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صــبح
محيــاك
بليـل
العـذار
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أسـفر
أم
ليـل
بـدا
فـي
نهار
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وصـــدغك
الملــوي
أم
عقــرب
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يلسـع
أحشـائي
فيعـي
القـرار
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فالصــدغ
مــن
آس
ومـن
نرجـس
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عينــاك
والخـدان
مـن
جلنـار
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أيـا
أخا
الغصن
إذا
ما
أنثني
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ويـا
أخـا
البدر
إذا
ما
أنار
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أنــي
أهــواك
علــى
مـا
أرى
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مـن
قلـة
الـود
وبعـد
المزار
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كـم
جـرت
بـالحكم
علـى
عاشـق
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أكـل
مـن
قـد
ولـي
الحكم
جار
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أنــت
الـذي
أجـج
فـي
أضـلعي
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نـاراً
تـذكيها
الدموع
الغزار
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إن
يـك
فـي
الأضـلاع
حـر
الجوى
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فمــا
دمـوع
العيـن
إلا
حـرار
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يقـدع
زنـد
الشـوق
فـي
مهجتي
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نـارً
ومـن
العين
يطير
الشرار
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كــم
ليلــة
بــالأنس
قضـيتها
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يشـدو
المغنـي
والحميـا
تدار
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يطــوف
فــي
كاســاتها
أغيـد
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دبــت
بخــديه
نمـال
العـذار
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لــم
يـرق
العيـن
سـوى
حسـنه
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مـا
لـم
يكـن
من
حسنه
مستعار
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يرتــج
مـن
أردافـه
فـي
نقـا
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يكـــاد
ينشــق
عليــه
الأزار
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فاعتقــل
الصــعدة
مــن
قـده
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واسـتل
مـن
جفنيه
بيض
الشفار
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مـا
زال
يرمـي
الليل
من
كاسه
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بشــعلة
حمــراء
حــتى
أنـار
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لـو
لـم
تكـن
ذهبية
ما
التوى
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مـن
رشـحها
في
معصميه
السوار
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أقبــل
فيهــا
باســماً
ثغـره
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وهـي
كثغـر
فـض
عنـه
الخمـار
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والجــو
قــد
طبـق
فـي
عـارض
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يهـزم
بـالقطر
محـول
الـديار
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كأنمــا
الرعــد
فنيــق
بــه
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يحـدو
غـواديه
حـداء
العشـار
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فــي
روضــة
غنــاء
مصــقولة
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لا
غــب
سـقياها
ملـث
القطـار
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حـاك
الربيـع
الغـض
أبرادهـا
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بنفســـجاً
طـــرزه
بــالعرار
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ســدى
لــه
السوسـن
حـتى
إذا
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أطـــاله
ألحمـــه
بالبهــار
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فيالهـــا
مطارفـــاً
وشـــعت
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توشـــيع
ربــات
الأزار
الأزار
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دبجهــا
النرجـس
فـاعجب
لهـا
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مــدبجها
قـد
دبجـت
بالنضـار
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والأيــك
فــي
أعطــافه
راقـص
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إذ
غنـت
الـورق
وصـاح
الهزار
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وغـــارب
للهــو
لــم
يعــده
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كــوري
ولـم
أشـدده
إلا
وسـار
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طــويت
للعمــر
بــه
مهمهــاً
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طـي
المـذاكي
حلبـات
المغـار
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فليتنـي
مـا
جـزت
هـذا
المدى
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كلا
ولا
قشــعت
هــذا
الغبــار
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وليــت
ذاك
الليـل
لـم
ينطـو
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ولـم
يكـن
يطلـع
هـذا
النهار
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إذ
أغتــدي
والغيـد
يرمقننـي
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كــأن
مــن
أهـدابهن
العـذار
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فعــاد
مبيضــاً
كنـور
الكبـا
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أرخـص
بهذا
النور
عند
النوار
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قطــع
حبـل
الـود
مـا
بيننـا
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بياضــه
تقطيـع
بيـض
الشـغار
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يـا
راكـب
الوجنـاء
يطوي
بها
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مهــامه
البيـد
قفـاراً
قفـار
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عـرج
علـى
الكـرخ
وسـمل
علـي
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مـن
فـي
محيـاه
الندي
استنار
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الحسـن
الزاكـي
حليـف
النـدى
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إن
فـارق
الـزوار
محل
الديار
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يـا
مـؤل
الوفـد
ومأوى
الورى
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ونجعـة
العـافي
وحامي
الذمار
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أقســم
بــالخوص
تجـوب
الفلا
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أنجــد
فيهـا
سـائق
أو
أغـار
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تحمــل
شــعثاً
فـوق
أكوارهـا
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قد
ألبسوا
الليل
رداء
النهار
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حــتى
أناخوهـا
بحيـث
انجلـت
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مشـاعر
النسـك
ومرمـى
الجمار
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لأنــت
رب
المجــد
رب
العلــى
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رب
الأيـادي
الـبيض
رب
الفخار
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أعيــت
أياديــك
الـورى
عـدة
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كالشـهب
إلا
أن
منهـا
البحـار
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كــأن
مـن
نيلـك
صـوب
الحيـا
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لــو
أنـه
مـن
فضـة
أو
نضـار
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وانــت
قطــب
والمعـالي
رحـى
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فلــم
يكـن
إلا
عليـك
المـدار
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ولــم
يـرق
للمجـد
مـن
معصـم
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لـم
يلـو
مـن
علياك
فيه
سوار
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وليــس
للعليــاء
مــن
مفخـر
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مـا
لـم
يكن
نعلك
تاج
الفخار
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هــل
أمــت
العيـس
بركبانهـا
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مـأوى
سـوى
مـأواك
أو
مستجار
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كأنمــا
الأكــوار
آلــت
علـى
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أظهرهــا
إلا
إليــك
الظهــار
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فاسـلم
رغيـد
العيـش
ما
غردت
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بلابــل
السـعد
وغنـى
الهـزار
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