|
هبــت
ريــاح
الشــوق
بيــن
الأضـلع
|
فجــرت
بــأفق
الخــد
ســحب
الأدمـع
|
|
وتبلجـــت
أســحار
طرفــي
إذ
أتــت
|
آمـــال
قلـــبي
بــالبروق
اللمــع
|
|
ونمـت
غصـون
الشـوق
فـي
روض
الحشـا
|
وحنــت
علــى
كبــدي
حنــو
المرضـع
|
|
وعصــى
التجلــد
مهجــتي
وأطاعهــا
|
قلــق
جزعــت
لــه
وان
لــم
أجــزع
|
|
وفشــا
سـقامي
مـا
كتمـت
مـن
الأسـى
|
وخفيـــت
حـــتى
لا
أرى
فــي
مضــجع
|
|
وتعــرت
قــدم
الكــرى
لمــا
مشــت
|
فــي
ذيــل
جفــن
بالســهاد
مرقــع
|
|
ووصــلت
صــوم
صــبابتي
عــن
سـلوة
|
وهجعـــت
للبلــوى
وإن
لــم
أهجــع
|
|
فـــي
ليلــة
رقــم
الظلام
رداءهــا
|
بمنــــوّر
مــــن
زهـــره
ومنـــوّع
|
|
حيـــث
الهلال
تـــدب
عقربّــه
إلــى
|
وادي
مجرتـــه
اللذيـــذ
المكـــرع
|
|
وتــرى
الثريــا
عقــد
در
والــدجى
|
زنجيــــة
وافـــت
بجيـــد
أتلـــع
|
|
والفرقــدان
يريــك
لمــع
ســناهما
|
فــي
الــدجن
عينـي
ليـت
غـاب
أدرع
|
|
والشــهب
فــي
الآفــاق
تحسـب
أنهـا
|
رقــط
الأفــاعي
فــي
وهــاد
بلقــع
|
|
نـــاومت
فيهــا
قطبهــا
ومــدامتي
|
دمعـــي
ونقلـــي
حســرتي
وتفجّعــي
|
|
حــتى
نضــت
كــف
الصــباح
مهنــدا
|
ضـــربت
بـــه
عنــق
الظلام
الأســفع
|
|
وأبــانت
الشــمس
المنيــرة
وجههـا
|
مــن
تحــت
غيــم
شــف
شـف
الـبرقع
|
|
فالشـــمس
بيـــن
تـــبرج
وتســـتر
|
والغيـــم
بيـــن
تراكـــم
وتقشــّع
|
|
والجــــو
بيـــن
مزجّـــح
ومنيّـــل
|
والـــروض
بيـــن
مدبّـــج
وموشـــع
|
|
والنهـــر
بيـــن
ممـــرد
ومـــزرد
|
والزهـــر
بيـــن
منمـــق
ومرصـــع
|
|
والغصـــن
بيـــن
موشـــح
ومقلـــد
|
والـــدوح
بيـــن
مســـربل
وملفــع
|
|
والريـــح
بيـــن
مشـــّبب
ومزمّـــر
|
والطيـــر
بيـــن
مغـــرد
وموجـــع
|
|
فــي
روضــة
وشــى
الربيـع
ربوعهـا
|
بمـــــورد
ومعصـــــفر
ومجـــــزّع
|
|
ورقــا
خطيــب
الطيــر
منـبر
أيكـه
|
يلقــى
إلــى
الأســماع
أنــه
موجـع
|
|
وتبســّم
النــوار
إذ
رفــع
الشــذى
|
عطفــا
عليــه
فقــل
بعطـف
الموضـع
|
|
واجــزم
بحــر
جــداول
قــد
ســوغت
|
رفــع
الغصــون
علـى
انتصـاب
أرفـع
|
|
واعلــم
بــأن
البيــد
شــقة
حـائك
|
فـــدع
المطـــي
تشـــقها
بــالأذرع
|
|
وغـــذا
حللـــت
بمنـــزل
بغنــائه
|
أنــخ
المطــيّ
وقــف
ببـاب
المربـع
|
|
وافتـق
كمـام
الهـم
عـن
زهـر
الهنا
|
والثــم
بثغــر
الــدمع
خـد
الأربـع
|
|
واختـم
بوقـع
اللثـم
مـا
ضـم
الثرى
|
مــن
مهجــة
صــرعت
بــذاك
المصـرع
|
|
واقــر
الســلام
أحبــة
قــد
خيمـوا
|
فــي
خيــر
مرتــاع
وأخصــب
مربــع
|
|
وصـــف
اكتـــآبي
واغتلاق
حشاشـــتي
|
وذهـــاب
صــبري
وازديــاد
تــولعي
|
|
واسـتبق
ويـل
الـدمع
مـن
جفنـي
وقل
|
يـا
جفـن
جـد
بالـدمع
وافعـل
وامنع
|
|
واســأل
هــذار
الحــي
عنـي
وادعـه
|
هــذا
مقــام
القــول
قـم
قـل
وأدع
|
|
وانشــد
فـؤاد
ظـل
فـي
تيـه
الحمـى
|
لمــا
اهتـدى
بسـنا
البـدور
الطلـع
|
|
وحــذار
ثـم
حـذار
مـن
جـزع
اللـوا
|
فظبـــاؤه
ترعـــى
بـــواد
مســـبع
|
|
غيــد
بغــور
حشاشــتي
قـد
اتهمـوا
|
إذ
أنجــدوا
بــالمنحنى
مــن
أضـلع
|
|
لا
يشــرعون
مــن
الجفــون
لحربنــا
|
ومــن
الخـدود
سـوى
الطـوال
الشـرع
|
|
نظمـوا
المحاسـن
فاغتدوا
كالزهر
بي
|
ن
مرصـــع
والزهـــر
بيـــن
مرصــع
|
|
أرخــوا
ذوائبهــم
وأبــدوا
أوجهـا
|
تمّــت
بمــا
أخفــاه
غيــم
الـبرقع
|
|
مــن
كــل
باســمة
بثغــر
لـو
بـدا
|
للصــبح
لــم
تـبرزه
أيـدي
المطلـع
|
|
أو
غـازلت
طـرف
الغزالـة
فـي
الضحى
|
لهـــوت
إليهــا
مــن
محــل
أرفــع
|
|
أو
ضـاحكت
ثغـر
الأقاحـة
فـي
الربـا
|
لــم
يــزه
أفــق
بــالنجوم
اللمـع
|
|
أو
مـا
يسـت
عطـف
الأراكـة
في
النقا
|
لشــدت
بهــا
ورق
الغصــون
الينــع
|
|
أو
قيـــدت
قلـــبي
فـــإن
تخلّصــي
|
بمديـــح
أحمـــد
عمــدة
المتشــّفع
|
|
الفاتــح
الهـادي
الرسـول
المصـطفى
|
الخــاتم
المــاحي
الهمــام
الأشـجع
|
|
القــائم
الــداعي
الإمـام
المرتضـى
|
الصـــادق
الـــوافي
الأميــن
الأروع
|
|
الحاســر
العبــد
الشـكور
المحتـبي
|
العـــاقب
الليـــث
الهصــور
الأروع
|
|
غيــث
المـواهب
غـوث
ملهـوف
الحشـا
|
ليـــث
الكتــائب
معقــل
المتمنــع
|
|
عــون
اليتـامى
جيـر
مفقـود
الحجـى
|
كهـــف
الأرامــل
ملجــأ
المتضعضــع
|
|
زاهــي
الجــبين
أزج
أبلــج
أشــنب
|
عبــل
الــذراع
طويــل
متـن
الأصـبع
|
|
ضـــخم
الكــرادس
أدغــج
العينيــن
|
أقنـى
الأنـف
رحـب
الصـدر
فخم
الأضلع
|
|
رجـل
العقيقـة
أخمـص
القـدمين
شـتن
|
الكــف
ســهل
الخــد
حلــو
المنـزع
|
|
ذو
الحلـة
الخضـراء
تحت
اللمة
السو
|
داء
فــــوق
الواضـــح
المتشعشـــع
|
|
علــم
تــراءى
فــي
المعـالي
نعتـه
|
والشـــمس
لا
تخفــى
لفــرط
تشعشــع
|
|
محمـد
بـن
عبـد
اللـه
مـن
سن
الشجا
|
عـــة
والســـخاء
لغـــالب
ومجمــع
|
|
مـن
نسـل
فيـاض
ابـن
هاشم
ذي
العلا
|
نجــل
المغيــرة
نجــل
نجــد
مجمـع
|
|
أحيــــا
كلاب
بـــه
مـــآثر
مـــرة
|
عــن
فخــر
كعــب
عــن
لـوي
الأشـجع
|
|
عــن
غــالب
عــن
فهرهـم
عـن
مالـك
|
عـــن
نظرهــم
دعــوى
كنانــة
إذوع
|
|
بشــــرى
خزيمـــة
نســـل
مدركـــة
|
ابـن
إليـاس
إلهمـام
الأروع
المتروع
|
|
ذي
المكرمـات
بـه
ارتقـى
مضـر
علـى
|
هــام
الســماك
إلــى
نـزار
الأبـرع
|
|
الأبــرع
ابــن
معـد
مـن
عـدنان
فـي
|
نســــب
مكــــررة
يلـــذّ
لمســـمع
|
|
نجـل
الذبيـح
ابـن
الخليـل
المرتضى
|
مــن
نسـل
نـوح
نسـل
إدريـس
التبـع
|
|
مــن
انتمــى
نسـبا
لشـيت
المجتـبي
|
الأحســن
الصــفة
الكريــم
المضــجع
|
|
فهــو
ابـن
آدم
فـي
البسـيطة
رتبـة
|
وأبــوه
نــورا
فــي
العلا
المـترفع
|
|
أنبـــت
بـــه
التــوراة
والإنجيــل
|
والفرقــان
مـع
آي
الزبـور
المبـدع
|
|
والجـــن
الكهـــان
أبــدوا
وصــفة
|
بفصــيح
ألفــاظ
وعهــا
مــن
يعــي
|
|
ويبعثــه
الأصــنام
قــد
مــا
بشـرت
|
ولبعثــــه
خــــرّت
كقـــوم
صـــرع
|
|
ولأجـــل
مولـــده
الســماء
تزينــت
|
وهـــوت
كواعبهـــا
كطيـــر
وقـــع
|
|
وقضـــت
أشــعتها
علــى
جــن
غــدا
|
للســـمع
مســترقا
بخــرق
المســمع
|
|
وبنــــوره
الوضــــاح
أمنـــة
رأت
|
أعلام
بصــــري
كـــالبروق
اللمـــع
|
|
ولــه
أنطقــت
نيـران
فـارس
مثلمـا
|
غاضــت
بحيرتهــا
كــأن
لــم
تنبـع
|
|
وتســـاقطت
شــرفات
كســرى
عنــدما
|
أحنـــت
عليــه
ســماء
زهــر
طلــع
|
|
وبـــه
النجاشــي
اهتــدى
فأنــاله
|
مــا
لـم
ينلـه
التبـع
ابـن
التبـع
|
|
ودعـــا
حليمـــة
ســعدها
لإرضــاعه
|
فيــه
غــدت
تــدعى
بأشــرف
مرضــع
|
|
ولحكمــــة
شــــق
الملائك
قلبــــه
|
وحشــــوّه
معرفـــة
بســـر
أبـــدع
|
|
طلــق
جــواد
مـا
احتـبى
فـي
مربـع
|
إلا
وأصــــبح
غيـــث
ذاك
المربـــع
|
|
فــي
ليلــة
الإســراء
عـز
بمـا
رأى
|
وعلا
وقــد
ســمع
الــذي
لــم
يسـمع
|
|
نـاداه
قـل
تسـمع
وسـل
تعطـى
المنى
|
واشــفع
تشــفع
أنــت
صـدر
المجمـع
|
|
عـــم
الــورى
بخصــوص
جــود
حــده
|
قــد
جــار
محــدود
القيـاس
الأبـدع
|
|
البــــدر
شـــق
لقربـــه
بتشـــوق
|
والجـــذع
حـــن
لعبـــده
بتفجـــع
|
|
والشــاة
أنبــاه
الــدراع
بســمها
|
والضــــب
خـــاطبه
بحـــق
مصـــدع
|
|
والغيــــم
ظللــــه
ودان
لأمــــره
|
لمـــا
دعـــاه
بـــالغيوث
الهمــع
|
|
والصـــخر
لان
لــه
وحيتــه
الربــا
|
وأتـــت
لنصـــرته
الصــبا
بتســوع
|
|
ومشـى
علـى
الرمـل
المهيـد
فلم
يلح
|
أثـــر
بـــه
للنـــاظر
المتتبـــع
|
|
وبــــأمره
رد
الغزالـــة
بعـــدما
|
عزبـــت
ونجاهـــا
لأجـــل
الرضـــع
|
|
ولنحــوه
الشـجر
العظـام
أتـت
علـى
|
ســـاق
بلا
قـــدم
كمشـــي
المولــع
|
|
ودعـــا
بعـــذق
فاســـتجاب
لأمــره
|
وبـــأمره
ولــى
كــأن
لــم
يقلــع
|
|
وإليــه
مــال
الفيـء
إذ
لـم
يـترك
|
الصــحب
الرفـاق
لـه
بـه
مـن
موضـع
|
|
وبكفــه
نبــع
الـزلال
وأورق
العـود
|
الهشـــيم
فيــا
لهــا
مــن
منبــع
|
|
وبهــا
الحجــارة
سـبحت
وأطـال
مـا
|
صــلت
عليــه
وســلمت
فــي
البلقـع
|
|
وبهــا
الطعــام
غــدا
يســبح
ربـه
|
تســــبيح
عبـــد
خاضـــع
متخشـــع
|
|
والغــار
عــز
وقــد
حمــى
بحمـامه
|
بحـــرا
وبـــدرا
ركبــا
فــي
أروع
|
|
ويســـره
قــد
ســاخ
طــرف
ســراقه
|
وبــه
اهتــدى
لمــا
دعــا
بتخضــع
|
|
وبصــدقه
المولــود
أنبــأ
مفصــحا
|
للســـان
حـــق
كــالخطيب
المصــفح
|
|
والــذئب
صــدقه
وقــد
قلـب
العصـا
|
لعكاشـــة
ســـيفا
حديــد
المقطــع
|
|
وبجــاهه
ســلم
البعيـر
مـن
الـردى
|
وغــدا
قريــر
العيــن
غيــر
مـروع
|
|
وبنخســة
قــد
عــاد
شــارق
جــابر
|
مـــن
بعــد
عجــز
لا
يعــن
لمســرع
|
|
وبخفقــة
فــرس
ابــن
ســهل
أحـرزت
|
ســبق
المــدى
وكــذاك
طـرف
الأسـجع
|
|
وبضــربة
هــد
الكــثيب
ولــم
يكـن
|
لـــولاه
يشـــكو
حالـــة
المتصــدع
|
|
وبلمســـه
درت
عنـــاق
لـــم
تلــد
|
وكفــى
بهــا
أصــحابه
فــي
مجمــع
|
|
وبنــزر
زاد
أشــبع
الجيــش
الــذي
|
مــن
كـثرة
لـو
لـم
يشـأ
لـم
يشـبع
|
|
وبريقـــه
قـــد
رد
عيـــن
قتــادة
|
وأعــاد
ملــح
المـاء
عـذب
المكـرع
|
|
ويــد
ابــن
عفــرا
أصـبحت
ببصـاقة
|
مــن
بعــدما
قطعـت
كـأن
لـم
تقطـع
|
|
وأعــد
شــق
خــبيب
فــي
بـدر
كمـا
|
قــد
كــان
بــل
أبهـى
بريـق
أنفـع
|
|
وبــه
شــفى
عينــي
علــي
إذ
غــدا
|
رمـــدا
بخيـــبر
مســـتهل
الأدمــع
|
|
وبنضــح
المــاء
فــي
محيــا
زينـب
|
أخفــى
الغزالـة
وهـو
تحـت
الـبرقع
|
|
ورمـــى
كفــا
مــن
تــراب
أوجهــا
|
شــاهت
فلــم
تلبــث
لفــرط
تــورع
|
|
وببأســه
أعيــا
أبــا
جهــل
كمــا
|
أوهــي
ركانــة
وهـو
مـن
لـم
يصـرع
|
|
وبطعنــة
أردى
أبيــة
فــي
الــوغى
|
وشــفى
بنفــث
ســاق
نجــل
الأكــوع
|
|
وعفــا
وقــد
عــاد
الحســام
لكفـه
|
مــن
كــف
غــورث
للمهــول
المفـزع
|
|
ودعـــا
لآل
خـــال
أبيـــه
فــأمنّت
|
أســـكفه
البــاب
العزيــز
الأمنــع
|
|
ودعـا
لمـن
تحـت
العبـاءة
فاغتـدوا
|
كـــالزهر
فــي
نــور
وعــز
ترقــع
|
|
ولأم
مالــك
قــد
دعــا
فلــذاك
فـا
|
ض
الســمن
حــتى
ســد
بـاب
المطلـع
|
|
وأبــان
عمــا
كــان
أو
هــو
كـائن
|
لحذيفـــة
الــبر
الصــدوق
الألمــع
|
|
وبعزمـــه
ارتجـــت
جبــال
تهامــة
|
إذ
راودتــه
ولــم
تــرم
مـا
تـدعي
|
|
وبـــأمره
عـــاد
الطفيــل
لقــومه
|
يـــدعو
بأنـــة
صــوته
المتشعشــع
|
|
وبجـــاهه
الأعمـــى
توســل
ضــارعا
|
فغــدا
قريــر
العيـن
سـهل
المهيـع
|
|
وبمســـحة
عـــاد
الصـــبي
بــوفرة
|
مــن
بعــد
مــا
وافـى
بـرأس
أقـرع
|
|
وبنـــوره
عـــادت
لعابـــد
غـــرة
|
أغنتــه
عــن
غــرر
البـدور
الطلـع
|
|
ومــن
الجــذام
شــفى
بنفثتـه
وكـم
|
للمصـــطفى
مــن
آيــة
لــم
تســمع
|
|
نــور
هــدى
مــن
خيــرة
لمـا
أتـى
|
بجميـــل
فرقـــان
هـــدى
وتشـــرع
|
|
وهلال
رشــــد
لــــم
يـــزل
متهللا
|
وســـحاب
جـــود
ليـــس
بالمتقشــع
|
|
كــم
قـد
شـفى
سـقيما
وأحيـا
ميتـا
|
وأبــــاد
ضـــلالا
وجـــاد
لمهطـــع
|
|
ولكــم
أجــار
بــأمنه
مــن
مــذعن
|
ولكــم
أبــاد
بســيفه
مــن
مبــدع
|
|
ولكــم
أجــاد
الخصـب
خصـبا
مثلمـا
|
منــع
النزيــل
بعزمــة
لــم
تخـدع
|
|
بطــل
إذا
ارتعــد
الكمــاة
مخافـة
|
لــم
يرتعــد
خوفــا
ولــم
يتخضــع
|
|
يــوهي
حصــاة
الحــرب
غيــر
مشـمر
|
ويهــد
ركــن
الخطــب
غيــر
مــدرع
|
|
جمـــع
الإلــه
بســيفه
فــرق
العلا
|
إذ
كــــن
بيـــن
مبـــدل
ومضـــيع
|
|
حيــث
الريــاح
تمــد
أيـديها
لكـي
|
تـــدني
بطعـــن
مبطئا
مــن
مســرع
|
|
والخيــل
تطفــق
فـي
بحـرا
دمائهـا
|
والنبــل
تغـرق
فـي
الطلـى
والأضـلع
|
|
والشـــم
هــامت
بــالقلوب
كأنهــا
|
تبغـي
الوقـوف
علـى
الضـير
المـودع
|
|
ولــواء
أهــل
الشــرك
نكـس
إذ
علا
|
علــم
الهــدى
بيـن
اللـوا
والأجـدع
|
|
وخيــامهم
قــد
قوضــت
مــن
حينهـا
|
بــالبيض
تقــويض
الجهــام
المقلـع
|
|
فالـــدين
بيـــن
تهلـــل
وتبســـم
|
والكفـــر
بيـــن
تقطـــب
وتفجـــع
|
|
زرع
الطعــان
فســنبلت
قضـب
القنـا
|
مـــن
حينهــا
بــرؤوس
تبــع
شــيع
|
|
وتسلســلت
خلــج
الريــاء
لكونهــا
|
جنـــت
بلثــم
تــراب
نقــع
أســفع
|
|
فـــي
معــرك
ظلــت
لكعبــة
رمحــة
|
المســـنون
هامـــات
بغيــر
تطــوع
|
|
وســعت
لنصــر
حســامه
زمـر
العـدا
|
فــــي
قـــوم
أو
ســـجد
أو
ركـــع
|
|
وزعتهــم
بيــد
الصــوارم
والقنــا
|
يــا
مــن
أبــاد
جمــوعهم
بتــوزّع
|
|
وأنتـل
مـا
لـم
يعطـه
إلاك
يـا
حامي
|
الـــذما
ومنعــت
مــا
لــم
يمنــع
|
|
وهزمــت
جيـش
الكفـر
بـالفئة
الـتي
|
لــم
تبــق
فيهــا
غلــة
لـم
تنفـع
|
|
مـــن
كــل
قــوم
طــاعن
أو
ضــارب
|
بالســـمهري
وبـــالحس
أم
الأقطـــع
|
|
إن
حـاربوا
وصـلوا
الخطـى
بنضـالهم
|
أو
طــاعنوا
وصـلوا
القنـا
بالـذرع
|
|
أو
طــاولوا
طــالوا
العلا
بعــزائم
|
لـــم
يلوهــا
طمــع
لــبرق
مطمــع
|
|
الخافضــين
العيــش
بالنصــب
الـذي
|
جزمــت
لــه
العليـا
برفـع
الموضـع
|
|
المطعميـــن
الجـــار
قبــل
توســل
|
والطـــاعنين
النحــر
بعــد
تمنــع
|
|
فبـــأي
جــود
لــم
تفــض
أيــديهم
|
أم
أي
حبـــار
لهـــم
لـــم
يخضــع
|
|
روّوا
محبهـــــم
بشــــهد
نــــافع
|
وســـقوا
أعـــاديهم
بســـم
منقــع
|
|
صــحب
النــبي
وخيــر
أمتــه
الـتي
|
هــي
خيــرة
الأمــم
الهـداة
الطلـع
|
|
التـــائبين
القـــانتبين
لربهـــم
|
ألقــــائمين
الســـاجدين
الركـــع
|
|
أســد
مخالبهــا
الرمــاح
تقودهــا
|
أســـد
تــرد
الأســد
مثــل
الأضــيع
|
|
نصــرت
بــه
الأنصـار
فـي
أحـد
وقـد
|
فـــروا
وكـــر
بهمــة
لــم
تبــدع
|
|
وأراهــم
فــي
يــوم
بــدر
مشــهدا
|
ضـــنكا
تشـــيب
بــه
رؤوس
الرضــع
|
|
وأعــاد
بالإعجــاز
هامــات
الــورى
|
أعجــــاز
نخـــل
خاويـــات
وقـــع
|
|
عــذبت
مشــارعه
وقــد
شـرع
الهـدى
|
فاشـــهد
بمشـــرع
ســـؤدد
ومشــرع
|
|
وعضــت
ســواه
نجـائب
الشـيم
الـتي
|
ألقـــت
إلــى
يــده
مقــادة
طبــع
|
|
بـــدر
ولا
كالبـــدور
فيــه
تكلــف
|
بحــر
ولا
كــالبحر
ملــح
المشــروع
|
|
غيـــم
ولا
كـــالغيم
فيـــه
تجهــم
|
ليـــث
ولا
كـــالليث
لــدن
الأخــدع
|
|
طـــود
ولا
كـــالطود
فيــه
تزلــزل
|
ســيف
ولا
كالســيف
نــابي
المقطــع
|
|
نمحــو
بــه
ليــل
الخطــوب
وإنمـا
|
نمحـــو
بوضـــاح
الجــبين
ســميدع
|
|
عقــدت
عليــه
خناصـر
المجـد
الـذي
|
أضـــحى
يشــير
لــه
الحلال
بأصــبع
|
|
طبعــت
علـى
الخلـق
الجميـل
طبـاعه
|
مـــا
شــيمة
المطبــوع
كــالمتطبع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغـــدا
قــوام
العــالم
المتنــوع
|
|
فــــرد
تثنــــى
جمعـــه
بتوحـــد
|
فيــه
ومنــه
إليــه
ســر
المجمــع
|
|
فـــرد
ترفـــع
قــدره
عــن
مشــبه
|
فســما
علــى
هــام
السـماك
الأرفـع
|
|
فـــرد
تنــوع
بالمعــاني
منــه
إذ
|
جلـــت
معـــاليه
عـــن
المتتبـــع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالســـعادة
هــديه
|
والحـــق
لا
يخفـــى
عــن
المــتيمع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
نطقــه
|
فـــإليه
يرجــع
أصــل
كــل
منــوع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
لفظــه
|
فـــإليه
يرجــع
أصــل
كــل
منــوّع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فـــإليه
يعــزى
كــل
حســن
ممتــع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغــدا
ســليم
الـذوق
عـذب
المشـرع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغـــدا
قــوام
العــالم
المتنــوع
|
|
فـــــرد
تنــــوع
الجلال
جمــــاله
|
والـــروض
يزهـــو
نـــوره
بتنــوّع
|
|
فــــرد
تنــــوع
كــــارم
طبعـــه
|
فقضـــى
بتوحيــد
الجمــال
الأبــرع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
شــكله
|
كـــالأفق
يزهــو
بــالنجوم
الطلــع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فلــذا
ترفــع
عــن
دواعـي
المـدعي
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغــدا
صــباح
الكـون
شـمس
المطلـع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغـــدا
قــوام
النيــر
المتشعشــع
|
|
فـــرد
تنـــوع
المحاســـن
جمعـــه
|
فغـــدا
قـــوم
النيــر
المتشعشــع
|
|
فـــرد
تنـــوع
بالمحاســـن
جمعــه
|
فغـــدا
قـــوم
العــالم
المــترفع
|
|
هــذا
هــو
الشـرف
الـذي
لـم
يعلـه
|
شــرف
علــى
شــرف
البــدور
الطلـع
|
|
هــذا
هــو
الفخـر
الـذي
لـم
تحصـه
|
والبحـــر
لا
يحصــى
بكيــل
الأصــوع
|
|
هــذا
هــو
الـذكر
الصـحيح
فلا
تحـد
|
عنـــه
وإن
شــئت
الحــديث
فــألمع
|
|
بمــديحه
جــاء
الكتــاب
فمـا
عسـى
|
تــأتي
بــه
فــي
مــدحه
يـا
مـدّعي
|
|
إن
قلـــت
أرغمــت
الأنــوف
بــأغلب
|
قــالت
لــك
الشـيم
الكـرام
وأطـوع
|
|
أو
قلــت
قــد
رفــع
الضـلال
بـأعظم
|
قــالت
لــك
النعـم
الجسـام
وأنفـع
|
|
أو
قلــت
قــد
منـع
الوشـيح
بـأمنع
|
قــالت
لــك
الـبيض
الحـداد
وأقطـع
|
|
لا
تغــتر
وتظــن
مــدحك
قــد
حــوى
|
مــا
قــد
حـوى
مـن
كـل
وصـف
ممتـع
|
|
أيطيــق
محــص
حصــر
عشــر
صــفاته
|
لا
والــذي
قــد
ســد
عـن
ذا
مسـمعي
|
|
لكـــن
تقصـــيري
وخـــبي
أحوجـــا
|
بــي
للمديــح
فمــل
إليــه
وأسـمع
|
|
كهـــف
منيـــع
مــا
أويــت
لظلــه
|
إلا
أويـــت
إلـــى
رحيـــب
مصـــرع
|
|
قســما
ولا
استســقيت
منهــل
جــوده
|
الا
ســـقيت
بكـــاس
فضـــل
مـــترع
|
|
يــا
مــن
بـه
نجـى
المهيمـن
آدمـا
|
وعليـــه
تـــاب
بجــاهه
المــترفع
|
|
يــا
مــن
بــه
شـيت
توسـل
فاغتـدا
|
فــــي
عــــزة
وجلالــــة
وترفـــع
|
|
يــا
مــن
بــه
إدريــس
نـاجى
ربـه
|
فعلا
مقامـــا
فـــي
مقـــام
أرفــع
|
|
يــا
مــن
بــه
أجــرى
لنـوح
فلكـه
|
لمــا
طغــى
الطوفـان
فـوق
البلقـع
|
|
يــا
مــن
بــه
هـود
رأى
فـي
عـاده
|
مــا
شــاء
مــن
ســخط
مهـول
مفـزع
|
|
يــا
مــن
بـه
قـد
لاذ
صـالح
عنـدما
|
عقــدت
ثمــود
قلوصــه
فـي
المربـع
|
|
يــا
مــن
بـه
لـوط
نجـا
فـي
قـومه
|
لمــا
ارتضـوا
فعـل
القبيـح
الأشـنع
|
|
يـا
مـن
بـه
حـل
الخليـل
وقـد
هـوى
|
فـــي
نــار
نمــرود
بــروض
أينــع
|
|
يـا
مـن
بـه
سـلم
الذبيـح
من
الردى
|
وفـــــداه
مـــــولا
بكبــــش
أدرع
|
|
يــا
مــن
بــه
إســحاق
صـير
أهلـه
|
فــي
خفــض
عيــش
وازديــاد
ترفــع
|
|
يــا
مــن
بــه
يعقــوب
فـرج
حزنـه
|
إذ
شــمّ
ريــح
قميــص
يوســف
منبـع
|
|
يـا
مـن
بـه
فـي
الجـب
أصـبح
يوسـف
|
مستبشــرا
لــم
يخــش
كيـد
الموقـع
|
|
يــا
مــن
بــه
الرحمـن
سـلم
عبـده
|
أيـــوب
مـــن
ضـــر
وفــرط
توجــع
|
|
يــا
مــن
بــه
زكــى
شــعيبا
ربـه
|
وقضـــى
لمــدين
بالحضــيض
الأوضــح
|
|
يـا
مـن
بـه
موسى
استعان
على
العدا
|
فأبـــادهم
بــاليم
بعــد
الضــفدع
|
|
يـا
مـن
بـه
هـارون
قد
حاز
الحبورة
|
والنبــــؤة
واللســــان
الأصــــقع
|
|
يــا
مـن
بـه
قـد
لاح
للخضـر
الهـدى
|
وأنـــال
ذا
القرنيــن
كــل
ممنــع
|
|
يــا
مــن
بـه
إليـاس
أصـبح
طـائرا
|
بيــن
الملائك
فــي
الفضــاء
الأوسـع
|
|
يــا
مــن
بــه
داود
أوقــف
طيــرا
|
وبســـرد
وقفـــت
ذكـــاء
ليوشـــع
|
|
يـا
مـن
بـه
ذو
الكفـل
والأسباط
وال
|
يســع
اغتــدوا
فــي
عــزة
وتمنــع
|
|
يــا
مـن
بـه
وافـى
سـليمان
الهنـا
|
برجـــوع
خـــاتم
ملكــه
المتمنــع
|
|
يــا
مـن
بـه
فـي
اليـم
أنـس
يـونس
|
ونجـــا
وقـــد
نــاداه
أن
يتضــرع
|
|
يـا
مـن
بـه
آمـن
العزيـز
ولـم
يخف
|
مــن
قــول
كهــان
اليهــود
الأشـنع
|
|
يــا
مــن
بــه
لأبـي
الحصـور
تهـأت
|
اســباب
صــبر
عنــد
نشــر
الأضــلع
|
|
يـا
مـن
بـه
يحيـى
اقتـدى
فـي
زهده
|
حـــتى
دعـــي
بالزاهــد
المتــورع
|
|
يـا
مـن
بـه
الأملاك
والرسـل
اهتـدوا
|
لعــوارف
المــولى
القـدير
المبـدع
|
|
يــا
مــن
بـه
الصـديق
صـدق
إذ
رأى
|
مــا
قــد
رأى
مــن
آيـة
لـم
تـدفع
|
|
يــا
مـن
بـه
الفـاروق
فـرق
مادحـا
|
مـــن
باطـــل
بحســام
حــق
مقمــع
|
|
يـا
مـن
بـه
عثمـان
ذو
النـورين
قد
|
أضـــحى
بنـــوريه
شــريق
المطلــع
|
|
يــا
مـن
بـه
زوج
البتـول
رقـى
علا
|
أمســى
بهــا
يــدعى
علــي
الموضـع
|
|
يـا
مـن
بـه
فـي
الحـرب
طلحة
انتمى
|
لتثبــــت
وتــــوثب
لـــم
يـــدفع
|
|
يــا
مــن
بـه
تـرك
الزبيـر
قرينـه
|
عنــد
التجــادل
كالــذليل
الأصــرع
|
|
يــا
مــن
بـه
سـعد
علا
فـرأى
العلا
|
تــدعو
الفــتى
زاحــم
بســعد
أودع
|
|
يــا
مــن
بــه
أضــحى
سـعيد
آمنـا
|
ببشــارة
الخلــد
المقيــم
الأمتــع
|
|
يـا
مـن
بـه
العـف
ابـن
عوف
قد
كفى
|
الــدارين
إذ
وافــى
بعيــش
مقنــع
|
|
يــا
مــن
بــه
لأبــي
عبيـدة
فتحـت
|
بالشــام
أبــواب
الفتــوح
الأنجــع
|
|
يـا
مـن
بـه
الحسـنان
قد
سادا
شباب
|
الجنــة
الفيحــا
بســر
قــد
دعــي
|
|
يـا
مـن
بـه
عمـاه
حمـزة
والفتى
ال
|
عبـــاس
قــد
فــازا
بخيــر
ممتــع
|
|
يــا
مــن
بــه
الأزواج
والأولاد
قــد
|
حلــوا
ذرا
الــروض
الأريــض
الأينـع
|
|
يـا
مـن
بـه
الصـحب
الكـرام
ترفعوا
|
قــدرا
علـى
القمـر
المنيـر
الأبـدع
|
|
يـا
مـن
بـه
تنـزّه
أن
يكـون
لجسـمه
|
ظـــل
لســـاطع
نـــوره
المتشعشــع
|
|
يــا
صـاحب
الـدرج
المرفـع
واللـوا
|
والكـــوثر
العــذب
الألــذ
الأنفــع
|
|
يـا
صـاحب
الخـاتم
والعضباء
والسيف
|
المهنـــــد
والجــــواد
الأتلــــع
|
|
يـا
صـاحب
البردين
والنعلين
والتاج
|
المكلـــــل
والقضــــيب
الأينــــع
|
|
يـا
ذا
الهـراوة
والغمامـة
والعلامة
|
والشــــفاعة
والمقــــام
الأرفـــع
|
|
يـا
ذا
الفصـاحة
والصباحة
والسماحة
|
والحماســــة
والجمــــال
الأبـــدع
|
|
يـا
مرشـد
الحيـران
يـا
كنـز
الوفا
|
يــا
ذا
النــوال
الســابق
المشـرع
|
|
يـا
ذا
الوسـيلة
والفضـيلة
والأمامة
|
والصــــراط
المســـتقيم
المهيـــع
|
|
يا
صاحب
البرهان
والسلطان
والتأييد
|
بـــــالرعب
المهـــــول
الأطلــــع
|
|
يـا
صـاحب
الآيـات
يـا
مـن
قـد
حـوى
|
فضـــلا
يقصـــر
عنــه
جمــع
مجمــع
|
|
يـا
مـن
إليـه
الخلـق
تفـزع
فـي
غد
|
مـــن
موقـــف
ضــنك
وهــول
مفــزع
|
|
إنــي
فزعــت
إليـك
فـي
أمسـى
وفـي
|
يــومي
وفــي
الآتــي
فــأمّن
مفزعـي
|
|
وبســطت
كــف
المــدح
مفتقـرا
لكـي
|
ألقـى
الغنـي
يـا
خيـر
ممـدوح
دعـي
|
|
وجمعــت
فيــك
مقــال
كــل
بديعــة
|
فــوق
المقــال
ولــم
نحـط
بـالأجمع
|
|
ونظمــت
فــي
عليــاك
عقــد
جـواهر
|
يرويــــه
كــــل
مرســـل
ومســـجع
|
|
لأكـــون
فــي
دنيــاي
غيــر
مضــيع
|
وأكــون
فــي
أخــراي
غيــر
مــروع
|
|
فاشـفع
بجاهـك
لـي
وكـن
لـي
مكرمـا
|
يـــا
خيــر
مــأمول
وخيــر
مشــفع
|
|
يــا
رب
يــا
اللــه
أمــن
روعــتي
|
وراحـــم
لـــديك
تخضــعي
وتشــفعي
|
|
واقبــل
مــديحي
فـي
حبيبـك
وأتنـي
|
منــك
الرضــا
وتــولني
فـي
مصـرعي
|
|
وامنـــن
بعـــود
للحطيــم
وزمــزم
|
وزيــارة
القــبر
الشــريف
الأرفــع
|
|
وانعــم
بعفــو
عــن
ذنــوب
ســودت
|
مـــبيض
وجهـــي
بالقبيــح
الأقطــع
|
|
وأجــر
مـن
النيـران
جسـمي
واكسـني
|
فــي
الخلـد
أثـواب
النعيـم
الأمتـع
|
|
واغفـــر
لآبـــائي
واشــياخي
وجــد
|
للمســــلمين
بجــــودك
المتـــبرع
|
|
وأدم
صــلاتك
والســلام
علــى
النـبي
|
المصــطفى
الهــادي
الرسـول
الأشـفع
|
|
وأفــق
علــى
الأصــحاب
أســبع
حلـة
|
رقـــم
النعيـــم
أديمهــا
بتمتــع
|
|
مـا
هـل
وبـل
الـدمع
مـن
وجـد
ومـا
|
هبــت
ريــاك
الشــوق
بيــن
الأضـلع
|