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تبـــا
لـــدهرٍ
خـــاينٍ
غــدارِ
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منـــكٍ
مكيـــد
مهتـــكٍ
مكــارِ
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الشـــر
شــيمتهُ
ومــن
أخلاقــه
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خلــق
الأســى
وتولــد
الاضــرارِ
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فـي
كـلّ
لمحـة
ناظرٍ
يبدى
الردى
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ويـري
الفـتى
كـدراً
مـن
الاكدارِ
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كـم
بـات
يرشـقنى
بنبـل
خطـوبه
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ويــذيقني
منــه
كــؤوس
مــرارِ
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بـل
كـم
بليـت
بمحنـةٍ
منـه
وكم
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قــد
زجنــي
فـي
أبحـر
الأخطـار
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واليــوم
فـوّق
سـهمه
نحـوي
وأر
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مــاني
بــه
متعمّــدا
ادمــاري
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لكــن
يـد
المـولى
كفتنـي
شـرهُ
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وتلطَّــف
القـدر
المعـد
الجـاري
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لمـا
ابتليـت
بسـقطةٍ
سـقطت
على
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جنــبي
اليميـن
وأثـرت
بيسـاري
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وغـدوت
ملقـىً
فـي
الفراش
مكسحاً
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أشـكو
المصـيبة
ليلـتى
ونهـاري
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أتنفــس
الصـعداء
مـن
قلـب
شـجٍ
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شــاكي
الوبـال
مبلبـل
الأفكـارِ
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قبحـاً
لهـا
مـن
سـقطةٍ
قـد
عطَّلت
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قــدميّ
عـن
سـعيي
وعـن
أسـفاري
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وعــدمت
انــس
أحبـتي
وزيـارتي
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ذاك
المقـام
ورحـب
تلـك
الـدار
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دارٌ
بهـا
فلـك
التهـاني
لم
يزل
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أبــداً
يـدور
علـى
مـدى
الأدوار
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وعزيزهـا
لا
زال
يرفـل
فـي
بهـا
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حلـل
البقـا
وينـال
خيـر
فخـارِ
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ذاك
الحبيب
أبو
البشارة
من
حوى
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أدبــاً
عجيبــاً
فـايق
المقـدار
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وزهــا
بحســن
منــاقبٍ
ومحامـدٍ
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بيــن
الأنــام
زكّيــة
المعطـار
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وســما
وفــاق
برقــةٍ
وظرافــةٍ
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وســـخاوةٍ
محمـــودة
التــذكار
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وخلا
بلطــف
شــمايلٍ
تثنـي
علـى
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مــدد
الزمــان
ودورة
الإعصــار
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وجميـع
أربـاب
الحجـى
فـي
فضله
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شــهدت
وأوفــت
صــحة
الأقــرار
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بيمينــه
قلــم
الحســاب
كـأنه
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رمـــحٌ
تلاعبــه
يــدُ
المغــوار
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أيــوب
نصـر
اللـه
دام
لـهُ
ولا
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برحــت
تلاحظــه
عيــون
البـاري
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مـا
قـد
شدا
شادى
الربى
مترنما
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وتغنـــت
الأطيـــار
بالأســـحار
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والــترك
يختـم
معربـاً
ومنضـّداً
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درر
المديــح
بأفصــح
الأشــعار
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داعٍ
لـه
حـتى
إلـى
يـوم
اللقـا
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بالارتقــا
فــي
السـر
والاجهـار
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وإلى
الغصون
الينع
يفترض
الدعا
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فــي
نشــوهم
وبطولــة
الأعمـار
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