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نزعتـكَ
مـن
يَـدها
قريشٌ
صقيلا
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وطوتـك
فـذاً
بـل
طوتـك
قبيلا
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فجعـت
بفقـدك
واحـداً
فكأَنهـا
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فجعــت
بـآل
النضـر
جيلاً
جيلا
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وتـذكرت
فـي
يـوم
فقدك
فقدها
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مضـراً
فأوصـلت
العويـل
عويلا
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وغـدت
تطـوف
خلال
نعشـك
ولهـاً
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وأتــت
علـى
أعـواده
تقـبيلا
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بكـر
النعـي
لها
بواشج
أصلها
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فلتبــك
يومـك
بكـرةً
وأصـيلا
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أكسـبتها
العز
الكثير
محامداً
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تبقـى
فعـز
بـأن
تعيـش
قليلا
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صـبغت
عليـك
مدامها
لولم
تكن
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حمـراً
لخيلـت
البطـاح
النيلا
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حسـرت
فكنت
السرد
من
أدراعها
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وضــحت
لظـل
لـم
تجـده
ظليلا
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يـا
سـيفها
وسـنامها
غادرتها
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ظهــراً
أجـب
وسـاعداً
مشـلولا
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ولأنــت
معقلهـا
أصـاب
تصـدعاً
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ولأنــت
صـارمها
أصـاب
فلـولا
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لسـلت
بك
البطحاء
عن
أشياخها
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إذ
أنـت
أكـرم
من
نموه
سليلا
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فمقـام
إبراهيـم
يعلـو
صارخاً
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حزنـاً
عليـك
وحجـر
إسـماعيلا
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مهلاً
أبـا
موسـى
فإنـك
والعلى
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ولــك
السـلامة
مزمعـان
رحيلا
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يأيهـا
الجبـل
الممنـع
ركنـه
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هــول
لعمـرك
أن
نـراك
مهيلا
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نكـد
الإقامة
أن
نقيم
ولم
تقم
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فينــا
تنيـل
جزيلـة
وجـزيلا
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ومن
الردى
أن
لا
نشاطرك
الردى
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ومـن
الغليـل
بـأن
نبل
غليلا
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ملأت
محاســـنك
البلاد
فضــيقت
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حـتى
لشخصـك
لـم
يـدعن
مقيلا
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لوقفت
ما
بين
النوائب
والورى
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حصناً
تقي
الخطب
الجليل
جليلا
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حـتى
تخبـط
عـاثراً
بـك
ظفرها
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إذ
لـم
تجـد
بـك
للأنام
سبيلا
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أردى
أبـا
موسى
الردى
فتكوري
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يـا
شـمس
وادرعـي
عليه
أفولا
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المنعــش
الآمـال
غـادر
نعشـه
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راجـي
الجدا
لا
يعرف
التأميلا
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وعليـه
عـولت
الـورى
وأظنهـا
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فقـدت
بفـادح
خطبـه
التعويلا
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كـان
المحـرم
مخـبراً
فأريتنا
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يـا
جعفـر
فيـه
الحسين
قتيلا
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فكــأن
جســمك
جســمه
لكنــه
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كـان
العفيـر
وكنت
أنت
غسيلا
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وكـأن
رأسـك
رأسـه
لو
لم
يكن
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عــن
منكـبيه
مميـزاً
مفصـولا
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وجبينـك
الوضـاح
مثـل
جـبينه
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بلجــاً
وليـس
كمثلـه
تجـديلا
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وحملـت
أنت
مشرفاً
أيدي
الورى
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وثـوى
بنعـش
لـم
يكـن
محمولا
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أن
تنــأ
عنــا
راحلاً
كرحيلـه
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فلـــرب
ســجاد
تركــت
عليلا
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ولفقــد
مهــدي
لجعفـر
مـورث
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مـن
جعفـر
فـي
فقـد
إسماعيلا
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يا
أيها
المهدي
يا
علم
الهدى
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أعيـا
التصـبر
من
سواك
فعيلا
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أيقنـت
حيـن
نعـي
إليك
مصدقاً
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ونخــال
أنــك
خلتــه
تخييلا
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حوشـيت
مـن
جلد
القساه
وإنما
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هـدي
النـبي
قد
اجتباك
خليلا
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أنـت
الـذي
ترضى
بما
يرضى
به
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بــاري
البريـة
هينـاً
وجليلا
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أأقـول
صـبراً
لا
وصـبرك
إن
لي
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جزعــاً
وصـبرك
لا
يـزال
جميلا
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بـك
نهتـدي
لسـبيل
كـل
فضيلة
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وعلـى
منالـك
نجتـدي
تعـويلا
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ولمـن
وجـدت
كمن
فقدت
شمائلاً
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والكـل
عـن
كـل
ينـوب
بـديلا
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إن
لـم
يماثـل
من
ولدت
مماثل
|
فلقـد
تـرى
هـذا
لـذاك
مثيلا
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تلـك
الجـواهر
كلهـا
من
معدن
|
مـا
حـال
عـن
حالاتهـا
تبديلا
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ثقفـت
مـن
ذاك
الوشيج
ذوابلاً
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وصـقلت
مـن
ذاك
الفرند
صقيلا
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يـا
قاصـد
الفيحـاء
في
تفاحة
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زيافــة
تصــل
الوجيـف
ذميلا
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عنـس
كـتيس
القاع
أرسل
شارداً
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أو
كــالظليم
مــذعراً
إجفيلا
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كومـاء
مـا
بين
الهذاب
كهضبة
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شــاء
الإلـه
لنقلهـا
تحـويلا
|
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أنسـت
إذا
أنس
الرعاة
بشكلها
|
فحلا
يســابق
شــدقماً
وجـديلا
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لـم
تكحـل
عيـن
بمـرأى
ردفها
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إلا
وجـــاوزت
النــواظر
ميلا
|
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وكأنهــا
بيـن
التنـائف
آصـف
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فـي
عـرش
بلقيـس
يمـر
عجـولا
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لا
يهتـدي
كعـب
لبـارع
وصـفها
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فيمــا
تفنــن
مقصـراً
ومطيلا
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أنـخ
النيـاق
لصـالح
هو
صالح
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مـن
قبـل
أوتـي
ناقـة
وفصيلا
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وأعقـل
يـديها
في
مرابع
معقل
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للوفـد
يحسـبه
النزيـل
نزيلا
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المشرف
الجفنات
في
غسق
الدجى
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والقـائد
الصعب
الحرون
ذلولا
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المحتـبي
بالدسـت
تحسـب
أنـه
|
أســد
تصــدر
بالنـدي
الغيلا
|
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المحتـبي
بالدسـت
تحسـب
وجهه
|
قمـر
السـماء
وتاجه
إلا
كليلا
|
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المحتـبي
بالدسـت
تحسـب
خلقه
|
روضـاً
يبـاكريه
النسيم
عليلا
|
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المحتـبي
بالدسـت
تحسـب
لفظه
|
دار
يفصـــل
نظمــه
تفصــيلا
|
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المحتـبي
بالدسـت
تحسـب
شخصه
|
شـخص
النـبي
وقـوله
التنزيلا
|
|
أن
أطـرق
استولى
الأنام
مهابة
|
فــإذا
تبسـم
طـارحوه
القيلا
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تسـمو
لطلعته
العيون
إذا
بدا
|
كالسـيف
أرهفـه
القيون
صقيلا
|
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يتباشـــرون
إذا
رأوه
كــأنه
|
بــرق
ســما
للمحليــن
مخيلا
|
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فإليكهـا
جهـد
المقل
وإن
تكن
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قصـرت
وكـان
بك
المجال
طويلا
|
|
ولـو
استطعت
نظمت
في
أبياتها
|
آي
الكتــاب
مــرتلاً
تــرتيلا
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