|
قـد
شـف
جسـمي
طـول
ما
أتشوف
|
لمشـــرف
بلقـــائه
أتشـــرف
|
|
مـالي
ووصف
الغانيات
وقد
مضى
|
زمـن
الصـبا
وسـلوت
عما
يوصف
|
|
قـد
كنت
بالتشبيب
عصر
شبيبتي
|
والــدهر
فيمـا
أرضـي
متصـرف
|
|
أدر
الرقـاع
على
الأحبة
أكؤساً
|
برقيـق
شـعر
مـا
سواه
القرقف
|
|
مــا
دنـه
إلا
الرقـاع
وكرمـه
|
فكــر
بغيــر
بنـانه
لا
يقطـف
|
|
فـإذا
ترشـفت
المسـامع
لفظـه
|
خلـت
القلوب
من
المسامع
ترشف
|
|
وإذا
عطفت
على
الرياض
بوصفها
|
خلــت
الغصــون
لرقـه
تتعطـف
|
|
إذ
كـان
لـي
إخـوان
لطف
كلهم
|
بــالطبع
لا
بتكلــف
يتلطفـوا
|
|
لا
يعرفـون
سوى
الوفاء
من
خلة
|
إن
الجفــاء
منكــر
لا
يعــرف
|
|
إن
قلـت
شـعراً
أنشدوه
تباهياً
|
كــل
إلــى
مـا
قتلـه
متشـوف
|
|
هــذا
يبـالغ
فـي
تحفظـه
وذا
|
بيراعـــه
لخليلــه
يســتوقف
|
|
وإذا
أديــرت
للعلـوم
مسـائل
|
وغـدت
سـيوف
البحث
منها
ترهف
|
|
شـاهدت
فرسـان
الـذكاء
كأنهم
|
فــي
حلبــة
كــل
مجـل
منصـف
|
|
ورأيـت
أقلام
الفـوائد
قد
غدت
|
كمنــاقر
للطيــر
كــل
يخطـف
|
|
لهفـي
علـى
قـوم
سقاهم
حينهم
|
كأسـاً
لهـا
كـل
البرايا
ترشف
|
|
والآن
صــرنا
فــي
زمـان
كلـه
|
ذنـب
فعنـه
وعـن
بنيـه
أصـدف
|
|
فبمـدحنا
ما
قد
مضى
من
دهرنا
|
سـقياً
لـه
عـن
ذم
هـذا
نصـرف
|
|
وأقــول
حيــاه
وحيــا
أهلـه
|
حـذراً
وخوفـاً
مـن
زمـان
يخلف
|
|
فـاعطف
عنان
يراع
نظمك
واصفاً
|
مـن
جـاء
منـه
عقـد
در
يرصـف
|
|
عقـد
مـن
اليـاقوت
قـد
قلدته
|
جيـد
اليـراع
ورصـفته
الأحـرف
|
|
ففضضـته
فأفـاض
بحـر
مـدامعي
|
وذكـرت
مـا
لـم
أنس
مما
أعرف
|
|
مـن
طيـب
أيـام
تقضـت
ليتهـا
|
دامـت
ونفـديها
بمـا
يسـتطرف
|
|
كــانت
مواقفنـا
بكـل
خريـدة
|
مـن
كـل
فـائدة
تـروق
المنصف
|
|
أتـراه
غـاظ
الدهر
طيب
وصلنا
|
فسـعى
إلـى
تفريقنـا
يتعجـرف
|
|
أم
عيـن
حاسدنا
أصيبت
بالعمى
|
نظــرت
فصــارت
حسـرة
تتلهـف
|
|
وعسـى
وعـل
وبعـد
هـذا
غيـره
|
فرجا
اللقا
من
غير
ما
يستشرف
|
|
وإليكهـا
قـد
ألبست
من
لطفها
|
بــرد
بمـدحك
والثنـاء
مفـوف
|
|
صـدرت
وبي
أكم
فجد
لي
بالدعا
|
فعســاه
بعـد
دعـاك
لا
يتوقـف
|