
الطير
فيها
|
نقطتـه
أيـدي
النـدى
باللآلي
|
|
نفـخ
أزهرهـا
يحيـى
الندامى
|
بشذا
المسك
أو
بطيب
الغوالي
|
|
باكرتها
الندمان
والطل
يبكي
|
نســــمات
تمـــر
ذات
اعتلال
|
|
وقــدود
الأغصـان
ماسـت
دلالاً
|
وانثنـت
عـن
رشـاقة
واعتدال
|
|
وظلال
الكـروم
تغنـي
الندامى
|
بالربــا
عــن
أسـرة
وحجـال
|
|
بيــن
ورد
ونرجـس
عـن
يميـن
|
وشــقيق
وسوســن
عــن
شـمال
|
|
يـا
نديمي
هيا
فقد
طاب
شربي
|
إن
حـالي
فيـه
غنى
عن
سؤالي
|
|
وأجـلّ
كاسي
في
كف
أغيد
يزري
|
بعيـون
المهـا
وجيـد
الغزال
|
|
لـو
تثنـي
بين
الغصون
لقالت
|
مـا
لميـال
ذا
القوام
ومالي
|
|
إن
رنـا
لحظـه
رمـت
حاجبـاه
|
عــن
قسـى
مقرونـة
بالنبـال
|
|
أبـدا
خصـره
مـن
الردف
يشكو
|
أيطيـق
السـقيم
حمـل
الجبال
|
|
تخجـل
الـورد
وجنتـاه
فيبدو
|
منهمــا
فيـه
حمـرة
الحجـال
|
|
رب
سـاق
قـد
نزه
الشرب
فيها
|
عـــن
صـــدود
وجفــوة
وملال
|
|
وتهــادى
يهــز
ميــاس
قــد
|
بغصـون
الريـاض
ليـس
يبـالي
|
|
قرب
الكاس
من
دراري
الثنايا
|
فشـهدنا
النجـوم
ذات
اتصـال
|
|
فكــان
الســلاف
حيــث
جلاهـا
|
كـوكب
الشمس
بين
أيدي
الهلال
|
|
وكـأن
الأنهـار
عنـد
العطايا
|
الهزبـر
العبـاس
عند
النزال
|
|
مـن
يضـاهي
جـدواه
وهو
حفيد
|
لـولى
النعمـاء
ذات
التوالي
|
|
همــم
دونهـا
السـماك
سـموا
|
وعلا
لـم
يكـن
لهـا
من
معالي
|
|
ومزايـا
قـد
طـاب
غـض
جناها
|
وسـجايا
أبـدت
حميـداً
لخصال
|
|
يـا
لهـا
دولـة
تحلـت
بملـك
|
قـد
تخلـى
عن
شائنات
الزوال
|
|
أمـرت
بالهـدى
وبالعدل
قامت
|
ونهــت
عــن
مظــالم
وضــلال
|
|
في
معال
لو
تأمر
الدهر
أمراً
|
لــتى
طائعـاً
قريـن
امتثـال
|
|
يـا
مليـك
الزمان
يا
نسل
جد
|
آلــه
فـي
الفخـار
أشـرف
آل
|
|
لــك
جــدان
جـد
حـظ
تعـالى
|
عــن
نظيــر
فــي
عـزة
وجلال
|
|
ثـم
جـد
بـه
الملـوك
تبـاهت
|
إذا
غـدا
بينهم
عزيز
المثال
|
|
فتعـادى
الأيـام
مـن
هو
عادي
|
وتـوالي
الـذي
لـه
قد
يوالي
|
|
ســؤدد
لا
يــزال
دون
حمــاه
|
وقـع
بيض
الظبى
وسمر
العوال
|
|
أيــد
اللَـه
عـز
فخـر
حلاكـم
|
بانتظــام
يــدوم
دون
اختلال
|
|
أنـا
حسـان
مـدحكم
وامتداحي
|
بثنـاء
يبقـى
بقـاء
الليالي
|
|
جئت
أشـكو
إليـك
جـور
زمـان
|
عيـل
فيـه
صـبري
وصبر
عيالي
|
|
وإذا
مـا
سـوعدت
فيـه
بوعـد
|
وطلبـت
الإنجـاز
طـال
مطـالي
|
|
بعـت
خيلـي
بالبخس
ثم
حميري
|
برخيــص
قـد
بعتهـا
وبغـالي
|
|
أتــرى
أزمـن
الزمـان
فصـمت
|
أذنــاه
وليــس
يسـمع
قـالي
|
|
أم
أنا
الجان
إذ
مدحت
سواكم
|
فجـزائي
لـديه
منـع
النـوال
|
|
تبـت
عن
مدح
غير
بابك
يا
من
|
أنـت
ذخـري
ومـوئلي
وثمـالي
|
|
وتجــردت
عــن
ســواك
لعلـى
|
أكتسـى
خلعـة
السنا
المتلالي
|
|
وترجيـت
مـن
جميـل
العطايـا
|
بغلــة
حالهـا
يليـق
بحـالي
|
|
إن
بـدا
لي
ركوبها
تهت
عجباً
|
فـي
ازدهـاء
وبهجـة
واختيال
|
|
أو
بدا
لي
ارتباطها
فاجتلاها
|
فـي
مجالي
الجمال
زين
مجالي
|
|
فتفضـل
وامنـن
وانعم
على
من
|
هـو
عبد
من
بعض
بعض
الموالي
|
|
وتقبــل
وصــيفة
هــي
بكــر
|
ألبســتها
حلاك
حلـى
الجمـال
|
|
منتهـى
قصـدها
وغايـة
سـؤلي
|
أن
يـارعي
لهـا
بعين
الكمال
|