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نحــن
مــن
أرضـنا
علـى
منطـاد
|
جـــائلٍ
فــي
شواســع
الأبعــاد
|
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طـائرٍ
فـي
الفضـاء
عرضـاً
وطولاً
|
بجنــاح
مــن
القـوى
غيـر
بـاد
|
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أيهــا
الأرض
ســرتِ
سـيرك
مثنـى
|
ذا
نتــاجين
فــي
زمــان
أحـاد
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فتقلبـــت
فـــي
نهــار
وليــل
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ذا
مضـــلٌ
وذاك
للنـــاس
هــاد
|
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فــي
بلاد
يكــون
ســيرك
تــأوي
|
بــاً
علــى
أنــه
سـرىً
فـي
بلاد
|
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فيــك
دفـع
وفيـك
يـا
أرض
جـذب
|
لــكِ
ذا
ســائق
وذا
لــك
حــاد
|
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فلــك
دائر
علــى
الشـمس
طـوراً
|
فـي
اقـتراب
وتـارة
فـي
ابتعاد
|
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ليـت
شـعري
ومـا
حصـلت
مـن
الآ
|
راء
إلاّ
علــــى
خلاف
الســــداد
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لبقــاءٍ
تقلنــا
الأرض
فــي
تـس
|
يارهـــا
أم
تقلنـــا
لنفـــاد
|
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نحــن
فــي
عــالم
تقصــف
فيـه
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عـــارض
النائبـــات
بالإرعــاد
|
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شـأننا
العجـز
فيـه
توجـد
أنّـى
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قــذفتنا
يــد
الخطـوب
الشـداد
|
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ضــاع
جــذر
الحياةعنـا
فخلنـا
|
أنهـــا
كالأصــمّ
فــي
الاعــداد
|
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شــغلتنا
الــدنيا
بلهـوٍ
ولعـبٍ
|
فغفلنـــا
والمــوت
بالمرصــاد
|
|
ضــلّ
مــن
رام
راحـةً
فـي
حيـاة
|
نحــن
منهــا
فــي
معــرك
وجلاد
|
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إنمـــا
هــذه
الحيــاة
جــروحٌ
|
أثخنتنـا
والمـوت
مثـل
الضـِماد
|
|
كــل
أســر
يهـون
إن
أطلقـت
أر
|
واحنـــا
الموثقــات
بالأجســاد
|
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لا
تملنـــي
إذا
جزعـــت
فــإني
|
مـا
ملكـت
الخيـار
فـي
إيجـادي
|
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طـال
عتـبي
علـى
عـدات
الليالي
|
مثلمــا
طــال
مطلهــا
بمـرادي
|
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كــدّرت
عيشــي
الحــوادثُ
حــتى
|
لا
أرى
الصـفو
غيـر
وقـت
الرقاد
|
|
صـاح
مـا
دلّ
فـي
الأمور
على
الأش
|
كــــال
إلا
تفحّــــص
الأضـــداد
|
|
فــاعتبر
بالسـفيه
تمـس
حليمـاً
|
وتعــرف
بــالغي
طــرق
الرشـاد
|
|
واللــبيب
الــذي
تعلَّــم
إتيـا
|
ن
المعــالي
مــن
خسـّة
الأوغـاد
|
|
أيهــا
الغِــرّ
لا
تغــرّك
دنيــا
|
ك
بكــــون
مصــــيره
لفســـاد
|
|
خـفّ
مـن
غـاص
في
الغرور
كما
في
|
لجّــة
المـاء
حـفّ
ثقـل
الجمـاد
|
|
يــا
خليلـيّ
والخليـل
المواسـي
|
منكمــا
مـن
يقـوم
فـي
أسـعادي
|
|
خـاب
قـوم
أتوا
وغى
العيش
عزلاً
|
مـــن
ســلاحي
تعــاون
واتحــاد
|
|
قـد
جَفتَنـا
الدنيا
فهلاّ
اعتصمنا
|
مــن
جفـاء
الـدنيا
بحبـل
وِداد
|
|
لـو
عقلنـا
لمـا
اختشى
قط
محسو
|
دون
وقـــع
الأذاة
مـــن
حســّاد
|
|
فمتــاع
الحيــاة
أحقـر
مـن
أن
|
يســـتفزّ
القلـــوب
بالأحقـــاد
|
|
أنــا
واللــه
لا
أريـد
بـأن
أو
|
قـع
شـراً
ولـو
علـى
مـن
يعـادي
|
|
أن
لــي
أن
ســمعت
أنّــة
محـزو
|
نٍ
أنينــاً
مرجّعــاً
فــي
فـؤادي
|
|
إن
نفســي
عــن
همّهـا
ذات
شـغلٍ
|
بهمــوم
العبــاد
كــلّ
العبـاد
|
|
لا
أحـــبّ
النســيم
إلا
إذا
هــب
|
ب
علــى
كــل
حاضــر
أو
بــادي
|
|
أيها
الناس
إن
ذا
العصر
عصر
ال
|
علـم
والجـد
فـي
العلا
والجهـاد
|
|
عصـر
حكـم
البخـار
والكهربـائي
|
ة
والماكنـــــات
والمنطــــاد
|
|
بُنيــت
فيــه
للعلـوم
المبـاني
|
واقيمـت
للبحـث
فيهـا
النـوادي
|
|
فـاض
فيـض
العلـوم
بـالرغم
ممّن
|
ضــــربوا
دونهـــنّ
بالأســـداد
|
|
إن
للعلــم
فـي
الممالـك
سـيراُ
|
مثـل
سـير
الضـياء
فـي
الأبعـاد
|
|
أطلـع
الغـربُ
شمسـَه
فحبـا
الشر
|
قَ
اقتباسـاً
مـن
نورهـا
الوقـاد
|
|
إن
للعلـــم
دولـــةً
خضــعت
دو
|
ن
علاهــــا
عـــوالم
الأضـــداد
|
|
مـا
اسـتفاد
الفتى
وإن
ملك
الأر
|
ض
بــأعلى
مـن
علمـه
المسـتفاد
|
|
لا
تسـابق
في
حلبة
العزّ
ذا
العل
|
م
فمــا
للهجيــن
شـأو
الجـواد
|
|
إن
أمــوات
أمــة
العلـم
أحيـا
|
ءٌ
حيــــاة
الأرواح
والأجســــاد
|
|
وكـأيّن
فـي
النـاس
مـن
ذي
خمول
|
صــار
بــالعلم
كعبــة
القُصـّاد
|
|
ربّ
يـــوم
وردت
دجلـــة
فيـــه
|
مَــورداً
خاليــاً
عــن
الــوراد
|
|
حيــث
ينصــبّ
فــي
سـكوتٍ
عميـق
|
ماؤهــا
لاثمــاً
ضــغاف
الـوادي
|
|
وهبـوب
النسـيم
يكتـب
فـي
الما
|
ء
ســطوراً
مهــتزّة
فــي
إطـراد
|
|
ينمحــي
بعضــها
ويظهــر
بعــضٌ
|
فهــي
تنســاب
بيـن
خـاف
وبـاد
|
|
وتئنّ
الميـــاه
لـــي
بخريـــر
|
كــــأنين
الســـقيم
للعُـــوّاد
|
|
قمــت
فــي
وجههــا
اردّد
طرفـي
|
ســاكتاً
والضــمير
منّـي
ينـادي
|
|
واقفــاً
تحـت
سـرحةٍ
نـاح
فيهـا
|
طــائر
فــوق
غصــنها
الميّــاد
|
|
منشـداُ
فـي
النـواح
شـعراً
غَرِيز
|
ياًحزينــــاً
كـــأنه
إنشـــادي
|
|
جـــاوبته
أفنانهـــا
بـــأنين
|
مـــن
حفيــف
الأوراق
والأعــواد
|
|
أيهـا
الطـائر
المُرَجّع
فوق
الغص
|
ن
هـــل
أنــت
نــائح
أم
شــاد
|
|
بيــن
مــاءٍ
جــارٍ
ولحــن
شـجيّ
|
منـك
يـا
طـائر
اسـتطير
فـؤادي
|
|
يــا
مياهـاً
جـرت
بدجلـة
تجتـا
|
ز
مـــروراً
بجـــانبي
بغـــداد
|
|
إن
نفســي
إلـى
الحقيقـة
عطشـى
|
أفتشـــفين
غلّـــةً
مـــن
صــاد
|
|
كنــت
تجريـن
والرُصـافة
والكـر
|
خ
خلاءٌ
مـــــن
رائح
أو
غــــاد
|
|
أيهـا
المـاء
أيـن
تجـري
ضياعاً
|
وحواليـــك
قـــاحلات
البــوادي
|
|
فمــتى
تفطــن
النفــوس
فتحيـا
|
بــك
ســقياً
مــوات
هـذي
البلاد
|
|
لـو
زرعنـا
بـك
البقـاع
حبوبـاً
|
لحصــدنا
النضـار
يـوم
الحصـاد
|
|
أنـــت
واللــه
عســجد
ولجيــن
|
لــو
أتينــا
الأمـور
باسـتعداد
|
|
فـاجرِ
يـا
مـاء
إن
جربـتَ
رويداً
|
بأنــــــاةٍ
ومهلـــــةٍ
واتئاد
|
|
علّنـا
نسـتفيق
مـن
رقـدة
الفـق
|
ر
فنَغنَـــى
بفيضـــك
المــزداد
|
|
سـلكتك
السـما
ينـابيع
فـي
الأر
|
ض
أمــــدتك
أيّمــــا
امـــداد
|
|
فتفجــرت
فــي
الســفوح
عيونـاً
|
نبعـــت
مــن
مخــازن
الأطــواد
|
|
وإذا
مــا
انتهيــت
فـي
جريـان
|
عـدت
للبـدء
فـي
متـون
الغوادي
|
|
هكـذا
دار
دائر
الكـون
مـن
حـي
|
ث
انتهـى
عـاد
راجعـاً
للمبـادي
|