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ظـــبي
لكــل
مغــرم
أجهضــه
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يمحــض
أن
أرســل
فيـه
لحظـه
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ظــل
مســهّد
الجفــون
ومــتى
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آوى
الرقــاد
لحظــةً
أيقظــه
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ظننــت
بقيـا
للفـؤاد
بعـدما
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أودعتــه
قاسـى
الفـؤاد
فظـه
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ظلــم
الملاح
بعــدما
علمتــه
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سـُفتَ
الهـوى
هَـلْ
لَكَ
أن
تلفظه
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ظلامة
لم
يحتفظ
منها
سوى
الذي
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قضــى
أبــو
الحســين
حفظــه
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ظهيـــر
طــه
ومشــيد
دينــه
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ومــن
يــؤدي
زجــره
ووعظــه
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ظــاهرة
فــي
كــل
شـيء
آيـة
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لــه
تراهــا
ريـت
أن
تلحظـه
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ظهورهــا
فيــه
قضــى
بجـاده
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ومكثهـــا
قـــدَّر
أن
يحفظــه
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ظــل
الـذي
حـاول
نشـر
نعتـه
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يحمـــل
منـــه
محملاً
أجهضــه
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ظـــن
بـــأن
يبلغــه
كلا
ولا
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تـترى
جميـع
الكائنـات
لفظـه
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ظـل
الوجود
العام
إمكاناً
ولا
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كـــوَّن
مــذ
أعــارهُ
يلحظــه
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ظــل
الالـه
وسـع
الـدنيا
ولا
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يـــؤده
العــالم
أن
يحفظــه
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ظـاهره
الولايـة
الكـبرى
ولـم
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يحــظ
بهــا
إلا
الــذي
ألظـه
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ظــل
بــأهنى
نعــمٍ
يرفــدنه
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قضـى
بعيـن
اللطـف
أن
تلحظـه
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ظلــم
الـذينَ
نـازعوه
أمرهـا
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أمطرهــم
ذو
الملكــوت
غيظـه
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ظلــم
وكــف
والــذي
كوَّنهــا
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أقســمت
بالــذي
يعـي
مغلظـه
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ظلــم
الــذي
دعــوته
بحجــة
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لعلـــه
يـــدر
منهــا
حظــه
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ظللـتَ
تـدعو
ذا
قَـذىً
إذا
هـمُ
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إذا
دعـاه
الرعـد
لـن
يـوقظه
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ظلام
غيّهـــم
بعيـــن
نـــوره
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تزيلـــه
بمحـــض
أن
تلحظــه
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ظفـرت
مـن
هـواه
بالاسـم
الذي
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تســخّر
الــدهر
بــأن
تلفظـه
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ظفّرنــــي
بكلمـــا
أرومـــهُ
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وكــف
عيــن
مـا
أخـاف
بهظـه
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ظــاهرة
عَلَــيَّ
مــن
ألطــافه
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كخيــر
مــن
حــاول
أن
تحظـه
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ظللـت
راقـداً
عـن
الشـكر
ولا
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زال
لطـرف
اللطـف
لـي
موقظـة
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ظمآنـــة
لــي
ولكــل
ذي
ولاً
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تســبق
رحمــة
الالــه
غيظــه
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ظمآنــة
والمصــطفى
زعيمهــا
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فــأين
مــن
أقبــاله
أحظــه
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ظفـرت
إذ
لـم
يـك
جـدي
راقداً
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والحمــد
للــه
الـذي
أيقظـه
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ظفــرت
بـالخط
الجزيـل
وكفـى
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فـوزاً
لمـن
يـدرك
منهـم
حظـه
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