|
أتُعــرف
للواشــين
عنــدي
مغــارم
|
فتطلـــب
أم
ثــأرٌ
لهــم
متقــادم
|
|
سـعوْا
فـي
جفـا
مـن
مرهفـات
لحاظه
|
حـــروفٌ
لأفعـــال
الســلوّ
جــوازم
|
|
يُفــتر
عــزم
الصـبر
منـي
فُتورهـا
|
وينصــرها
جيــش
مـن
الشـوق
هـازم
|
|
إذا
لمست
في
العزم
الفؤاد
يقول
لي
|
علـى
قـدر
أهل
العزم
تأتي
العزائم
|
|
عظيـــمٌ
بلائي
فيــه
يصــغر
عنــده
|
وتصـغر
فـي
عيـن
العظيـم
العظـائم
|
|
ومـن
لـي
بـه
يرضـى
لـو
عُمـر
ساعة
|
وتســخط
إن
شــاءت
علــيّ
العـوالم
|
|
علــى
ورد
خــديه
العــذار
كمـائم
|
ومــن
ســحر
لحظيــه
عليـه
تمـائم
|
|
فليـس
لصـب
منـه
فـي
الوصـل
نـافع
|
وليـس
لـه
مـن
صـارم
اللحـظ
عاصـم
|
|
رشــا
قــوَّم
الرحمــان
نيـر
خلقـه
|
بأحســـن
تقــويم
فعــز
المقــاوم
|
|
معــدَّل
قــد
يبهــت
الشــمس
حسـنه
|
وللشــمس
بالتعــديل
بهــتٌ
مصـادم
|
|
تــرى
للــداردي
حيـرة
مـن
طلـوعه
|
لـــذاك
لهــا
وصــفٌ
التحيــر
لازم
|
|
تحكـم
عبـد
الخـال
فـي
مصـر
حسـنه
|
وكـافور
عبـدُ
وهـو
فـي
مصـر
حـاكم
|
|
إلا
أرغــم
اللــه
الوشــاة
فـإنهم
|
ســعاة
للأنــف
المغرميــن
رواغــم
|
|
أذا
هــمَّ
مــن
أهــوى
بعطـف
تصـدّه
|
بنعــت
بــه
الإبـدال
للعطـف
حـاتم
|
|
الا
مـا
لـدهري
لسـم
يحل
عن
إساءتي
|
ومـا
ريـء
يومـا
وهـو
للغيـظ
كاتم
|
|
كــأن
لــه
عنــدي
عظيــم
جنايــة
|
فلـم
تنـس
أو
خـوف
البـواد
رواهـم
|
|
أن
بيــن
دهـر
فـي
الحقيقـة
أهلـه
|
أفــاع
وفــي
رؤيـا
العيـون
أوادم
|
|
هُـم
حـاولوا
إنزال
قدري
إلى
الثرى
|
ومنـــزل
قــدري
للثريــا
مُتــاخم
|
|
أتُنزلنـي
الأعـداء
فـي
غيـر
منزلـي
|
ولــم
تُلــف
إلا
بـالرؤوس
العمـائم
|
|
تُـرى
جهلـوا
قدر
العلى
أم
تجاهلوا
|
وهـل
يجهـل
الشـمس
المنيـرة
عـالم
|
|
كـــأني
دربيـــن
عمـــي
بظلمـــة
|
بـدا
أو
سـراج
مـا
لـه
شـام
شـائم
|
|
كــأني
عــبيق
الطيـب
يعبـق
نشـره
|
لــدى
فاقـدي
الشـمّ
والطيـب
فـاغم
|
|
كـأني
بليـغ
القـول
في
منطق
امريء
|
وقــد
خُـوطبت
عجمـا
بـه
أو
أعـاجم
|
|
كــأني
بيــن
الصــم
ألحـان
مطـرب
|
تميــد
لــه
صـُمّ
الجبـال
العواصـم
|
|
إلـى
كـم
أزيـن
الـدهر
وهو
يشينني
|
وأطريــء
فــي
أمـداحه
وهـو
ذامـم
|
|
مــديحي
لأهـل
الـدهر
والـذم
منهـم
|
كلانــا
بإفــك
المـدح
والـذمّ
آثـم
|
|
ومــا
كــلّ
مــدح
للفضــائل
مُثبـت
|
ومـــا
كــلّ
ذمّ
بالنقــائص
واســم
|
|
فــربّ
مديــح
كـان
بالقـدح
مُغريـا
|
وربـــة
ذمّ
وهــو
بالمــدح
ئاقــم
|
|
أنـا
مـن
إذا
أثنـى
على
فضله
امرؤٌ
|
عليـه
غـدا
يُثنـي
الثنـا
وهو
باسم
|
|
لئن
كــان
بالأسـوار
يـزدان
بعضـهم
|
فـــربّ
ســـوار
زينتــه
المعاصــم
|
|
ولا
غـرو
أن
يخفـى
الجهـول
فضـائلي
|
فكـــلّ
تـــراب
للـــذّخائر
كــاتم
|
|
وإن
نــم
بــي
واش
حســودٌ
فإنمــا
|
بـإحراق
عـود
الطيـب
تـذكو
شـمائم
|
|
وقـد
ضـاق
رحـب
الأرض
إذ
صـح
أن
لي
|
مقامـا
علـى
الجـوزاء
فيـه
نعـائم
|
|
ألا
ليــت
شـعري
هـل
خطـوبي
تنتهـي
|
إلــى
غايـة
أم
هكـذا
الـدهر
دائم
|
|
غريـــب
ديـــار
حيــث
حــل
لأنــه
|
لـــه
مـــوطنٌ
للفرقــدين
مُزاحــم
|
|
لــه
ظــلّ
يرثــي
كـلّ
قـاس
فـؤاده
|
وأعـدى
العـدى
يغـدو
لـه
وهو
راحم
|
|
لــه
رحمــة
يـذري
الغمـام
دمُـوعه
|
ومــا
نحبــت
إلا
عليــه
الحمــائم
|
|
فمــن
دون
مـا
يبغـي
عـواد
تعـوقُه
|
ومــن
دون
مـا
يهـوى
تحـزّ
الغلاصـم
|
|
فــأهون
مــا
يلقـاه
أهـوال
حـادث
|
وأطيــب
مــا
تحلـو
لـديه
العلاقـم
|
|
بشــائره
فــي
كــلّ
يــوم
فجــائع
|
تُعاقبهــــا
أضـــعافها
وتُصـــادم
|
|
لحــى
اللـه
دهـرا
لا
تـزال
صـُروفُه
|
تحــاربني
طُــول
المــدى
وأســالم
|
|
كمــن
أنفــه
نحـو
السـماء
وأسـته
|
إلـى
المـاء
غـمّ
وهـو
للأنـف
راغـم
|
|
يرانــي
أدنــى
مــا
جنيـت
كأنمـا
|
جنتــه
مــن
الأحشــاء
منـه
صـوارم
|
|
ويرشـد
مـن
دونـي
إلـى
طُـرق
العلى
|
ومثلــي
ســار
فــي
الضـلالة
هـائم
|
|
وقـد
سـدّ
بـاب
النفـع
دوني
وانثنى
|
يفتــح
بـاب
الضـرّ
لـي
وهـو
حـازم
|
|
ومــن
لــي
بــرزق
فـي
سـدّ
لخلـتي
|
ومــن
دونـه
أسـد
الـثرى
والأراقـم
|
|
كـــأني
أرى
الأرزاق
يــوم
تقســمت
|
تـــوزع
رزقــي
بينهــن
المقاســم
|
|
قضــيت
زمــاني
بالتأســف
والمنـى
|
ولـم
أحـظ
مـن
دهـري
بما
أنا
رائم
|
|
ومــا
ســاءني
خــل
فلــذت
بغيـره
|
ومـا
بـتّ
عمـا
قيـل
والقلـب
نـادم
|
|
مــتى
هــمّ
بــالإكرام
دهـري
عـاقه
|
لئيـــم
لأركــان
المكــارم
هــادم
|
|
ولــم
أر
مــن
إكرامـه
لـي
وسـيلة
|
سـوى
مـدح
مـن
تُعـزى
إليه
المكارم
|
|
أبـي
الحسـن
المـولى
الزكي
عليّ
من
|
بــه
الــدهر
أعيـاد
لنـا
ومواسـم
|
|
مليــك
إذا
الأملاك
أبــدت
مفــاخرا
|
ففخـــر
عُلاه
بالســـماكين
راســـم
|
|
مليــك
إذا
الامــال
منــك
تــوجهت
|
إليـــه
فثــق
أن
الإيــاب
مغــانم
|
|
ولــم
يثنــه
قــول
النصـيح
بغشـه
|
بـــأن
صـــلات
المــادحين
مغــارم
|
|
يـرى
المـدح
يُحيـي
ربـه
وهـو
ميـت
|
ويبقـى
مـدى
الدنيا
وتفنى
العوالم
|
|
بحلــم
وعــدل
خـص
هـذا
لمـن
جنـى
|
وهــذا
لجــرح
النائبــات
مراهــم
|
|
ومــــورد
أوراد
بــــذكر
إلهـــه
|
لــه
عـذبت
مـا
حولهـا
حـام
حـائم
|
|
وأضــحت
دروس
العلـم
بعـد
دروسـها
|
رســُوم
لهــا
تُحيــا
بــه
ومعـالم
|
|
بليــغ
جــواد
منـه
سـحبان
بـاقلا
|
يــروح
ويغـدو
مـا
درى
منـه
حـاتم
|
|
مليـك
ليـالي
النحـس
منـه
بواكيـا
|
تـــولت
وأيــام
الســعود
بواســم
|
|
لـه
وثبـات
فـي
وغـى
الحـرب
تنثني
|
وتجبــن
عنهــنّ
الكمــاة
الضـراغم
|
|
لـه
عفـة
لـو
أنهـا
فـي
الورى
سرت
|
لمـــا
علقــت
بالعــالمين
مــاثم
|
|
وبشـــر
مُحيــا
لــم
يــزل
مُتهللا
|
بـه
يهتـدي
السـارون
والليـل
فاحم
|
|
تقلــد
ســيف
الحــق
حــتى
أغــدت
|
علــى
كــل
مظلــوم
تـردّ
المظـالم
|
|
إذا
انبســجت
مُــزن
السـماء
وكفـه
|
فـــذاك
لـــه
كــفّ
وذلــك
ســاجم
|
|
نعمنــا
بهـا
فـي
ظـل
عيـش
كأنمـا
|
بنـا
مـن
جنـان
الخلـد
حفـت
نعائم
|
|
لـــه
رأفــة
بالمســلمين
وغيــرة
|
عليهــم
كــأن
المســلمين
محــارم
|
|
لــهُ
النّصـر
عبـد
والرشـادُ
مُصـاحب
|
لــهُ
وأخُـوهُ
الصـّبر
والسـعدّ
خـادمٌ
|
|
تحصـــّن
مــن
ربّ
العلــى
فوثُــوقهُ
|
بـــه
مــن
عــدوّ
كيــدُهُ
مُتعــاظمُ
|
|
أمـولاي
يـا
مـن
فضـلهُ
شـمل
الـورى
|
ولــم
يُثنــه
عــن
فعــل
ذلـك
لائمُ
|
|
فـديتك
مـا
ذنـبُ
الّـذي
لـم
يكن
لهُ
|
ســوى
مــدحك
الأسـنى
خليـل
منـادمُ
|
|
يُهـــانُ
بطـــرد
وانقطــاع
وحُســّد
|
هُ
شـــامت
فيهـــم
وآخـــرُ
شــاتمُ
|
|
ولـو
مُـذنب
غيـري
جنـى
الـذّنب
كلّه
|
مــا
مســّهُ
بعــض
الّـذي
بـي
قـائمُ
|
|
لئن
كــان
ذنــبي
حُبّكــم
ومـديحكم
|
فــإنّي
علــى
تلــك
الــذُّنوب
مُلازمُ
|
|
وهـب
أنّ
لـي
ذنبـا
فقـد
عـمّ
نفعكم
|
جميـع
العـدى
كيـف
الـودُود
الملازمُ
|
|
علــى
أنّنــي
مــن
كـلّ
عيـب
مُـبرأ
|
وعرضــي
مــن
كــلّ
المثـالب
سـالمُ
|
|
ولــولا
مـديحي
فيـك
لـم
تـكُ
جُـرّدت
|
بحضـــرتكم
للـــذّمّ
فـــيّ
صــوارمُ
|
|
ولكــن
قصـرتُ
المـدح
فيكـم
فطـوّلت
|
وُشــاتي
فـي
ذمّـي
ومـا
أنـا
جـارمُ
|
|
ولـو
أنّنـي
لـم
أقتصـر
عـن
مديحكم
|
لفــزتُ
ولــم
يُوجــد
لقـدري
هاضـمُ
|
|
ولــو
وصــفوني
بالّــذي
فـيّ
قـادح
|
لهــان
ومـا
حـيّ
مـن
القـدح
سـالمُ
|
|
ولكــن
بمــا
فيهـم
وُصـفتُ
وطالمـا
|
تـــردّتْ
بأوصــاف
اللّئام
الأكــارم
|
|
ومـا
نسـب
الحسـّادُ
لـي
مـن
تشـاؤُم
|
ومــا
انتســبت
يومـا
إلـيّ
مشـائمُ
|
|
فـإنّي
أرى
عُـذرا
لهـم
فيـه
بيننـا
|
ومــا
أنـا
فيمـا
أسـندُوا
لـي
لائمُ
|
|
دروا
أنّنـي
بعـض
الـدّراري
فأثبتوا
|
لـي
البعـض
مـن
أحوالهـا
ليلائمـوا
|
|
ولـو
قيـل
حظّـي
وافـرُ
النّحـس
منهمُ
|
لصـــدّق
فيمـــا
يـــدّعيه
مُخاصــم
|
|
نعـم
لـي
هجو
وافرُ
النّحس
في
العدى
|
وللخــلّ
مــدح
كامــلُ
السـّعد
دائمُ
|
|
لئن
يُعــزى
للأســماء
يمــن
وطيـرة
|
وفـي
اسـمي
لمولانـا
الأميـر
مـواهمٌ
|
|
فمـاذا
علـى
المـولى
بقلـب
مُلقّـبي
|
بمــا
شــاء
ممّــا
فيـه
يُمـن
مُلائمُ
|
|
علـــى
أنّنــي
قبلا
دُعيــتُ
ببــارع
|
وفــي
عقــد
إشــهادي
ليلـي
قـائمُ
|
|
بعيشــك
أيّ
المنحســين
أشــدّ
مــا
|
رمـوني
بـه
أو
مـا
بـه
أسـمي
واهمُ
|
|
ولكــن
عُلا
فضـلي
أسـاءت
لهـم
ولـي
|
فكــلّ
بــه
وصــفُ
الإســاءة
قــائم
|
|
ومُـذ
عجـزُوا
عـن
مثـل
نظمي
أحرقُوا
|
بشـــهب
معـــان
للقلــوب
وراجــمُ
|
|
هـم
نسـبوا
التّأثير
لاسمي
وما
دروا
|
بنســـبته
للنّجـــم
كفّـــر
عــالم
|
|
أمـا
يتّقـي
الرّحمـان
قـوم
بجهلهـم
|
رمــوني
بمــا
لـم
يرمـه
قـطّ
رائم
|
|
أم
جــاء
فـي
التّنزيـل
لا
تنـابزُوا
|
بالألقـاب
نهـي
فيـه
عـن
ذاك
جـازمُ
|
|
ألــم
يُـرو
لا
عـدوى
ولا
طيـرة
كمـا
|
أتــى
عــن
نــبي
للنّــبيين
خـاتم
|
|
أمــا
فيــه
كسـرٌ
للقلـوب
وكسـرُها
|
مُخــلّ
بفضــل
المـرء
والمـرءُ
آثـمُ
|
|
يقولــون
أعلــى
منـه
زيـد
وخالـد
|
وكـم
منـهُ
خيـر
وهـو
للشـّعر
نـاظمُ
|
|
ومـا
فضـلُ
شـخص
يستوي
الدُّرُّ
والحصا
|
لــديه
ومنطيــقُ
اللّســان
وبــاكمُ
|
|
عجبـت
لقـوم
فـي
الـورى
يحسـدونني
|
علـى
غيـر
مـا
عندي
من
الرّزق
ناجمُ
|
|
ولــو
كـان
لـي
رزق
كشـعري
تركتـهُ
|
لهــم
بــاعترافي
إنّ
شــعري
سـاقمُ
|
|
ومــا
أنــا
يــا
مـولاي
أوّل
نـآظم
|
رمــوهُ
بــإجرام
ومــا
هُــو
جـارمُ
|
|
ولــو
أنــت
لـي
وجّهـت
بعـض
تـوجّه
|
لكـــان
لأمـــداحي
لــديك
تزاحُــم
|
|
رضـاكم
علـى
المـذمُوم
مـدح
وسُخطكم
|
علــى
كــلّ
ممـدُوح
لـهُ
الـذّمُّ
دائمُ
|
|
لئن
حجبتنـــي
عـــن
عُلاك
أســـافل
|
فــذاك
دليــلُ
الخيـر
عنـدي
قـائم
|
|
ففـي
إثـر
حجـب
الأفق
بالغيم
يبتدي
|
نُـزُولُ
الحيـا
بـالأرض
والـبرق
باسمُ
|
|
وليــس
علــى
حــال
تــدُومُ
غمامـةٌ
|
إذا
حجبــت
شــمس
النّهــار
غمـائمُ
|
|
تقـولُ
العـدى
قـد
ضـاع
جيّـدُ
شـعره
|
وخــاطر
فـي
ذمّ
العـدى
وهـو
عاشـمُ
|
|
فقلـتُ
لهـم
مـا
ضـاع
مـدحي
وإنّمـا
|
جـــوائزُهُ
تـــأتي
لهـــنّ
تراكــمُ
|
|
ولـم
أر
لـي
فـي
النّاس
ذنبا
جنيتهُ
|
سـوى
طُـول
فضـل
وهـو
للسرّ
زق
حارمُ
|
|
أمــولاي
إنّــي
قــد
خـدمتُ
جنـابكم
|
بــدُرّ
مديـح
مـا
بـه
الغيـرُ
خـادمُ
|
|
ولـو
كـان
لي
في
العيش
أدنى
كفاية
|
غــدا
فيــك
مــدحي
مــوجُه
مُتلاطـمُ
|
|
فهـب
لـي
مـا
يبقـى
بـه
نشرُ
ذكركم
|
مـدى
الـدّهر
شـُكرا
مـا
لهُ
قطّ
صارمُ
|
|
وإنــي
مــن
جــدواك
مـازلت
آمنـاً
|
بمنزلــة
عليـاً
لهـا
الـدهر
خـادم
|
|
وإنّــي
علــى
مقــدار
فضـلك
طـالبٌ
|
مــن
النّفــع
لا
مقـدار
مـدحي
رائمُ
|
|
ولسـتُ
بمـا
أسـديت
لـي
أنـا
قـانعٌ
|
ومنـك
لمـن
دُونـي
العطايا
العظائمُ
|
|
ويرتــعُ
فــي
خصــب
بغيـث
نـوالكم
|
وزهــرُ
مـديحي
فيـك
بـالطّيب
ناسـمُ
|
|
ولــم
يــكُ
مــدحي
فـي
عُلاك
مُفخّمـا
|
لــذكرك
بــل
مــدحي
بـذكرك
فـاخمُ
|
|
أمــولاي
خُــذ
منّــي
بُيــوت
قصـيدة
|
بهــنّ
خريــداتُ
المعــاني
نــواعمُ
|
|
ولا
ثمــنٌ
فيهـنّ
منكـم
سـوى
الرّضـى
|
ومرتبــة
مـن
دُونهـا
النّسـرُ
حـائمُ
|
|
أطلـــتُ
ولكـــن
فــي
عُلاك
وجيــزة
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فعليــاك
لــم
يسـتوفها
قـط
نـاظمُ
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فلا
زلــت
منصــور
الجنــاب
مُؤيّـدا
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وأنـت
لهـذا
الملـك
والـدّهر
حـاكمُ
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ويهنيــك
عيــد
النّحـر
مـولاي
إنّـه
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لكــم
فيــه
فتــحٌ
بالمسـرّة
خـاتمُ
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