|
أيّ
مُضــنَى
يَمُــدّها
بــالكتئاب
|
أنّـةً
تـترك
الحشـا
فـي
التهاب
|
|
يتشــكّى
والليــلَ
وحْـف
الاهـاب
|
ضــمن
بيـت
جثـا
علـى
الأعقـاب
|
|
صــفقته
فمــال
كــفّ
الخــراب
|
|
تسـمع
الأُذن
منـه
صـوتاً
حزينـاً
|
راجفـاً
فـي
حشـا
الظلام
كمينـا
|
|
يملأ
الليــل
بالــدعاء
أنينـا
|
ربّ
كـن
لـي
علـى
الحياة
معينا
|
|
ربّ
أن
الحيــاة
أصــل
عــذابي
|
|
وجــع
فــي
مفاصــلي
دقّ
عظمـي
|
ودهــاني
ولــم
يَــرِقّ
لعُــدمي
|
|
عـاقني
عـن
تكسـُّبي
قـوت
يـومي
|
ربّ
فــارحم
فقـري
بصـحة
جسـمي
|
|
أن
فقــري
أشــدّ
مــن
أوصـابي
|
|
يـا
طبيبـاً
وأيـن
منـي
الطبيب
|
حــال
دون
الطـبيب
فقـر
عصـيب
|
|
لا
أصــاب
الفقيــرَ
داءٌ
مصــيب
|
أن
ســُقم
الفقيــر
شــئ
عجيـب
|
|
بطلــت
فيــه
حكمــة
الأســباب
|
|
رجـــل
معُســِر
يســمى
بشــيرا
|
كـان
يسـعى
طـول
النهار
أجيرا
|
|
كاســباً
قُــوته
زهيـداً
يسـيرا
|
مالكـاً
فـي
المَعاش
قلباً
شكورا
|
|
راجيـاً
فـي
المَعـاد
حسُن
المآب
|
|
عـال
أختـاً
حَكَتـه
خُلْقـاً
نزيها
|
عانســاً
جـاوز
الـزواج
سـِنِيها
|
|
لزِمــت
بيــت
أمهــا
وأبيهــا
|
مـع
أخيهـا
تعيـش
عنـد
أخيهـا
|
|
مثلــه
فــي
طعــامه
والشـراب
|
|
كــلَّ
يــوم
لــه
ذهـاب
ومَـأتَي
|
فــي
معــاش
مــن
كـدّه
يتـأتّى
|
|
هكــذا
دأبــه
مَصــيفاً
ومَشـتَى
|
فــاعتراه
داء
المفاصــل
حـتى
|
|
عــاقه
عــن
تعيّــش
واكتســاب
|
|
بينمـا
كـان
فـي
قـواه
صـحيحا
|
سـاعياً
فـي
ارتزاقـه
مسـتميحا
|
|
إذ
عـراه
الضـَنَى
فعـاد
طَليحـا
|
ورمتــه
يــد
الســقام
طريحـا
|
|
جسـمه
مـن
سـقامه
فـي
اضـطراب
|
|
بـات
يبكـي
إذا
لـه
الليل
آوى
|
بعُيــون
مــن
الســهاد
نَشـاوى
|
|
فــترى
وهــو
بالبكـا
يتـداوى
|
قطــراتٍ
مــن
عينــه
تتهــاوى
|
|
كشـــهاب
يَنقــضّ
أثــر
شــهاب
|
|
أن
ســُقما
بــه
وعــدماً
ألمّـا
|
تركــاه
يــذوب
يومــاً
فيومـا
|
|
فهو
حيناً
يشكو
إلى
السقم
عُدما
|
وهو
يشكو
حيناً
إلى
العدم
سقما
|
|
باكيــاً
مـن
كليهمـا
بانتحـاب
|
|
ظـلّ
يشـكو
للأخـت
ضـَعفا
وعَجـزا
|
إذ
تُعزّيـــه
وهـــو
لا
يتعــزّى
|
|
أيهــا
الأخــت
عـزّ
صـبريَ
عـزّا
|
أنّ
للـداء
فـي
المفاصـل
وخـزا
|
|
مثـل
طعـن
القنـا
ووخز
الحراب
|
|
قـد
تمـادى
بـه
السـقام
وطالا
|
وتــراءى
لــه
الشـفاء
مُحـالا
|
|
إذ
قُلابـاً
بـه
السـقام
استحالا
|
كــان
هَيْنـاً
فصـار
داءً
عُضـالا
|
|
ناشــباً
فـي
الفـؤاد
كالنُشـّاب
|
|
ظــلّ
مُلقـىً
وأعـوزته
المطـاعم
|
مُوثَقــاً
مــن
سـقامه
بـالأداهم
|
|
مُنفِقــاً
عنـد
ذاك
بعـض
دراهـم
|
رَبِحَتهـا
مـن
غزلهـا
الأخت
فاطم
|
|
قبـل
أن
يُبتَلـى
بهـذا
المُصـاب
|
|
قـال
والأخـت
أخـبرته
بـأن
قـد
|
كَرَبــت
عنـدها
الـدراهم
تَنْفَـد
|
|
أخــبري
الســقم
علّــه
يتبعّـد
|
أيهـا
السـقم
خـلِّ
عيشي
المُنَكّد
|
|
لا
تعُقنـي
فـي
عيشـتي
عـن
طلابي
|
|
مرّضـــيني
شـــقيقتيِ
مرّضــيني
|
وعلـى
الكسـب
فـي
غـد
حَرِّضـيني
|
|
وإذا
مَســَّك
الطَــوىَ
فارفُضـيني
|
أو
علـى
الناس
للمبيع
اعرِضيني
|
|
علّهــم
يشــترونني
ممــا
بــي
|
|
رام
خـبزاً
والجوع
أذكى
الاُوارا
|
فــي
حشــاه
فعلَّلَتـه
انتظـارا
|
|
ثـم
جاءت
بالماء
تُبدي
اعتذارا
|
وهـل
المـاء
وهـو
يُطفـئ
نـارا
|
|
يطفـئ
الجـوع
ذاكياً
في
التْهاب
|
|
خرجــت
فــاطم
إلــى
جارتَيْهـا
|
ويـه
تُـذري
الدموع
من
مُقلتيها
|
|
فأبـــانت
برِقّـــة
حالتيهـــا
|
مــن
سـقام
ومـن
سـُعاد
لـديها
|
|
وشــَكَت
بعــدَ
ذا
خُلُـوّ
الوِطـاب
|
|
فــانثنَت
وهــي
بيــن
ذُلّ
وعـزّ
|
تحمـل
التمـر
فـي
يـدٍ
فوق
خبز
|
|
وبـــأخرى
ســـَمناً
وبعــض
أرُزّ
|
منحوهـا
بـه
وذو
العـرش
يَجـزى
|
|
مَـن
أعـان
الفقيـر
حسن
الثواب
|
|
ليلــةٌ
تَنْشــُر
العواصـفُ
ذُعـرا
|
فـي
دجاهـا
حيث
السحاب
اكْفَهَرّا
|
|
ذا
هَزِيـم
يَمُـجّ
فـي
الأذن
وقـرا
|
حيـن
تُبـدي
صـوالجَ
البرق
تترى
|
|
كهربائيــةٌ
ســَرَت
فـي
السـحاب
|
|
مـدّ
فيهـا
ذاك
المريـض
الأكُفّـا
|
فـي
فـراش
بـه
على
الموت
أوفى
|
|
طرفــه
كالســُها
يَـبين
ويَخْفَـى
|
حيـث
يُغضـي
طرفـاً
ويفتـح
طرفا
|
|
عـــاجزاً
عــن
تكلُّــم
وخطــاب
|
|
فـدَعَتْه
والعيـن
تُـذري
الدموعا
|
اختــه
وهـي
قلبهـا
قـد
ريعـا
|
|
يــا
أخـي
أنـت
سـاكت
أفجوعـا
|
سـاكت
أنـت
يـا
أخـي
أم
هُجَوعا
|
|
فاشـْفِني
يـا
أخـي
برَجْع
الجواب
|
|
فـــرأت
منــه
أنــه
لا
يُجيــب
|
فتــدانت
والـدمع
منهـا
صـَبيب
|
|
ثـم
أصـغت
وفـي
الفـؤاد
وَجيـب
|
ثـم
هـابت
والمـوت
شـىءٌ
مَهيـب
|
|
ثــم
قــامت
بخشــيةٍ
وارتيـاب
|
|
خرجــت
فـاطم
مـن
الـبيت
ليلا
|
حيـثِ
أرخَـى
الظلام
سـدلا
فسـدلا
|
|
وهـي
تبكـي
والغَيـث
يهطل
هطلا
|
مثـلَ
دمـع
مـن
مقلتَيْها
استَهَلا
|
|
أو
كمــاءٍ
جــرى
مـن
الميـزاب
|
|
ربّ
أدرك
بــاللطف
منـك
شـقيقي
|
وامنـع
الغيـث
ربّ
عـن
تعـويقي
|
|
ومُــرِ
الـبرق
أن
يُضـيء
طريقـي
|
بريـــقٍ
يُبــديه
أثــر
بريــق
|
|
فعســى
أهتـدي
بـه
فـي
ذهـابي
|
|
قَرعــت
فـي
الظلام
بـاب
الجـار
|
وهــي
تبكـي
الأسـى
بـدمع
جـار
|
|
ثــم
تــادت
برقّــة
وانْكســار
|
أم
ســـلمى
ألا
بحــق
الجِــوار
|
|
فـافتحي
أننـي
أنـا
فـي
الباب
|
|
فأتتهــا
ســُعدى
وقـد
عرَفتهـا
|
وعـن
الخَطْـب
فـي
الدجى
سألتها
|
|
ثـم
سـارت
مـن
بعـدما
أعلمتها
|
تقتفيهـــا
وبنتهــا
تَبِعَتهــا
|
|
فتخطَّيْــن
فـي
الـدجى
بانسـياب
|
|
جِئن
والسـحب
أقْلَعـت
عـن
حَياها
|
وكــذلك
الرعــود
قــلّ
رُغاهـا
|
|
حيـث
يـأتي
شـِبه
الأنيـن
صداها
|
غيــر
أن
الـبروق
كـان
ضـياها
|
|
مومِضـاً
فـي
السماء
بين
الرَباب
|
|
فــدخَلْن
المحــلّ
وهــو
مُخيــف
|
حيــث
انّ
الســكوت
فيـه
كـثيف
|
|
وضــياء
الســراح
نَــزْرٌ
ضـعيف
|
وبــه
فـي
الفـراش
شـخص
نَحيـف
|
|
دبّ
منــه
الحِمـام
فـي
الأعصـاب
|
|
قـالت
الأخـت
أم
سـلمى
انْظُريـه
|
ثُكلــــت
روح
أمـــه
وأبيـــه
|
|
فـرأت
منـه
إذ
دنـت
نحـو
فيـه
|
نَفَســاً
مبُطيــء
الــتردُّد
فيـه
|
|
ثـم
قـد
غـالَه
الـرَدى
باقتضاب
|
|
وجَمَـــت
حَيْــرةً
وبعــد
قليــل
|
رمَقَــت
فاطمــاً
بطــرف
كَلِيــل
|
|
فيـه
حَمْـل
علـى
العزاء
الجميل
|
فعَلا
صـــوت
فـــاطم
بالعويــل
|
|
وبكــت
طــول
ليلهـا
بانتِحـاب
|
|
فاسـتمرّت
حـتى
الصـباح
تُـوالي
|
زفــارت
بنارهــا
القلـب
صـال
|
|
فأتاهــا
ودمعهـا
فـي
انْهمـال
|
بعــض
جاراتهــا
وبعــض
رجـال
|
|
مـن
صـعاليك
أهـل
ذاك
الجَنـاب
|
|
وقفـوا
موقفـاً
بـه
الفقر
ألْقى
|
منــه
ثِقْلاً
بـه
المعيشـة
تَشـقى
|
|
فـرأوا
دمـع
فـاطم
ليـس
يرقـا
|
وأخوهـا
مَيْـت
علـى
الأرض
مُلقـى
|
|
مُــدرَجٌ
فــي
رثــائث
الثــواب
|
|
فغـــدت
فــاطم
تــرن
رنينــا
|
ببكــاءٍ
أبكـت
بـه
الواقفينـا
|
|
ثــم
قـالت
لهـم
مَقـالاً
حزينـا
|
أيهـا
الواقفـون
هـل
ترحمونـا
|
|
مــن
مُصــاب
دهــا
وأيّ
مصــاب
|
|
أيهــا
الواقفــون
لا
تُهملــوه
|
دونكــم
أدمُعـي
بهـا
فاغْسـِلوه
|
|
ثــم
الثــوب
ضــافياً
كفِّنــوه
|
وادفُنـوه
لكـن
بقلـبي
ادفنـوه
|
|
لا
تُــواروا
جــبينه
بــالتراب
|
|
بعــد
أن
ظــلّ
لافتِقـاد
المـال
|
وهْـو
مُلقـىً
إلـى
أوان
الـزوال
|
|
جــاد
شــخص
عليـه
بعـد
سـؤال
|
بريـــال
وزاد
نصـــف
ريـــال
|
|
رجـــل
حاضـــر
مــن
الأنجــاب
|
|
كفَّنـوه
مـن
بعـد
مـا
تـمّ
غسلا
|
وتمشـَّوا
بـه
إلـى
القـبر
حَملا
|
|
فــترى
نعشــه
غــداة
اسـتقلا
|
نعـش
مـن
كـان
في
الحياة
مُقِلا
|
|
دون
ســـتر
مكســـّرَ
الأجنـــاب
|
|
نـاحت
الأخـت
حيـن
سـار
وصـاحت
|
اختـك
اليـوم
لـو
قَضَت
لاستراحت
|
|
ثــم
سـارت
مدهوشـة
ثـم
طـاحت
|
ثـم
قـامت
ترنـو
لـه
ثـم
راحت
|
|
تســكبُ
الــدمع
أيَّمــا
تَسـكاب
|
|
أيهــا
الحـاملوه
لا
مشـيَ
رَكـض
|
أن
هــذا
يـوم
الفـراق
المُمِـضّ
|
|
فاسـألوه
عـن
قصـد
أيـن
يَمضـي
|
أنـه
قـد
قضـى
ولـم
يـكُ
يَقضـي
|
|
واجبـات
الصـبا
وشـرخ
الشـباب
|
|
أن
قلـبي
علـى
كريـم
السـجايا
|
طـاح
واللـه
مـن
أسـاه
شـظايا
|
|
قاتل
الله
يا
ابن
أمّي
المنايا
|
أنـا
مـن
قبلُ
مذ
حسبت
الرزايا
|
|
لـم
يكـنُ
رزء
مـوتكم
في
حسابي
|
|
أن
ليلــي
ولســت
مـن
راقـديه
|
كلمــــا
جـــاءني
وذكّرنيـــه
|
|
قلــت
والـدمع
قـائل
لـي
أيـه
|
يـا
فقيـداً
اعـاتب
المـوت
فيه
|
|
ببُكــائي
وهــل
يُفيــد
عتـابي
|
|
رُحــت
يومـاً
وقـد
مضـت
سـنتان
|
أتمشـــى
بشـــارع
الميـــدان
|
|
مَشــيَ
حيــران
خَطــوُه
مُتــدان
|
أثقَلَتـــه
الحيــاة
بــالأحزان
|
|
وســقَتْه
كأســاً
كطعــم
الصـاب
|
|
بينمــا
كنــت
هكــذا
أتمشــّى
|
عَرَضــَتْ
نظــرة
فأبصــرت
نعشـا
|
|
باديــاً
للعيــون
غيــر
مُغَشـّى
|
نقـش
الفقـر
فيـه
للحـزن
نَقْشا
|
|
فبــدا
لــوح
أبْــؤسٍ
واكـتئاب
|
|
قلـت
سـرّاً
والنعـش
يقـرُب
منّـي
|
أيّهـا
النعـش
أنـت
أنعشتَ
حزني
|
|
للأســَى
فيــك
حالــة
ناسـبتني
|
أن
بـدا
اليـوم
فيـك
حزن
فإني
|
|
أنـا
للحـزن
دائمـاً
ذو
انْتساب
|
|
رحــت
أســعَى
وراء
مــذ
تعـدّى
|
مسـرعاً
فـي
خطـايَ
لـم
آل
جهدا
|
|
مـع
رجـال
كـأنجم
النعـش
عـدا
|
هــم
بــه
ائرون
ســيراً
مُجـدّاً
|
|
فـــتراه
يمــرّ
مــرّ
الســحاب
|
|
مـذ
لحـدنا
ذاك
الـدفين
وعُدنا
|
قلــت
والـدمع
بـلَّ
منّـي
ردنـا
|
|
أن
هـذا
هـو
الـذي
قـدُ
وعِـدنا
|
فـأبينوا
مـن
الـذي
قـد
لحَدْنا
|
|
فتصــّدَى
منهــم
فــتىً
لجـوابي
|
|
قــال
أن
الــدفين
أخـت
بشـير
|
أخـت
ذاك
المسـكين
ذاك
الفقير
|
|
بَقِيَـــت
بعــده
بعيــش
عســير
|
وبطـــرف
بــاك
وقلــب
كســير
|
|
وقضـــت
مثلـــه
بــداء
القُلاب
|
|
قلــت
أقصـر
عـن
الكلام
فحَسـْبي
|
منــك
هـذا
فقـد
تزلـزل
قلـبي
|
|
ثــم
نــاجيت
والضـراعة
ثـوبي
|
ربّ
رُحمـــاك
ربّ
رحمــاك
ربــي
|
|
ربّ
رشــداً
إلـى
طريـق
الصـواب
|
|
ربّ
إن
العبـــاد
أضــعف
أن
لا
|
يجــدوا
منـك
ربّ
عفـواً
وفضـلاً
|
|
فـاعفُ
عـن
أخذهم
وأن
كان
عَدْلاً
|
أنـت
يـا
ربّ
أنـت
بالعفو
أولى
|
|
منـك
بالأخـذ
والجـزا
والعقـاب
|
|
قـد
وردنـا
والأرض
للعيـش
حَـوْض
|
واحــد
كلنــا
لنـا
فيـه
خَـوض
|
|
فلمـــاذا
بــه
مَشــُوب
ومَحْــض
|
عَظُمـــت
حكمــة
الالــه
فبَعْــض
|
|
فــي
نعيموبعضــنا
فــي
عـذاب
|
|
أيهـا
الأغنيـاء
كـم
قـد
ظَلَمْتم
|
نِعَـم
اللـه
حيـث
مـا
إن
رحِمْتم
|
|
ســهِر
البائسـون
جوعـاً
ونِمتـم
|
بهنـاءٍ
مـن
بعـد
مـا
قد
طَعِمْتم
|
|
مـــن
طعـــام
مُنَّــوع
وشــراب
|
|
كـم
بـذلتم
أموالكم
في
الملاهي
|
وركبتــم
بهــا
مُتـون
السـَفاه
|
|
وبخِلتــم
منهــا
بحــق
اللــه
|
أيهـا
المُوسـِرون
بعـض
انتبـاه
|
|
أفتــدرون
أنكــم
فــي
تَبــاب
|