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مـا
تحرجـت
يـا
يد
البين
بطشاً
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يفــتى
ثــل
للشــريعة
عرشــا
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أحمــد
شـرع
أحمـد
فيـك
أضـحى
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مقفـر
الربـع
بـدل
الأنـس
وحشا
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مـا
عهـدنا
للبـدر
قبلـك
قبرا
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لا
لعمــــري
ولا
لثهلان
نعشـــا
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لسـعتنا
عليـك
أفعـى
الليـالي
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بيـن
نـابين
تنهـض
القلب
نهشا
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فقـديماً
نـدعو
الكـواكب
شـهباً
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وحـديثاً
نـدعو
الكـواكب
رقشـا
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أسـرع
الحـزن
بالفؤاد
ارتكاضا
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يــوم
تنعــى
وبالعظـام
تمشـى
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فاســتقامت
لـك
الأضـالع
قصـفا
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واســتهلت
لــك
المــدلع
رشـا
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فبــبيض
طــوراً
وطــوراً
بحمـر
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أنقـش
الـترب
مـن
ورائك
نقشـا
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قــد
تشـب
الأنفـاس
وهـي
نفـوس
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وتهـامى
مـاء
البكـا
وهو
أحشا
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رعــت
أقــدام
حامليـك
فطاشـت
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وتلــوت
أيــديهم
لــك
رعشــا
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كـــم
تهجــت
تحــت
جنــح
ظلام
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مســتمراً
ترجــو
الإلـه
وتخشـى
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وهجــرت
الصــبا
وصـمت
هجيـرا
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بعيـون
تنـدي
البكـا
وهي
عطشى
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لـو
بغيـر
الـثرى
لنـا
صح
دفن
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واتخــذنا
لطـائر
القـدس
عشـا
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لحفرنــا
لــك
الفـؤاد
ضـريحا
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واتخــذنا
لـك
النـواظر
فرشـا
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وبلــى
صــرت
بيـن
حـور
قصـور
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قـد
أعـدت
لـك
الحريـر
الموشى
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لــم
أخـل
يـا
أخـي
أن
قريضـي
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لا
وعينيــك
فـي
مراثيـك
ينشـى
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لا
يرعــك
المصــاب
جـل
طروقـا
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يـا
علـي
الجنـاب
وقيـت
جهشـا
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يقطــع
السـيف
بالضـريبة
لكـن
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بالصـفا
الصـلد
لا
يـؤثر
خدشـا
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حـالفت
بيتـك
المعـالي
كما
قد
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خــالفت
بيـت
مـن
أسـراك
غشـا
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كــل
أهليــك
فضـل
هـذا
كهـذا
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مـا
تسـاوت
هـدب
النواظر
رمشا
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مــن
تجئه
تجــده
غـراً
كريمـا
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وفــتى
مفتيــاً
وغيثــا
أجشـا
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وأويســاً
أويــس
زهــد
ورشــد
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وإياســاً
إيــاس
فهــم
وانشـا
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يـا
ابـن
من
قلد
الجواهر
عقداً
|
راق
للشـرح
حليهـا
يـوم
تنشـى
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هتــك
الســتر
ثـم
عـن
مشـكلات
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قـد
جلاهـا
تجلـو
النواظر
عمشا
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يا
سحاب
الندى
إذا
المحل
أكدى
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وسـراج
الهـدى
إذا
الليل
يغشى
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وإمامـاً
بـه
اقتـدينا
اهتدينا
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وغـوى
مـن
غـوى
بفيفـاء
غطشـا
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إيـن
لا
أيـن
مـن
يجاريـك
فضلا
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وارتياحـاً
إلـى
المعالي
وبطشا
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بمنـــال
يـــرد
كـــف
أشـــلٍّ
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وانبلاج
يصـــد
مقلـــة
أعشــى
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دمــت
للعـالمين
ليثـاً
وغيثـا
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بكلاً
حالتيـــك
ترجــى
وتخشــى
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