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طلعــت
ألــوكته
عليـك
بأسـعد
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وأتتـك
تحسـبها
سـبيبكه
عسـجد
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وكــأن
أحرفهـا
علـى
وجناتهـا
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آسٍ
العــذار
يشــق
خـدي
أمـرد
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ولقـد
أتـت
والكتـب
بيض
قبلها
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ورديــةً
تجلــو
خــدود
مــورد
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وتبســمت
تفــتر
عـن
كلماتهـا
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كـالخود
تبسـم
عـن
خمـار
أسود
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كـاللؤلؤ
المنثـور
وشي
حروفها
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لـو
لـم
تكـن
صبغت
بماء
زبرجد
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بالشـمأل
الشـمل
استقل
نسيمها
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وأريجهـا
قـد
ضاع
بالند
الندي
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حـتى
كأنـك
قـد
كتبـت
سـطورها
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دون
اليــراع
بمنــدل
متوقــد
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فلثمتهـا
فـي
نـاظري
لا
في
فمي
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وحملتهـا
فـي
صـبوتي
لا
في
يدي
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وطفقــــت
مطرفـــي
تمـــايلاً
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فكــأنني
خــامرت
نشـوة
صـرخد
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فكــأن
معناهــا
ســلافة
قرقـف
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وكأنمـا
يسـقي
السـلافة
منشـدي
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أمشــرفاً
قــدري
بـرائق
لفظـه
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ومطــوق
جيــدي
بــه
ومقلــدي
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قـل
كيـف
تختلـس
المداد
مقدراً
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كــفٌ
قـد
انبجسـت
ببحـر
مزبـد
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وتشـكل
الكلمـات
فـي
رشـحاتها
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وهـي
السـحابة
تسـتهل
لمجتـدي
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يا
ساكني
الزوراء
حسبكم
النوى
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فلقـد
وهـى
جلـدي
لكـم
وتجلدي
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أمرضــتموني
بالبعــاد
وإنمـا
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أقصـى
شـفائي
أن
أراكـم
عـودي
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ألقيـت
إقليـدي
إليكـم
طائعـاً
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ولكـم
تقـاعس
عـن
سواكم
مقودي
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كـثرت
علـى
النائحـات
صـوارخا
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إن
لـم
أكـثر
فـي
هـواكم
حسدي
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مــوهت
عنــك
بحــاجر
وبلعلـع
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ولأنـت
مـن
تلـك
العبارة
مقصدي
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فليـح
بـالزوراء
عيشـك
سـائغا
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إنــي
أغــص
بكــل
عيـش
أرغـد
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ولهـن
أعينـك
الرقـاد
فـإن
لي
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عينـاً
إذا
رقـد
الملا
لـم
ترقد
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إن
أسـلمتك
يـد
الغـرام
فإنني
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ملقــى
بقبضـتها
أورح
وأغتـدي
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أو
تنس
لي
العهد
القديم
فإنما
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نسـيان
عهـدي
حيـن
أقوى
معهدي
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فلـو
أن
لـي
للكـرخ
أوبة
راجع
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لتخــذت
مغنــاه
مقـدس
مشـهدي
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