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كـل
الَّـذين
عَـن
المـواطن
غـابوا
|
يــا
أم
إلا
أحمــداً
قــد
آبــوا
|
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يـا
أم
قـد
جـاءَ
البَريد
ولَم
يجئ
|
مــن
أَحمَــدٍ
يــا
أم
بعـد
كتـاب
|
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أَخــبرته
يــا
أم
فـي
كتـبي
لـه
|
أنــي
مرضــت
فَلَــم
يـوافِ
جـواب
|
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يــا
أم
إن
بقــاءَ
أحمـد
غائبـاً
|
للصــبر
منــي
والعــزاء
غيــاب
|
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يـا
أم
فـي
قلـبي
اضـطراب
مـاله
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يــا
أم
عـن
قلـبي
الشـقيِّ
ذهـاب
|
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يــا
أم
مثلــي
وَالزَمـان
أمضـّني
|
يـا
أم
لَيـسَ
عَلـى
البكـاء
يعـاب
|
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مــا
كــانَ
ظنـي
أن
أَحمـد
مزمـع
|
عنـــي
رَحيلاً
لَيـــسَ
منــه
مــآب
|
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يـا
أم
إنـي
اليـوم
صـرت
بأَحمـدٍ
|
بعــد
الوثــوق
بعهــده
أرتــاب
|
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قــالَت
لَهـا
الأم
الشـَفيقة
خولـة
|
مــا
كــل
ظــنّ
يـا
سـعاد
صـواب
|
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أَســعاد
أَنــت
مريضـة
وأَخـاف
أن
|
تــزداد
فيـك
مـن
الأسـى
الأوصـاب
|
|
لا
تَتْهميـــه
بالســـلو
فَربمـــا
|
عـــاقته
فــي
أَســفاره
أَســباب
|
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قَــد
يوقــف
الإنسـان
عَـن
منـويِّه
|
مــا
لَيــسَ
قبلاً
يَحتَــويه
حســاب
|
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لــي
مـن
تـأخر
كتبـه
عنـا
نعـم
|
عجـــب
إذا
فكــرت
فيــه
عجــاب
|
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لكــن
ذلــك
قَــد
يَكــون
لبـاعث
|
ظنـــي
بكشـــف
غطـــائه
كــذاب
|
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وَلننتظــر
يــومين
بعــد
فربمـا
|
تــأتي
لنــا
بحــديثه
الأصــحاب
|
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إنَّ
الحَقيقَــة
عنــد
ذلـك
تَنجَلـي
|
فَيَــزول
عنــا
هَــذا
الاســتغراب
|
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زارَت
سـعاداً
فـي
المَسـاء
صـَديقةٌ
|
للــدمع
فــوق
خــدودها
تســكاب
|
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قـالَت
لَهـا
مـا
لـي
أَراك
كَئيبـةً
|
أَرَبــابُ
مــاذا
تَعلَميــن
ربــاب
|
|
لِــم
أَنــت
سـاكتةٌ
بربـك
أَخـبري
|
هَــل
عــض
أَحمــدَ
للحَـوادِث
نـاب
|
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لا
تَكتمـــي
عنــي
مغبــة
أَحمَــدٍ
|
أَلَــهُ
بســوءٍ
يـا
ربـاب
أَصـابوا
|
|
مـاذا
سـمعت
تحـدثي
فَقَـد
اِلتَـوت
|
منـــي
لأجـــل
بكــائك
الأعصــاب
|
|
قـالَت
عـزاءَك
يـا
سـعاد
تجلـدي
|
فَلَقَـــد
تقــوَّض
للرجــاء
قبــاب
|
|
إن
اللصــوص
أَتـوا
بليـلٍ
أَحمـداً
|
واِغتــــاله
طمــــع
لهـــم
غلاب
|
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قَـد
جـاءَ
فـي
هَـذا
لِزَوجـي
قاسـم
|
مــن
صــاحبٍ
هَـذا
الصـباح
كتـاب
|
|
أَخـــذت
ســعاداً
رجفــة
عَصــبية
|
مـن
هـول
مـا
سـمعت
وَضـاع
صـواب
|
|
فكأنمــا
نبــأُ
الفَجيعَــة
جـذوةٌ
|
وَكأَنَّمــــا
إِخبارهـــا
إِلهـــاب
|
|
من
بعد
ما
اِحترقت
بها
اِنقضَّتْ
كما
|
ينقــضُّ
مــن
كبـد
السـماء
شـهاب
|
|
وَتقلَّبــت
فــوق
الــتراب
كأنهـا
|
حمـــلٌ
تعجَّـــل
ذبحَــهُ
القصــّاب
|
|
سـقطت
وَقَـد
خطـف
الرزيـة
لونهـا
|
فكأنهــا
فــوق
الــتراب
تــراب
|
|
رفعــت
إليهـا
الأم
واطـئَ
رأسـها
|
وغــدت
تســائلها
وليــس
تجــاب
|
|
ثـم
اِرعـوَت
مـن
بعـد
سـاعة
غيبةٍ
|
تَبكـــي
كــأن
عيونهــا
ميــزاب
|
|
وَتَقــول
يــا
أم
اســتبد
بحكمـه
|
فــيَّ
القضــاء
فَلـي
عليـه
عتـاب
|
|
يـا
مـوت
إنـك
أَنـت
حلـو
فاِقترب
|
إنَّ
الحَيــاة
مــن
المـرارة
صـاب
|
|
يـا
مـوت
غيـري
إن
يَهبَـك
فـإنني
|
أنــا
لا
أهابــك
والحيـاة
أهـاب
|
|
أمنيــتي
قــد
صـرت
مـن
أمنيـتي
|
أمنيـــتي
أنَّ
الحَيـــاة
عـــذاب
|
|
يـا
أم
قـد
أَتَـت
الحتـوف
تزورني
|
أَهلاً
وَســــهلاً
أَيُّهـــا
الأحبـــاب
|
|
يـا
أم
منهـا
اسـتوهبي
لـي
مهلة
|
يـــا
أم
حــتى
ترجــع
الغيــاب
|
|
يــا
أم
إن
هنــاك
أحمـد
يَبتَغـي
|
عـــوداً
إِلــيَّ
ودونــه
الأبــواب
|
|
مــا
تلــك
أَبـوابٌ
فَقَـد
حققتهـا
|
بــل
إنهــا
بيـن
الطَريـق
هضـاب
|
|
وكأَنَّمــا
فــي
كــل
قمــة
هضـبة
|
يــا
أم
مـن
تلـك
الهضـاب
غـراب
|
|
غربــان
بيـنٍ
فـي
الروابـي
وُقَّـعٍ
|
منهــا
يـدوّي
فـي
الفلا
التنعـاب
|
|
وأَرى
الطَريـق
أمـام
أَحمـد
واضحاً
|
لكـــن
عليـــه
يــا
ســلام
ذئاب
|
|
يـا
رب
عونـك
فالـذئاب
تلـوح
لي
|
مثــل
اللصـوص
وَفـي
الأكـف
حـراب
|
|
يـا
أحمـد
اثبـت
في
مكانك
باسلاً
|
لا
يوهننّــــك
منهـــم
الإرهـــاب
|
|
كـن
حيـث
أنـت
وَلا
تخـف
ستجيء
من
|
قبـــل
الحكومـــة
ذادةٌ
أنجــاب
|
|
تــأتي
لخفـرك
بعـد
عشـر
دقـائق
|
منهـــم
كهــولٌ
لا
تنــي
وَشــباب
|
|
درء
الحكومــة
عَـن
رعيتهـا
الأذى
|
متحتِّـــم
وَلَهـــا
الحمايــة
داب
|
|
وَسيقبضـون
عَلـى
اللصـوص
وَتَنتَحـي
|
بهـــمُ
الســجون
وإن
ذاك
عقــاب
|
|
وَتَعــود
مخفــوراً
إِلــيَّ
مشــيعاً
|
فيُقــرُّ
هــذي
العيـن
منـك
إِيـاب
|
|
يـا
أم
قَـد
هَجمـوا
عليـه
بجمعهم
|
فـــي
مــرة
وَالهــاجمون
صــعاب
|
|
يــا
أم
وهــو
مـدافع
عَـن
نفسـه
|
يـــا
أم
مــا
إن
أحمــدٌ
هيّــاب
|
|
شــرعت
حــراب
الهـاجمين
تنوشـه
|
لِلَّـــه
أحشـــاءٌ
هنـــاك
تصــاب
|
|
قَـد
خـرَّ
مـن
أَلـم
الجـراح
لجنبه
|
وَتلطخــــت
بـــدمائه
الأثـــواب
|
|
قَتَلــوا
حليلــي
أمسـكوهم
إنهـم
|
فـروا
إلـى
تلـك
الشـعاب
وَغابوا
|
|
قَتَلــوه
وَيلــي
ثـم
وَيلـي
غيلـة
|
والقـــاتِلون
أســـافلٌ
أَذنـــاب
|
|
أيـن
الحكومـة
أيـن
أيـن
رجالها
|
نـاموا
وَنـوم
أولـي
الحراسة
عاب
|
|
أخــذت
تســليها
هنالــك
خولــةٌ
|
وَســـحاب
هــمّ
ســعادَ
لا
ينجــاب
|
|
حــتىّ
قَضــَت
حزنـاً
وذلـك
بعـدما
|
عبثــت
بنــاعم
جســمها
الأوصـاب
|
|
فتبــوأت
جــدثاً
بـه
نـامَت
سـقى
|
جــدثاً
بــه
نــامَت
سـعاد
سـحاب
|
|
كـانَت
كعابـاً
فـي
غضـير
شـبابها
|
لــو
أخَّـر
المـوتَ
الـزؤامَ
شـباب
|