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أعنفــه
وهــو
الصــديق
المقـرب
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أشـــرق
فـــي
تعنيفــه
وأغــرب
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وأعلمـه
عـن
حالـة
تجـرح
الحشـى
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وأفصــح
عنهـا
فـي
كلامـي
وأعـزب
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أقـــابله
منــي
بفيصــل
مقــول
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إلــى
هاشــم
يعــزى
علاه
وينسـب
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أبــث
الـذي
لا
قيـت
منـه
وإننـي
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أحاشـي
صـديقي
أنـه
اليـوم
يكذب
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ألا
فـي
سـبيل
الغـي
ما
قد
لقيته
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تـرى
أم
سبيل
الرشد
فالحال
أعجب
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قفـوا
وانظـروا
فعـل
الخيل
بخله
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قفـوا
وابحثـوا
عما
جرى
وتعجبوا
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ومـا
مـال
قـارون
مرادي
ولم
أقل
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علـوم
أبـي
السبطين
عن
ذاك
أطلب
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ومـا
كـان
قصدي
غير
تنزيه
مهجتي
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بســفر
يــروق
النـاظرين
ويطـرب
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حـوى
قطعـاً
مـن
نظـم
أهل
زماننا
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هـي
النيـل
إلا
أنهـا
منـه
أعـذب
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هـي
الـروض
لكن
حين
باكره
الحيا
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هـي
الـراح
بل
أبهى
وأشهى
وأطرب
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ومـا
هـي
الأريقـة
جـاد
لـي
بهـا
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جميـل
المحيـا
ألعـس
الثغر
أشنب
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عـذيب
اللما
حلو
الحديث
يكاد
من
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يخـــاطبه
عــن
حاضــريه
يغيــب
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هــو
الظـبي
إلا
أنـه
غيـر
أخنـس
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هــو
البـدر
إلا
أنـه
ليـس
يغـرب
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هــو
الغصـن
إلا
إن
فيـه
حـدائقا
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وعـن
وصـفها
كـل
الـذي
راح
يطنب
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فيـا
أيهـا
الخـل
القـديم
أخاؤه
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أسـاءك
مـا
أبـديه
أم
فيـه
ترغب
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وهـا
أنـا
مسـتفتيك
فيمـن
تكثرت
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عليــه
وعــود
وهـي
للإنـس
تجلـب
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فــأول
وعــد
لــم
يصــح
فخلتـه
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كــأول
فجــر
فهــو
فجــر
مسـيب
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فمـا
حـال
حالي
يا
أخي
بعده
فقل
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فرأيـك
نعـم
الـرأي
والحزم
أصوب
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فهــل
كـل
فجـر
أول
عنـد
بعضـهم
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أم
الكــل
شــيء
واحــد
لا
يشـعب
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فحثحـث
جواباً
ببهج
النقل
والحجا
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فمثلــك
لا
تخفــاه
عنقـاء
مغـرب
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وبـادر
لنا
بالبدر
يا
بدر
مسرعا
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لكيمـا
ظلام
العتـب
بـالنور
يذهب
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وخــذها
عروسـاً
بالـدلال
تـبرقعت
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تجـر
ذيـول
الـتيه
عجبـاً
وتسـحب
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فما
سام
سام
مثلها
يا
أخا
الحجا
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ومـا
حـام
حـام
نحوهـا
يـا
مهذب
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تـرى
كـل
خـود
دون
معنـى
جمالها
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خوادمهــا
البنـي
وسـعدي
وزينـب
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ودم
وابـق
واسـلم
فـي
سرور
نعمة
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وعزلــه
بكــر
المــدائح
تخطــب
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