|
خمسـة
طـاروا
مـن
عيون
الشباب
|
فــوق
طيــارة
كمثــل
العقـاب
|
|
اخـذت
فـي
الجـو
الرفيع
تعالى
|
ثـم
خـرت
مـن
اوجهـا
كالشـهاب
|
|
ان
ذاك
الصـعود
فـي
الجو
منهم
|
كـــان
للمجـــد
والعلا
والغلاب
|
|
صــدمة
فــي
هبوطهـا
اهلكتهـم
|
بعـد
ان
حلقـت
بمجـرى
السـحاب
|
|
لا
تـرى
بعـدها
علـى
الارض
منهم
|
غيـــر
اشـــلاء
او
دم
منســاب
|
|
انمــا
اوقــف
المحــرك
فيهـا
|
ســـبب
قـــاهر
مــن
الاســباب
|
|
هلكـوا
فـي
شـرخ
الشـباب
فيـا
|
للــرزء
لمـا
عـرا
وياللمصـاب
|
|
فتيـة
طـارت
تبتغي
المجد
ذخرا
|
ولاوطانهــــا
تخلـــد
ذكـــرا
|
|
فــوق
طيــارة
تطـوف
بهـم
فـي
|
الجــو
هــدارة
فتشــبه
نسـرا
|
|
كلمـا
اسـتذكرت
الفجيعة
احسست
|
مــن
الحـزن
فـي
فـؤادي
جمـرا
|
|
ليـس
عنـدي
ما
استقى
منه
شعري
|
غيــر
عيـن
مـن
الكآبـة
عـبرى
|
|
انا
في
الحزن
ارسل
الشعر
دمعا
|
سـاخنا
ثـم
ارسـل
الـدمع
شعرا
|
|
حسـب
من
مات
عند
خدمته
اوطانه
|
انــــه
بهـــا
كـــان
بـــرا
|
|
عـاش
مـن
بـر
بـالمواطن
محمـو
|
داً
فـان
مـات
فهو
بالحمد
احرى
|
|
فتيـة
صـرعى
فارقتهـا
الحيـاة
|
فبكتهـــا
الآبـــاء
والامهــات
|
|
وبكاهـا
العـراق
حزنـا
عليهـا
|
وبنـــوه
ودجلـــة
والفـــرات
|
|
اينمــا
التفـت
اشـاهد
شـحوبا
|
فـــي
وجــوه
عيونهــا
خضــلات
|
|
شــيعتها
الــى
مقــابر
شــتى
|
عــــبرات
وراءهـــا
عـــبرات
|
|
انمـا
المجـد
لا
يمـوت
وان
كـا
|
ن
ذووه
لحـــادث
قــد
مــاتوا
|
|
ايهــا
الشــعب
لا
يثبطـك
يـأس
|
انمـا
فـي
المـوت
الملـم
حياة
|
|
ايهـا
النسـر
ما
دهاك
وقد
كنت
|
اذا
طــرت
لــم
يخنـك
الثبـات
|
|
هــي
دنيــا
كــثيرة
الامتــاع
|
ودعوهـــــا
ولات
حيــــن
وداع
|
|
وهـو
المجد
بالمساعي
اقتنوعها
|
حبـذا
المجـد
يقتنـي
بالمساعي
|
|
قـد
اضـعناهم
خمسـة
ليـس
فيهم
|
مــن
بــه
رعـدة
فيـا
للضـياع
|
|
مشــهد
للحيـاة
والمـوت
يشـجى
|
مــا
بــه
مــن
تنـازع
وصـراع
|
|
لهـف
نفسـي
علـى
شـباب
تـردوا
|
فنعـاهم
الـي
فـي
الصـبح
نـاع
|
|
شـاع
ذاك
النعـي
حول
الفراتين
|
فاثقــل
بــه
علــى
الاســماع
|
|
جنحــت
للغــروب
شــمس
نهـاري
|
ثـم
منهـا
لـم
يبـق
غيـر
شعاع
|
|
وقــف
المــوت
للانــام
رصـيدا
|
كــل
يـوم
يريـد
منهـم
شـهيدا
|
|
شــطت
الــدار
بالاحبــة
عنــا
|
وعسـى
مـن
نـاى
بهـم
ان
يعيدا
|
|
فتيـة
كادتهـا
صـروف
الليـالي
|
والليـالي
مـن
شأنها
ان
تكيدا
|
|
انـا
لـو
لا
شـيخوختي
ثـم
دائي
|
كــل
يـوم
نظمـت
فيهـم
قصـيدا
|
|
حبـذا
الليـل
والنهـار
لو
انا
|
فيهمــا
نســتطيع
ان
لا
نبيـدا
|
|
قـد
ظننت
الذي
ثوى
يسكن
القبر
|
قريبــا
منــي
فكــان
بعيــدا
|
|
فـات
مـن
قـد
رأى
السلام
رغيبا
|
ان
يـرى
في
الاخطار
موتاً
حميدا
|
|
حـــل
يــودي
بخمســة
اطهــار
|
قـــدر
نـــازل
مــن
الاقــدار
|
|
بنسـور
قـد
حلقـت
قبل
ان
يؤذن
|
ضــــوء
الصـــباح
بالاســـفار
|
|
خطــــر
كلـــه
الظلام
ولاكـــن
|
لا
تبــالي
النســور
بالاخطــار
|
|
ركبوهــا
طيــارة
لــم
تخنهـم
|
فــي
تمـارينهم
وفـي
التكـرار
|
|
مــا
دهاهـا
حـتى
هـوت
كشـهاب
|
خـــر
مـــن
جــوه
بلا
انــذار
|
|
ثم
دارت
بهم
على
نفسها
بالرغم
|
عـــن
كـــل
حيلـــة
الطيــار
|
|
ثـم
كـان
الـذي
به
جرت
الاقدار
|
مـــن
ســـقطة
لهـــم
وبــوار
|
|
كـل
يـوم
تعطـى
الحيـاة
ضحايا
|
تبتغــي
ارضـاء
بهـا
للمنايـا
|
|
ان
هـذا
الجميـل
الذي
نحن
منه
|
هـو
مـن
هاتيـك
الضحايا
بقايا
|
|
نبتغـي
تخفيـف
الرزايـا
بلهـو
|
نرتضـــيه
فلا
تخــف
الرزايــا
|
|
لا
اظــن
الحيــاة
تلقـى
سـلاما
|
مـــن
بلايــا
وراءهــن
بلايــا
|
|
ان
مـن
اعطانـا
العقول
اذا
ما
|
شـاء
ان
نـردى
يسـترد
العطايا
|
|
والـذي
انشأ
البرايا
من
الموت
|
معيــد
الـى
البـوار
البرايـا
|
|
كــبر
شــفني
فلـم
يبـق
عنـدي
|
غيــر
قلـب
يئن
تحـت
الحنايـا
|