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أدب
العلــــم
وعلــــم
الأدب
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شــرف
النفــس
ونفــس
الشـرف
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بهمــا
يبلــغ
أعلــى
الرتـب
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كــل
رام
منهمــا
فــي
هــدف
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أيهـا
السـابح
في
بحر
الفنون
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غائصــاً
فــي
لُجّهـا
الملتطِـم
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أنـت
واللَّـه
علـى
رغم
المنون
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ذو
وجـــود
قاتـــل
للعَـــدَم
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قرنـك
الحاضر
من
أرقى
القرون
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خضـــع
الســيف
بــه
للقلــم
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فـــإذا
شـــئت
بلـــوغ
الأرَب
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فــأغترف
مــن
بحـره
وأرتشـف
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فالمعـالي
أودعـت
فـي
الكتـب
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كــاللآلي
أودعــت
فـي
الصـَدَف
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أنـت
يـا
جاهل
من
قبل
الممات
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ميّـت
يمـرح
مـا
بيـن
البُيـوت
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أوَ
مـا
تعلـم
فـي
هذي
الحياة
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أن
رب
العلــم
حــيٌّ
لا
يمــوت
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إذ
قضـى
للعلـم
ربُّ
الكائنـات
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بــالعلا
فهـو
زمـام
الملكـوت
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وعلــى
الجهــل
قضـى
بـالعَطَب
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فهـو
فـي
النـاس
دليـل
التَلَف
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فـأفتكر
أن
شـئت
علـم
السـبب
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هـل
يكـون
النـور
مثـلَ
السَدَف
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يـا
رعـى
الله
زماناً
لو
يدوم
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كــان
للــدهر
كأيـام
الصـبا
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أشـرقت
فيـه
مـن
العلـم
نُجوم
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ظـنّ
كـل
النـاسِ
أن
لـن
تغرُبا
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زمـن
قـد
ضـحكت
فيـه
العلـوم
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ونراهـا
اليـوم
تبكـي
العَربَا
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حيــث
منهــم
فَقَــدَت
خيـر
أب
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وأغتـذت
مـن
يُتمهـا
فـي
شـَظَف
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يـا
عهود
العلم
ما
شئت
اندُبي
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يـا
عيون
المجد
ما
شئت
اذرفي
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هـل
أتـاك
الدهر
فيما
قد
أتى
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بحــديث
العُــرب
فـي
الأنـدلس
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حيـث
بـالعزم
أمـاطوا
العَنَتا
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وبنــور
العلــم
ليـل
الهَـوَس
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فأســألَنّ
الغــرب
عمّـا
ثَبَتـا
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فـــي
ربـــوعٍ
خَلَّفوهـــا
دُرُس
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هــل
تـرى
ثَمّـة
مـن
لـم
يُجِـب
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عــن
معــاليهم
ولــم
يعـترف
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آه
لــو
يرجــع
ماضـي
الحُقُـب
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آه
لــو
عــاد
زمــان
الشـرف
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سـل
رُبـا
بغـداد
عمـا
قد
مضى
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لبنـي
العبـاس
في
تلك
الديار
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وأسـألنّ
الشـام
عمّـا
قـد
أضا
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للمُعــاويّين
فيهـا
مـن
فَخـار
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كـم
تـرى
للمجـد
سـيفاً
مُنْتضى
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كـم
تـرى
للعلم
فيها
من
مَنار
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عجــبي
يــا
قـوم
كـلَّ
العجـب
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هــذه
الآثــارَ
لِــمْ
لا
نقتفـي
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آهِ
مـــن
رقـــدتنا
وأحَرَبــي
|
آهِ
مـن
مـن
غفلتنـا
وا
أسـفي
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يـا
أباةَ
الضَيم
من
عُليا
نِزار
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أيـن
منكـم
ذهبـت
تلك
الطباع
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كنتـمُ
كالسـيف
مشـحوذ
الغرار
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والـذي
حـلَّ
حمـاكم
لـن
يـراع
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كـم
إلى
العلم
أقمتم
من
مَنار
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بعقــول
هـي
أسـَنى
مـن
شـُعاع
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قَطفــت
أبــواعكم
عــن
كَثَــب
|
كــل
مجــد
شــاهق
المُقتطَــف
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تلــك
واللَّــه
مزايـا
العـرب
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أورثوهــا
خَلَفــاً
عــن
ســَلَف
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أنـت
يـا
شـمس
على
كرّ
السنين
|
قـد
تَقَلّبـتِ
طلوعـاً
فـي
الورى
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حـــدّثينا
بحـــديث
الأوّليــن
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فلقــد
شــاهدت
تلـك
الأعصـرا
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أفكــانوا
مثلَنــا
مختلفيــن
|
لا
يغيثـــون
إذا
خطــب
عــرا
|
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أننــا
يــا
شـمس
فـي
مُضـطَرَب
|
قــد
ألِفْنــاه
فلــم
نــأتلف
|
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أن
بقينــا
هكــذا
فــأحتجبي
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عـن
بنـي
الغبراء
أو
فانكسفي
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يـا
بنـي
يعرُب
ما
هذا
المنام
|
أو
مــا
أســفر
صــبح
النُـوَّم
|
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أيـن
من
كان
بكم
يرعى
الذِمام
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ويُلّـــبي
دعـــوة
المُهْتَضـــَم
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أفلا
يَلــــذَعكم
منـــي
الملام
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فلقــد
ألُفِـظ
جمـراً
مـن
فمـي
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خارجــاً
فــي
نَفَــسِ
كــاللهب
|
مُحرقــاً
مهجــة
قلـبي
الـدَنِفِ
|
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أنـا
لـولا
فيـض
دمعـي
السـَكِب
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لتَحرّقــــت
بنــــار
الأســـف
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يـا
شـباب
القـوم
لـولاكم
لما
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سـاغ
لـي
العذب
وما
أن
لذّ
لي
|
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أننــي
أُبصــر
منكــم
أنجُمـا
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لامعــــاتٍ
فـــي
ظلام
الأمـــل
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فأصـبروا
اليوم
على
حرّ
الظما
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كـي
تنالوا
الرِيّ
في
المستقبل
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وأتعبـوا
اليـوم
فعُقبي
التعب
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راحــــةٌ
مُشـــبَعة
بـــالتَرَف
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لتَقُونـــا
أســـوأ
المنقلَــب
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إذ
بنـاء
القـوم
هـاري
الجُرُف
|
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يـا
شـباب
القوم
هُبّوا
للبِراز
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فبِكــم
يَبســم
ثغــر
الــوطن
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وأرفُلـوا
أمـا
بثـوب
الاعتزاز
|
أو
بثــوبٍ
هــو
ثــوب
الكفـن
|
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وأعدّوا
العلم
لا
السيف
الجُراز
|
أنـــه
عُـــدّة
هــذا
الزمــن
|
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بســواه
العــزّ
لــم
يُكتســَب
|
وهـــو
المُنصـــف
للمنتَصـــِف
|
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أنـــه
واللَّــه
لا
عــن
كــذِب
|
شــرف
النفــس
ونفــس
الشـرف
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