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لا
يبلُـغ
المـرء
منتهـى
أرَبه
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إلا
بعلــم
يَجــدّ
فــي
طلبـه
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فَــأْوِ
إلـى
ظلّـه
تعـش
رغَـداً
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عيشـاً
أمينـاً
من
سوء
مُنقلبَه
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واتعـب
لـه
تسـترح
بـه
أبداً
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فراحـة
المـرء
مـن
جَنى
تعبه
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ولــذّة
العلــم
مـن
تَـذَوَّقها
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أضـرب
عـن
شـهده
وعـن
ضـَربه
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وأن
للعلــم
فـي
العلا
فَلَكـاً
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كـل
المعـالي
تـدور
في
قُطُبه
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فاســعَ
إليـه
بعـزمِ
ذي
جَلَـد
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مُصــمّم
الـرأي
غيـر
مضـطربه
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وأبـذُل
لـه
مـا
ملكت
من
نَشَب
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فـالعلم
أبقى
للمرء
من
نشبه
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لا
تتّكــل
بعــده
علــى
نَسـَب
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فالعلم
يُغني
النسيب
عن
نسبه
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وأطّــرح
المجـد
غيـرَ
طـارفه
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وأجتنـب
الفخـر
غيـر
مكتَسَبه
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مـا
أبعـد
الخيرَ
عن
فتىً
كَسِل
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يسـرح
فـي
لهـوه
وفـي
لَعِبـه
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كـم
رفـع
العلـم
بيت
ذي
ضَعَة
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فقصـّر
النـاس
عـن
مـدى
حَسَبه
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حـتى
تمنّـى
أعلى
الكواكب
لو
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يحُـلّ
بيتـاً
يكـون
فـي
صـَقَبه
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وودّت
الشــمس
فــي
أشــعّتها
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لـو
كـنّ
يُحْسـَبْن
من
قوى
طُنُبه
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وأن
يَســـُد
جاهــل
فســؤدده
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بعـد
قليـل
يُفضـي
إلـى
عَطَبه
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يـرى
امـرؤ
مجـد
جاهـل
عجباً
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لـو
صـحّ
عقلاً
لكـفّ
عـن
عجبـه
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كـم
كـذب
الـدهر
فـي
فعائله
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وسـؤدد
الجـاهلين
مـن
كَـذِبه
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العلـم
فَيْـض
تحيا
القلوب
به
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فأمتّـح
بسَجْل
الحياة
من
قُلُبه
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كــل
فَخـار
أسـبابه
انقطعـت
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إلا
فخــاراً
يكـون
مـن
سـببه
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للعلـم
وجـه
بالحسـن
مُنتقِـب
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وســافرٌ
منــه
مثـل
منتقبـه
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مـا
حُسـن
وجـه
الفتى
بمَفخَرة
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أن
لـم
يؤيَّد
بالحسن
من
أدبه
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مـا
أقـدر
العلـمَ
أنّ
صـَيْحته
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يُمْعِـن
منهـا
الخميس
في
هربه
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مـن
تَخِـذ
العلـمَ
عُـدّة
لـوغىُ
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أغنـاه
عـن
دِرعـه
وعـن
يَلَبه
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فأنتـدِب
العلـم
للخطـوب
فما
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خــاب
لعمِـري
رجـاء
منتـدِبه
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العلــم
كـالنور
بـل
أفضـله
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مـا
أفقـرَ
النورَ
أن
يُشبَّه
به
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وإنمــا
العلـم
للنُهـى
عَصـَبٌ
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والحسّ
في
الجسم
جاء
من
عصبه
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ســَقياً
ورعيـاً
لـروض
معهـده
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وطـــالبيه
وقــارئي
كتبــه
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مــا
النـاس
إلاّ
رُوّاد
نُجْعتـه
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وناشـــروه
وكاشــفو
حُجُبــه
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ومــن
غــدا
هاديــا
يعلّمـه
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وراح
يشـفي
الجهـول
من
وَصبَه
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ومعهـــد
أسِّســـت
قواعـــده
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فــي
بلـد
شـَفّني
هـوى
عربـه
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شـــيّده
للعلـــوم
مدرســـة
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مـن
كان
نشر
العلوم
من
دَأَبه
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قـد
غَـرَّد
المجـد
فـي
جوانبه
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فـاهتَزّ
عِطـف
الفَخار
من
طربه
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وأصـبح
العلـم
فيـه
مُزدهِـراً
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بكـلّ
ذاكـي
الـذكاء
ملتهبـه
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بمثلــه
فــي
البلاد
قاطبــةً
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يُشـفى
عَقُـور
الزمان
من
كَلَبه
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أضــحت
فلسـطين
منـه
مُمْرِعـة
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مـذ
جادهـا
بالغزير
من
سُحُبه
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تــاهت
بــه
ايليـاء
فـاخرة
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علـى
دمشـق
الشـَآم
أو
حلبـه
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شـكراً
لبـانيه
مـا
أقـام
به
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شـُبّانه
القـاطنون
فـي
قُبَبـه
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