|
انــت
فـي
شـعر
كـان
فتحـاً
مبينـا
|
واحـــدا
مـــن
اولئك
الخالــدينا
|
|
بعــد
الــف
مــن
الســنين
اتينـا
|
بـــك
يـــا
فردوســـي
محتفلينــا
|
|
وغلــى
قــبرك
الــذي
فيــه
تغفـو
|
نحمــل
الــورد
الغـض
والياسـمينا
|
|
ولــو
أن
الاحــداث
الفــى
مســاغا
|
جعــل
القــوم
حــج
قــبرك
دينــا
|
|
لــك
فــي
تاريــخ
الملــوك
كتـاب
|
يحمــل
الــوحي
والهـدى
واليقينـا
|
|
قمــت
فــي
نظمــه
ثلاثيــن
عامــاً
|
ثـم
لـم
تسـأم
طـول
تلـك
السـنينا
|
|
حـــزت
حينـــا
تجلــة
واحترامــاً
|
وتـــــألمت
للمصــــائب
حينــــا
|
|
شـــاعر
انـــت
جـــامع
للمزايــا
|
خالــد
لا
تــدنو
اليــك
المنايــا
|
|
انــت
فــي
دولــة
البيــان
بحــق
|
ملـــك
ذو
عــرش
ونحــن
الرعايــا
|
|
جــاء
مــا
قــد
نظمتـه
مـن
كتـاب
|
تحفـــــة
فارســــية
للبرايــــا
|
|
ولقــد
اهــديت
الكتــاب
الـى
مـن
|
لــم
يكـن
ذا
علـم
بقـدر
الهـدايا
|
|
والمـــت
بـــك
الرزايـــا
ولكــن
|
انــت
مــا
كنـت
عـابئا
بالرزايـا
|
|
يــا
امــام
القريــض
بعـدك
فينـا
|
نفــد
الشــعر
الجــزل
الا
بقايــا
|
|
قــد
طلبنـا
التحريـر
للشـعر
حـتى
|
كــثرت
فــي
الطلاب
منــا
الضـحايا
|
|
ان
مــا
قــد
قصصــته
مــن
حــروب
|
ســوف
يبقــى
تـأثيره
فـي
القلـوب
|
|
انــت
شــمس
لهــا
البيــان
شـعاع
|
لــم
تمــل
فــي
طريقهــا
للغـروب
|
|
مـــا
لأليـــاذة
الـــتي
حبرتهــا
|
يـــد
هـــومير
مثــل
ذا
الاســلوب
|
|
تلـــك
ليــل
جهــم
وهــذا
صــباح
|
مســـفر
مــا
بــوجهه
مــن
شــحوب
|
|
كنــت
تمشــي
الـى
الامـام
حثيثيـا
|
بخطــى
لــم
تخلــق
لغيـر
الوثـوب
|
|
يهتـف
اليـوم
الوافـدون
من
الاقطار
|
افواجــــا
باســــمك
المحبــــوب
|
|
جل
ما
قد
نظمته
في
مزايا
الفارسين
|
عــــــن
جميــــــع
العيــــــوب
|
|
انــت
فــي
شــعرك
البليــغ
امـام
|
فســــلام
عليــــك
ثــــم
ســــلام
|
|
حبـــذا
مــا
نظمتــه
مــن
كتــاب
|
اكــــبرته
الشــــعوب
والاقـــوام
|
|
انـــت
للشـــرق
شـــاعر
عبقـــري
|
تتغـــــذى
بقـــــوله
الافهــــام
|
|
لســـت
ادري
وليتنـــي
كنــت
ادري
|
أهـــو
الســـحر
ام
هــو
الالهــام
|
|
كنـــت
للنــاس
كوكبــا
ذا
بهــاء
|
اينمــا
القــى
النــور
زال
الظلام
|
|
فـــي
ريــاض
الآداب
غرســك
يحكــى
|
شـــــجرا
مــــن
اثمــــاره
الآلام
|
|
حلمـــا
كــان
مــا
املــت
ولكــن
|
بعـــد
الـــف
قـــد
صـــحت
الاحلام
|
|
انـت
يـا
مـن
بهـرت
بالشـعر
عينـي
|
شـــاعر
المشـــرقين
والمغربيـــن
|
|
انــت
لــو
تمســك
الثريــا
بايـد
|
شــــعراء
امســــكتها
باليـــدين
|
|
انـــت
ممـــا
تشــعه
مــن
ضــياء
|
يملأ
العيــــن
ثـــالث
القمريـــن
|
|
مــــا
كتــــاب
الملـــوك
الا
بلاغ
|
مــن
ابــي
قاســم
الــى
الملـوين
|
|
كلمـــا
جئت
منـــه
اقــرأ
فصــلا
|
اســـبلت
عينـــي
فــوقه
دمعــتين
|
|
تحفــــة
مــــن
بلاغـــة
وشـــعور
|
قـد
جلـت
مـا
فـي
خـاطري
مـن
ريـن
|
|
جمعــت
بعــد
ان
مضــى
الــف
عـام
|
بينـــه
لحمـــة
القريــض
وبينــي
|
|
ان
مــا
نــاله
الـردى
مـن
حياتـك
|
لــم
ينلــه
للعجــز
مــن
كلماتـك
|
|
انــت
فــي
شــعرك
البليــغ
نــبي
|
وكتـــاب
الملــوك
مــن
معجزاتــك
|
|
لــــك
فيــــه
بلاغـــة
حيرتنـــا
|
أي
روح
نفثــــت
فــــي
ابياتـــك
|
|
كــل
مــا
كنــا
قـد
نظمنـاه
قبلا
|
نظــرة
فــي
الحيــاة
مـن
نظراتـك
|
|
كـل
مـا
عنـدنا
مـن
النظـم
والنثر
|
قبســـــناه
منســـــنى
آياتــــك
|
|
كـل
مـا
قـد
قلنـاه
في
هذه
الذكرى
|
ثنــــاء
عليـــك
بعـــض
صـــفائك
|
|
قيــل
لــي
انــت
فـي
حفيـر
ولكـن
|
لـم
اجـد
فـي
الحفيـر
غيـر
رفاتـك
|
|
قصـــرت
فـــي
تقـــديرك
الآبـــاء
|
فتلافـــت
مـــا
فاتهـــا
الابنــاء
|
|
بعــد
الــف
مــن
الســنين
اقـامت
|
لــــك
نيــــروزاً
امـــة
شـــماء
|
|
لـــك
يـــا
حجــة
البلاغــة
شــعر
|
عجـــزت
عـــن
تقليــده
الشــعراء
|
|
بمصـــابيح
شـــعرك
ازدانــت
الارض
|
كمــا
ازدانــت
بــالنجوم
السـماء
|
|
نمقتـــــه
يراعــــة
ذات
حــــول
|
وبــــه
لــــوّحت
يــــد
بيضـــاء
|
|
واذا
ضــيم
الشــاعر
الحــر
يومـا
|
فــــي
بلاد
جلاه
عنهــــا
الابـــاء
|
|
بعـــد
آمــال
كــن
فيــك
خيــالا
|
فاجأتــــك
الحقيقـــة
الســـوداء
|
|
يــا
كتــاب
الملــوك
انــت
كتـاب
|
فيـــه
للنـــاس
حكمـــة
وصـــواب
|
|
خلـــق
الفردوســـي
منـــك
خضــما
|
فــاض
يرغــو
كمــا
يفيـض
العبـاب
|
|
بـك
للشـرق
مـا
اهتـدى
الشـرق
فخر
|
بــك
للغــرب
مــا
ارتقــى
اعجـاب
|
|
بــك
فــي
امــة
قـد
ازدادت
الاخلاق
|
طيبـــــــا
وازدانـــــــت
الآداب
|
|
معجــــزات
وراءهــــا
معجــــزات
|
آمنـــت
اعجابـــا
بهــا
الألبــاب
|
|
انمــا
فــي
الشـعر
الحقيقـة
اصـل
|
والخيـــــالات
كلهــــا
اثــــواب
|
|
واذا
انكــر
النبــوغ
علـى
الشـرذ
|
ق
قريـــق
فـــانت
انــت
الجــواب
|
|
الـــذي
لميقـــم
بـــه
الغرنــوي
|
قـــام
مســـتوفيا
بــه
البهلــوي
|
|
ملــك
مــن
ارقــى
الملــوك
عظيـم
|
لاســـمه
فـــي
ســمع
الزمــان
دوى
|
|
ملـــــك
بالسياســــتين
خــــبير
|
ولـــه
فيهمـــا
الطريــق
الســوى
|
|
اخضــع
الامــة
العظيمــة
بالحسـنى
|
فللــــــه
عطفــــــه
الابـــــوي
|
|
واذا
قـــــــوة
الارادة
جلــــــت
|
جـــل
فيهــم
تأثيرهــا
المعنــةي
|
|
والــذي
لا
يــرى
الحقيقــة
اعمــى
|
والـــذي
ينكـــر
الرشـــاد
غــوى
|
|
انمـا
اليـوم
ليـس
يصلح
للملك
على
|
وجــــــــه
الارض
الا
القـــــــوى
|
|
انـــك
الســيف
فــي
يــد
الايــام
|
قـــد
نضـــته
للحــرب
او
للســلام
|
|
حاقنــا
للــدماء
بالمثــل
منهــا
|
فـــي
صـــدام
الاقــوام
بــالاقوام
|
|
فــي
يــديك
القويــتين
اذا
الامـر
|
دعـــا
حـــق
النقـــض
والابـــرام
|
|
واذا
مـــا
بــدأت
يومــاً
باصــلا
|
ح
جديــــد
فالبــــدء
للاتمــــام
|
|
حبـــذا
ايـــران
وعمــران
ايــرا
|
ن
ومــا
فــي
بلادهــا
مــن
نظــام
|
|
ولقـــد
ســرني
كمــا
ســر
غيــري
|
مــا
بهــا
مــن
نزاهــة
الاحكــام
|
|
زرت
بــالامس
الــروض
امتــع
عينـي
|
واذا
الـــورد
فيـــه
ذو
اكمـــام
|
|
اهـــل
ايـــران
والحــديث
شــجون
|
امــة
مــا
بهــا
يليــق
الســكون
|
|
شــأنها
فــي
التأريـخ
اكـبر
شـأن
|
حبــذا
فـي
التأريـخ
تلـك
الشـؤون
|
|
وعلـــى
عيــن
الشــرق
ران
رقــاد
|
دونــه
فــي
غيـر
الرجـاء
المنـون
|
|
ثــم
انحــى
ينبــه
الشــرق
منــه
|
ملــــك
حــــد
ســــيفه
مســـنون
|
|
انــه
لمــا
قــام
للمجــد
يــدعو
|
شخصــت
عــن
بعــد
اليــه
العيـون
|
|
طـــار
بالشـــعب
كلـــه
للثريــا
|
صــاعدا
لــو
يكــون
مــالا
يكــون
|
|
ســـيعود
المجــد
القــديم
لايــرا
|
ن
فتفضــى
الــى
اليقيــن
الظنـون
|
|
ايهــا
الشــعر
انــك
ابـن
شـعوري
|
تغتـــذي
مـــن
كـــآبتي
وســروري
|
|
حــاملا
ضــحكة
الــذي
عيشــه
كــا
|
ن
رغيـــدا
او
دمعـــة
الموتـــور
|
|
ســالما
مــن
ضــعف
يريبــك
منــه
|
خاليــــا
مــــن
زوائد
وقشــــور
|
|
ليــس
شــعرا
مـا
ليـس
فيـه
شـعور
|
لا
يهيــج
الشــعور
غيــر
الشــعور
|
|
واذا
الشـــعر
لـــم
تهــزك
منــه
|
روعـــة
فهـــو
جامـــد
كــالقبور
|
|
انمـــا
الشــاعر
الموفــق
يمشــي
|
مــن
خلــود
علــى
رقــاب
الـدهور
|
|
معجـب
بـالهزار
كـل
بنـي
الارض
وان
|
لــــم
يكــــن
ســــوى
عصــــفور
|