|
فــوق
الحمولــة
لؤلـؤ
مكنـونُ
|
زعــم
العــواذل
أنهــنّ
ضـعونُ
|
|
لــم
لقبوهـا
بـالظعون
وإنهـا
|
غــرف
الجنـان
بهـن
حـور
عيـن
|
|
هـبْ
زعمَهـمْ
حقـاً
أيمنعك
الهوى
|
أم
للصــبابة
عـن
هـواك
يـبين
|
|
إنــي
بمـن
أهـواك
مفتـون
وذا
|
ك
بــأن
يـؤنب
بـالهوى
مفتـون
|
|
كلا
فمــا
شــأني
وشـأن
مؤنـبي
|
شــَرَعٌ
ســواء
للرجــال
شــؤون
|
|
عـذراً
فمـا
للـوم
تهجين
الهوى
|
إن
الملام
لأهلـــــه
تهجيــــن
|
|
قـد
أسرفوا
فيه
ولو
لم
يسرفوا
|
إنــي
بمـا
شـرعوه
لسـت
أديـن
|
|
يـا
أيهـا
الرشـأ
الـذي
سميته
|
قمــر
الســماء
وإنــه
لقميـن
|
|
مهمـا
نظـرت
وأنـت
مرآة
الهوى
|
بـك
بـان
لـي
مـا
لا
يكاد
يبين
|
|
نــاظرت
قلــبي
رقــة
فملكتـه
|
لكنمــا
ملكــت
يــداك
ثميــن
|
|
لــم
تجـر
ذكـرى
نيّـرٍ
وصـفاته
|
إلا
ذكرتـــك
والحــديث
شــجون
|
|
يـا
قلـب
مـا
هـذا
شـعار
متيّمٍ
|
ولعـل
حـال
بنـي
الغـرام
فنون
|
|
خفـض
فخطبـك
غيـر
طارقة
الهوى
|
إن
الهــوى
عمــا
لقيـت
يهـون
|
|
مـا
برَّحـت
بـك
غير
ذكرى
كربلا
|
فـإذا
قضـيت
بهـا
فـذاك
يقيـن
|
|
ورد
ابن
فاطمة
المنون
على
ظما
|
إن
كنــت
تأسـى
فلـتردك
متـون
|
|
ودعْ
الحنيـنَ
فإنها
العظمى
فلا
|
تــأتي
عليهــا
حســرة
وحنيـن
|
|
ظهـرت
لهـا
فـي
كـل
شـيء
آيـة
|
كـبرى
فكـاد
بهـا
الفناء
يحين
|
|
بكـت
السـماء
دماً
ولم
تبرد
به
|
كَبِــدٌ
ولــو
أنّ
النجـوم
عيـون
|
|
ندبت
لها
الرسل
الكرام
وندبها
|
عـن
ذي
المعـارج
فيهـم
مسـنون
|
|
فبعيـن
نـوح
سـال
ما
أربى
على
|
مـا
سـار
فيـه
فلكـه
المشـحون
|
|
وبقلـب
إبراهيـم
مـا
بـردت
له
|
مـا
سـجَّر
النمـرود
وهـو
كميـن
|
|
ولقـد
هـوى
صـعقاً
لذكر
حديثها
|
موســى
وهـوّن
مـا
لقـي
هـارون
|
|
واختـار
يحيـى
أن
يطـاف
برأسه
|
ولــه
التأسـي
بالحسـين
يكـون
|
|
وأشــد
ممــا
نــاب
كـلّ
مكـوَّنٍ
|
مــن
قــال
قلـب
محمـد
محـزون
|
|
فجــزك
تيــمٌ
بالضــلالة
بعـده
|
للحشــد
لا
يــأتي
عليـه
سـكون
|
|
عقـدت
بيـثرب
بيعـة
قضـيت
بها
|
للشــرك
منــه
بعـد
ذاك
ديـون
|
|
برقـي
منـبره
رُقـي
فـي
كـربلا
|
صــدرٌ
وضــُرّجَ
بالــدماء
جـبين
|
|
لـولا
سـقوط
جنيـن
فاطمـة
لمـا
|
أودى
لهــا
فــي
كـربلاء
جنيـن
|
|
وبكسـر
ذاك
الضـلع
رضـت
أضـلع
|
فــي
طيّهــا
ســرّ
الإلـه
مصـون
|
|
وكمــا
علــي
قَــودُهُ
بنجــاده
|
فلــه
علــي
بالوثــاق
قريــن
|
|
وكمــا
لفـاطم
رنـة
مـن
خلقـه
|
لبناتهــا
خلـف
العليـل
رنيـن
|
|
وبزجرهــا
بسـياط
قنفـذ
وشـحّت
|
بــالطف
فــي
زجـر
لهـن
متـون
|
|
وبقطعهـم
تلـك
الاراكـة
دونهـا
|
قطعــت
يــد
فـي
كـربلا
ووتيـن
|
|
لكنمـا
حمـل
الرؤوس
على
القنا
|
أدهــى
وإن
ســبقت
بــه
صـفين
|
|
كــل
كتــاب
اللـه
هـذا
صـامت
|
خـــاف
وهــذا
نــاطق
ومــبين
|