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حسـام
الـبرق
من
غمد
الغمامه
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سـطا
فـي
المحـل
حتى
جز
هامه
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وواراه
بإنهـــاد
الروابـــي
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فمــا
نــاحت
لفرقتـه
حمـامه
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ولكــن
بالســرور
شـجت
وغنـت
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ومـالت
فـوق
أغصـان
البشـامه
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وقـالت
مـات
مـن
كنـا
إذا
ما
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علا
نجــد
أنزلنـا
فـي
تهـامه
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وقهقهــت
الرعــود
فجاوبتهـا
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ميـاه
السـحب
فـي
روض
السلامه
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ومــزق
حلــة
الــداجي
نهـار
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وعــراه
ومــا
راعــى
ذمـامه
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وبرقـع
خـود
أنجمـه
الجـواري
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بنــور
مـا
نضـا
عنـه
لثـامه
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وبنـت
المـزن
في
مهد
الروابي
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تعـاطت
رضـع
أطفـال
الكمـامه
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وألقــى
العنـدليب
دروس
شـجو
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مـن
الأوراق
أسـكرت
المـدامهن
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وصــفقت
الحيــاض
فراقصــتها
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غــواني
دوحهــا
بـأعز
قـامه
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ومـن
عجـب
العجيـب
شجى
فؤادي
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بمـا
أملـى
ولـم
أفهـم
كلامـه
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وكـم
أثـرى
ثراهـا
مـن
نقـود
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مــن
الأزهــار
أولتـه
مرامـه
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وقســم
مــن
دراهمهـا
علينـا
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وقـال
وفودنـا
لكـم
الكرامـه
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فيــاللَه
مــن
روضــات
أنــس
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تــذكرنا
بهــا
دار
المقـامه
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بكـت
عين
المياه
بها
ابتهاجاً
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وثغـر
زهورهـا
يبـدي
ابتسامه
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وفــض
نسـيمها
ختـم
العـذاري
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مـن
الأكمـام
مـا
حاشـى
كمامه
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الأهبــو
إلــى
اللـذات
هبـوا
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وفضـوا
مـن
شـراب
الأنـس
جامه
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وخوضوا
يا
ندامى
في
مياه
الت
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تهـاني
واهجـروا
أهـل
الملامه
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فهــذي
الكـاس
بالإينـاس
زفـت
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وسـاقيها
حكـى
كعـب
بـن
مامه
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وهــذي
الروضـة
الغنـاء
خـود
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لآلــي
زهــر
هافيهــا
مـدامه
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وفــي
حافاتهــا
يـا
رب
خـود
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تــذكرنا
ســليمي
أو
أمــامه
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وسلطان
الملاح
عزيز
مصر
التصا
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بــي
هــز
مــن
تيــه
قـوامه
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وراح
يــدير
أقـداح
التصـافي
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بلا
ملـــلٍ
لـــديه
ولا
ســآمه
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ونادمنـــا
بألفــاظ
تحــاكي
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حاوتهــا
علــى
خــديه
شـامه
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بروحــي
أغيـدا
أبـدا
يرينـي
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الهلال
لظفــر
أنملــه
قلامــه
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بــديعاً
أحومـاً
غنجـاً
لعوبـا
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ظريفــاً
وجهـه
حـاز
الوسـامه
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بمفــرق
شـعره
والحسـن
يبـدي
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صـباحي
والـدجا
مـن
فوق
هامه
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رنــا
ريمـا
وأسـفر
بـدر
تـم
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وصــال
مثقفــاً
وشـدا
حمـامه
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وصــدق
العشـق
أوقفنـي
عليـه
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فســلواني
مســيلمة
اليمـامه
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أدام
اللَــه
دولتــه
وأبقــى
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لنــا
بشــعار
عشــقته
علامـه
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