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نَبَـتْ
بالـذي
رام
المعـالي
صـوارمه
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إذا
مــا
حكتهـا
بالنضـاء
عزائمـه
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حســـامك
مشـــهور
وعزمــك
مغمــد
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هـوى
بـالخوافي
مـن
نحتـه
قـوادمه
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فــإن
تـرم
العليـا
فجردهمـا
معـاً
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وإلاّ
فأبعــد
بالــذي
أنــت
دائمـه
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ضـللت
الـذي
ينهـى
إلى
مدرك
العلى
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وقــد
نجمــت
فـي
كـل
أوجٍ
نـواجمه
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ألــم
تــرَ
مَـنْ
أحـرز
الفخـر
كلـه
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وحـازت
بـه
العـرش
العظيـم
مكارمه
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أبـا
الفضـل
فـي
يوم
به
جمح
القضا
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وعــاثت
بكــل
العــالمين
عظـائمه
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أقــام
مقامــاً
يملأ
الكــون
سـبَقه
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وحســبك
ممــا
كـان
أن
هـو
قـائمه
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يطـــول
بشـــأو
الأوليــن
بنــوهم
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وإن
لــه
شــأواً
بــه
طـال
هاشـمه
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يقـــوم
ببحــرٍ
بالعظــايم
مــترع
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وأعظــم
منــه
كـف
مـن
هـو
عـائمه
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فـــإنَّ
لأســباب
القضــاء
عوالمــاً
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وإن
الـردى
يُمنـى
أبي
الفضل
عالمه
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فنازلهــا
حربــاً
تـذوب
لهـوله
ال
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ســماوات
لــولا
أنــه
هــو
حـاجمه
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علـى
سـابح
لـو
شـاء
مـن
طـوله
به
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لداســت
منــاط
النيّــرات
مناسـمه
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فأرســله
فــي
الجيـش
حـتى
تفللـت
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حــدود
مواضــيه
وخــارت
ضــراغمه
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فــأحرز
مجــرى
المـاء
كـف
يفـوقه
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بمجـرى
النـدى
في
بعض
ما
هو
ساجمُهْ
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فــأعيى
بــأن
تطغـى
ضـراغم
قلبـه
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وقلــب
حســين
ليـس
تطفـى
ضـراغمُهْ
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فلــم
يـرو
منـه
غيـر
قلـب
مـزاده
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وعـاد
كـوجس
الرعـد
تزجـى
همـاهمُهْ
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تنـــازله
الآســـاد
علمــاً
بــأنه
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يصـادم
محتـوم
القضـا
مـن
يصـادمُهْ
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فأمضـى
بهـم
عزمـاً
ترى
دونه
الردى
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وإن
الـــردى
أن
لا
تهــب
عزائمُــهْ
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إلـى
أن
أشـاد
الشـرك
حاسـم
بـاعه
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وقـد
حسـم
الـدين
الحنيفـي
حاسـمُهْ
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وكــان
ورود
المــاءِ
فيــض
نـواله
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ولمـا
قضـى
قـد
عـاد
مـورد
هـادِمهْ
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فعـج
بـه
نـاعيه
فـي
عـالم
العلـى
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فـــارعبَهُ
حـــتى
تزلــزل
عــالمُهْ
|
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تعــاظم
سـبط
المصـطفى
هـول
فقـده
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ولــو
يتــداعى
الكـون
لا
يتعـاظمُهْ
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كــأني
بـه
قـد
مـزق
الجيـش
دونـه
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أخــو
عزمــاتٍ
أرغمـت
مـن
يراغمُـهْ
|
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وطـاف
إلـى
أن
كـاد
أن
يطلع
القضا
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عليهـم
عيانـاً
والـردى
حـام
حائمُهْ
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فأبصــر
جسـماً
يرسـل
الشـمس
نـوره
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غـدت
مركـز
السـمر
العوالي
نواعمُهْ
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فـأهوى
عليـه
وهـو
يعـرب
عـن
جـوى
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تــذيب
الجبـال
الراسـيات
ضـرائمه
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يقـول
أخـي
قـد
مـزق
الحتـف
مهجتي
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ومــا
هــو
إلا
حيــث
سـامك
سـائمُهْ
|
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أيعلـــم
ســـيف
خَضـــّبَتكَ
كلــومه
|
بــأن
ضــيا
عينـيّ
مـا
هـو
كـالمه
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أيرقــى
دمــي
عينـي
وفيـك
أرقتـه
|
ويخبــو
جــوى
قلـبي
ورزؤك
صـارمه
|
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قصـمت
قـرى
مـا
كـان
لو
حمل
السما
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لتجهـــده
لكـــن
فقـــدك
قاصــمه
|
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عــدوتك
لــي
درعـاً
فحسـَّره
الـردى
|
وسـيفاً
ولكـن
بـارح
الفكـر
قـائمه
|
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وجيشــاً
ولكــن
قــد
تعرقـت
كبشـه
|
وباعــاً
ولكــن
قــد
تفلـل
صـارمه
|
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فيــا
بـدر
أنسـي
كيـف
كُـوّر
نـورُه
|
وربــع
سـروري
كيـف
أقـوت
معـالمه
|
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فيــا
ليــت
لا
يعلـو
سـواك
بمشـهد
|
علــى
ســابحٍ
إلا
وزاغــت
قــوائمه
|
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أيقتــاد
كـفُ
المـوت
منـك
شـكائماً
|
وقـد
كـنَّ
وقفـاً
فـي
يـديك
شـكائمه
|
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أيــدعم
بيــت
الفضـل
بعـدك
داعـم
|
كمـا
أنـت
بالسـمر
العواسـل
داعمه
|
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أيجمــع
شــملَ
الـدين
بعـدك
جـامع
|
وقــد
هـام
حزنـاً
لافتقـادك
هـائمه
|
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أيشــرعُ
نهــجَ
المجـد
بعـدك
شـارع
|
وقــد
دُرِســَتْ
لمــا
قضـيت
مراسـمه
|
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حميت
حمى
الدين
الحنفي
فمذ
مضى
ال
|
قضــا
بــك
صـارت
تسـتباح
محـارمه
|
|
أميــةُ
كــم
للــهِ
قــدماً
عــوالمٌ
|
وإنــك
أخنــى
مــن
حـوته
عـوالمه
|
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أجســم
يزيــد
فـي
الحشـايا
منعـمٌ
|
وجســم
حسـين
فـي
الصـعيد
نـواعمه
|
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وهنــدٌ
تواريهــا
الخــدور
وزينـب
|
ينــوء
بهــا
مشـي
المطـي
ورازمـه
|
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فــأي
نــبيّ
ســاغ
فـي
شـرعه
بـأن
|
تُعفَّـــرَ
أبنــاهُ
وتُســبى
كرائمــه
|
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أخــــالكمُ
أن
لا
يقـــام
بـــوتره
|
فمــا
خلتــه
إلا
وقـد
قـام
قـائمه
|
|
يهــب
بعــزم
يملأ
الكـون
لـم
يـدع
|
مــن
الشـرك
قِرنـاً
لا
يكـوَّر
نـاجمه
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