|
الشــــــــــــعر
والشــــــــــــعب
|
...
|
|
لقـــــد
آن
للأقلام
يعلــــو
صــــريرها
|
وللأُســـْد
أن
يبـــدو
جهــارًا
زئيرهــا
|
|
ســلام
علــى
العهــد
القــديم
وأهلــه
|
ومــا
جــددت
بعــد
الــبزاة
صــقورها
|
|
وقفنــا
علــى
التاريــخ
وقفــة
ناقـدٍ
|
وقــد
أرشــد
العميــانَ
منــا
بصـيرها
|
|
أهبنــا
ومــا
فــي
الحــي
صــوت
بأمـةٍ
|
طوتهـــا
يـــدٌ
للمــوت
عــزَّ
نشــورها
|
|
جسســـنا
بكــف
الشــعر
نبــض
شــعورها
|
فـــذاق
بــه
كــأس
الحيــاة
شــعورها
|
|
إذا
الشـعر
لـم
يـوقظ
مـن
الشـَّعبِ
راقدًا
|
فلا
قــــذفت
درَّ
القــــوافي
بحورهـــا
|
|
ورُبَّ
قــــوافٍ
مـــن
دمـــوع
نظمتهـــا
|
فكـــانت
عقـــودًا
والأمــاني
نحورهــا
|
|
يعـــزُّ
علـــى
عينــي
البكــاء
وإنمــا
|
علــى
ذكــر
أوطــاني
يفيــض
غــديرها
|
|
علـــى
مجـــد
عــدنان
وســؤدد
هاشــم
|
وتاريــــخ
قحطـــان
يـــدرُّ
غزيرهـــا
|
|
حـــرام
علـــى
عـــرق
لنــا
دم
يعــرُب
|
يجـــول
بــه
إن
لــم
يُحــرَّر
أســيرها
|
|
ونحــن
أبــاة
الضــيم
مــن
عهـد
تُبَّـعٍ
|
إذ
النـــاس
غربـــان
ونحــن
نســورها
|
|
عتبـــتُ
علـــى
الأيـــام
وهــي
غيــاهب
|
فمــا
زلــت
حــتى
كــان
طرسـيَ
نورهـا
|
|
بكـــت
قلمـــي
الأقلام
منـــذ
كســـرته
|
ليهنــــك
يـــا
أقلام
صـــح
كســـيرها
|
|
ومـــا
أكـــثر
الأشــعار
وهــي
كتــائب
|
ولكــــن
شـــعري
بـــالأمير
أميرهـــا
|
|
هــو
الملــك
المقصــود
بالنصـر
تـاجه
|
كمـــا
كللــت
هــامَ
الريــاض
زهورهــا
|
|
المنايــــــــــــا
والمنـــــــــــى
|
...
|
|
ســـلام
علـــى
ذكـــرى
لأبطــال
يَعــرُب
|
وقــد
صــافحت
أيــدي
الكمـاة
ذكورُهـا
|
|
ســـلام
علــى
الأقيــال
مــن
آل
هاشــم
|
ولــولا
قنــاهم
مــا
اسـتقامت
أمورهـا
|
|
أقــاموا
علــى
حــد
الحســام
بناءهـا
|
وقــد
أُسِّســت
فــوق
اليــراع
قصــورها
|
|
لا
خيـــــر
للأقلام
فيمـــــا
تخطـــــه
|
إذا
لـــم
تُعـــزَّز
بالســيوف
ســطورها
|
|
لئن
كـــان
بالأشـــعار
تُجلـــى
حقــائق
|
فـــرُبَّ
حقـــوقٍ
بالمواضـــي
ســفورها
|
|
عبرنـا
علـى
ظهـر
المنايـا
إلـى
المنـى
|
ورُبَّ
أمــــاني
المنايــــا
جســـورها
|
|
لعمـــر
الـــوغى
لــولا
مضــارب
فيصــل
|
لمــا
ضــربت
فــوق
الســماكَيْن
دورهــا
|
|
الهواشــــم
مــــن
عهــــد
هاشــــم
:
|
|
بنــي
يَعـرُب
يـا
خيـر
مـن
وطِـئ
الـثرى
|
ويحمــي
الثريــا
لــو
شـكت
ويجيرهـا
|
|
عليكــــم
حقــــوق
للهواشــــم
جمـــة
|
ينـــوء
برضــوى
لــو
علاه
يســيرها
|
|
ســلام
علــى
التاريــخ
مـن
عهـد
هاشـم
|
وعهـــد
بنيـــه
يــوم
قــام
نــذيرها
|
|
لقــد
علــم
الــبيت
الحــرام
وأهلــه
|
ومــا
ضــمَّت
البطحــاء
حــتى
صــخورها
|
|
غـــداة
أعـــزُّ
القــوم
نــافَر
هاشــمًا
|
فبـــاء
بــذلٍّ
رغــم
أنــفٍ
نفورهــا
|
|
ورُبَّ
جفـــــان
كــــالجوابي
أباحهــــا
|
لصــــادٍ
وغـــادٍ
راســـيات
قـــدورها
|
|
قـرى
الضـيف
حـتى
أشـبع
الوحش
في
الفلا
|
وضــافته
حــتى
فــي
الســماء
طيورهـا
|
|
شــمائل
أحيــا
عهــدها
اليــوم
فيصــل
|
كـــذلك
يُحيـــي
المكرمـــاتِ
كبيرهــا
|
|
الانقلاب
العربـي
بمبعـث
النـبي
الهاشـمي
|
...
|
|
ســـلامٌ
علــى
عهــد
الرِّســالة
والتُّقــى
|
وقــد
جــاء
بالـدين
المبِيـن
بشـيرُها
|
|
رأى
القـــوم
فوضـــى
والضــلال
مخيمًــا
|
ومـــا
العيـــش
إلا
ناقـــة
وبعيرهــا
|
|
ويأكـــل
بعــض
القــوم
بعضــًا
غوايــةً
|
ويعبـــث
بالعــاني
الضــعيفِ
قــديرها
|
|
وتُعبــــد
أوثــــان
وتُهتـــك
حرمـــة
|
وتَقضــي
علــى
فضــل
العقــول
خمورهـا
|
|
وقـــد
خلـــع
الإنســانُ
ثــوبَ
بهــائه
|
وقـــد
عمَّــت
الأكــوانَ
منــه
شــرورها
|
|
وفــي
الغـرب
أقـوام
جفـت
سـنة
الهـدى
|
وفــي
الشــرق
أقيــال
جفاهـا
غرورهـا
|
|
فجــاء
بنــاموس
الســماء
ابــن
هاشــم
|
يُطهِّـــر
أرضـــًا
قــد
علاهــا
فجورهــا
|
|
حكـــى
صــوت
موســى
والنــبيين
قبلــه
|
وعيســى
ومــن
يُعــزَى
إليــه
زبورهــا
|
|
تلا
الصـــحف
الأولـــى
وجـــاء
متممًــا
|
بقرآنــــه
مـــا
أعـــوزته
عصـــورها
|
|
لكــــل
زمــــانٍ
أو
مكـــانٍ
طبـــائع
|
يضـــيء
بمشـــكاة
الشـــرائع
نورهــا
|
|
ومـــا
الــدين
إلا
واحــد
قــد
تعــددت
|
شـــرائِعُه
حـــتى
اســـتقام
أخيرهـــا
|
|
أبـــت
حكمـــة
التشـــريع
إلا
تطـــوُّرًا
|
يُناســـبه
مـــن
كـــل
مصــرٍ
مصــيرها
|
|
لكـــلٍّ
جعلنـــا
شـــرعةً
خيــرُ
شــاهد
|
علـــى
أنَّ
مقيـــاس
الشــعوب
دهورهــا
|
|
فـــأيُّ
نظـــامٍ
لـــم
تُحـــوِّره
أمـــة
|
إذا
اختلفــت
حســب
الزمــان
أمورهــا
|
|
شــــرائع
كــــانت
للأنــــام
أَهِلَّـــة
|
وقـــد
كملـــت
بالهاشـــمي
بُـــدُورها
|
|
فجـــاء
بهـــا
ســمحاء
خيــر
شــريعة
|
علــى
عــوج
فــي
الكـون
ليـس
يضـيرها
|
|
كمــا
ضــم
شــمل
العــرب
فيصـل
سـبطه
|
فســَرَّ
العلــى
بعــد
الخفــاء
ظهورهـا
|
|
همـــام
لقـــد
قــرَّت
بــه
عيــن
جــده
|
وقـــد
حمــدت
فيــه
الفــروعَ
جــذورها
|
|
نحـــــــن
وكســـــــرى
وقيصــــــر
|
...
|
|
بــدا
النــور
مــن
بطحـاء
مكـة
سـاطعًا
|
وضــاءت
بــه
مــن
أرض
يــثرب
دُورُهــا
|
|
فمــــزَّق
إيوانًـــا
لكســـرى
مشـــيَّدًا
|
وأخمـــد
نيرانًـــا
شـــديدًا
زفيرهــا
|
|
وأجفـــل
منـــه
قيصـــر
فـــوق
عرشــه
|
وذلـــت
لـــه
بصــرى
ودُكــت
قصــورها
|
|
ثأرنــا
بســيف
الحــق
مــن
كـل
باطـل
|
وذل
لنـــا
جـــل
الـــورى
وحقيرهـــا
|
|
فقولــوا
لكســرى
يــوم
أصــغر
شـأننا
|
أأبصــــرت
أي
الأمــــتين
صــــغيرها؟
|
|
رأيـــت
ســيوف
العُــرْب
كيــف
تحكمــت
|
وصـــال
علـــى
فيــلٍ
ركبــتَ
بعيرُهــا
|
|
إلــى
أيــن
رَبَّ
التــاج
هـل
أنـت
هـارب
|
رويــدك
هــذي
العــرب
كنــت
تجيرهــا
|
|
إلــى
أيــن
رَبَّ
العـرش
هـل
أنـت
هـارب
|
وراك
حريـــم
لـــم
تصـــنها
خــدورها
|
|
حصـــونك
لــم
تمنعــك
مــن
آل
يَعــرُب
|
وملـــء
قصـــور
قــد
ســكنت
قصــورها
|
|
غــرورك
قــد
أشــقاك
لـو
كنـت
عالمًـا
|
وقبلــك
كــم
أشــقى
ملوكًــا
غرورهــا
|
|
ألــم
تــك
يـا
إيـوانُ
بـالعُرْب
هـازئًا؟
|
فهــا
أنــت
والتيجــان
معْــكَ
أسـيرها
|
|
وقبلــــك
دوَّخنــــا
هرقـــل
وتـــاجه
|
فــــذلت
بنـــو
عيـــص
وذل
نصـــيرها
|
|
يحـــنُّ
حنيـــن
الســـقب
فـــارق
أمــه
|
وقــــد
لفظتـــه
كـــل
أرضٍ
ودورهـــا
|
|
رفعنــا
علــى
ملــك
العراقَيْــن
رايــة
|
وفــي
الشــام
أخــرى
لا
يضـام
خفيرهـا
|
|
وجفَّـــت
بحــار
الرمــل
تحــت
خيولنــا
|
ودُك
لنــا
مــن
ســهل
ســيناء
طورهـا
|
|
إذ
ارتعــــدتْ
منـــا
فـــرائص
قيصـــر
|
وحــــل
بكســـرى
ويلهـــا
وثبورهـــا
|
|
وهـــم
جــبروت
الشــرق
أطــواد
عــزه
|
وفــي
طــوعهم
ســهل
الــثرى
ووعورهـا
|
|
فلــم
تُغــنِ
عنهــم
مانعــات
حصــونهم
|
مــن
العــرب
شــيئًا
يـوم
شـبَّ
سـعيرها
|
|
يــــذكرنا
مجــــدًا
نســـيناه
فيصـــل
|
فللــــه
رغـــم
المنســـيات
ذكورهـــا
|
|
نحـــــــن
الشـــــــرق
والغـــــــرب
|
...
|
|
عبرنــــا
لأفريقــــاء
وهـــي
منيعـــة
|
يعـــزُّ
علـــى
قــومٍ
ســوانا
عبورُهــا
|
|
فيــا
خجلــة
الأهــرام!
أيـن
حماتهـا؟
|
ويــا
ذلـة
الأقـوام!
هـل
مـن
يُجيرهـا؟
|
|
ومــا
مصــر
إلا
دميــة
القصــر
إن
بـدت
|
فلا
كـــان
ولـــدان
الجنــان
وحورهــا
|
|
وراعـــت
طرابلســـًا
بـــروقُ
ســيوفنا
|
وبرقـــة
حـــتى
مـــا
يهــر
هريرهــا
|
|
وتـــونس
لـــم
تقـــوَ
لهيبـــة
عزنــا
|
فغـــارت
مجاريهـــا
وذابــت
صــخورها
|
|
وطـــوَّق
أكنـــافَ
الجـــزائر
جيشـــنا
|
فمـــا
ذمَّ
أطـــراف
الشــفار
جزورهــا
|
|
وفــي
المغــرب
الأقصـى
تعـالت
رِمَاحُنـا
|
فكـــادَ
يطـــول
الشـــامخات
قصــيرها
|
|
وأنــــدلس
اهـــتزت
لهَيبـــة
طـــارق
|
وخَــــرَّ
صـــريعًا
روذريـــق
أميرهـــا
|
|
وقــد
هــزأت
بــابن
الســماء
خيولنــا
|
فَمَــا
صــان
أرض
الصــين
منهـن
سـورها
|
|
ومــا
بيـن
بنجـاب،
رعـى
اللـه
خيلنـا
|
وبيــــن
لـــوار
وردهـــا
وصـــدورها
|
|
نُشــــرِّق
طـــورًا
فـــي
البلاد
وتـــارة
|
نُغــــرِّب
لا
تحمــــي
البلادَ
ثغورهـــا
|
|
تخــر
لنــا
الأبطــال
فـي
الحـرب
سـُجَّدًا
|
ويركـــع
بالأقيـــال
رعبًـــا
ســريرها
|
|
فـــذَلَّت
لنـــا
الأَملاك
وهْـــي
عزيـــزة
|
ودانـــت
لنـــا
الأفلاك
حــتى
أثيرهــا
|
|
فهـــل
عجــب
أن
غــار
للعــرب
فيصــل
|
وأفضــــل
أبطـــال
الأنـــام
غيورهـــا
|
|
نحن
والعدل
و
الإحسان
والحضارة
والعمران
|
...
|
|
وكــــل
بلادٍ
قــــد
وطئنـــا
صـــعيدَها
|
غـــدونَ
رياضـــًا
زاهيـــاتٍ
زهورُهـــا
|
|
وأنبتـــن
إحســـانًا
وعـــدلًا
وحكمـــة
|
وعِلمًـــا
وفضـــلًا
زاخـــرات
بحورهـــا
|
|
فقرطبــةٌ
فــي
الغــرب
تزهــو
نجومهـا
|
وفــي
الشــرق
بغــداد
تضــيء
بُـدُورها
|
|
بنــو
عبــد
شــمسٍ
تقتفــي
إثــر
هاشـم
|
فعـــــمَّ
بلادَ
المشــــرقين
حبورهــــا
|
|
وهبَّــــت
لســــيف
الفـــاتحين
بقيـــة
|
تعيـــب
لـــدنيا
حكمـــة
تســـتعيرها
|
|
فيومًـــا
إلــى
غرناطــةٍ
شــَدَّ
رحلهــا
|
ويومًـــا
إلـــى
دار
الســلام
مســيرها
|
|
خلقنـــا
بســيف
العــدل
شــمس
حضــارة
|
يُشعشــع
حــتى
الآن
فــي
الكـون
نورهـا
|
|
ســلوا
أُممًــا
سـارت
علـى
ضـوء
رشـدنا
|
ألـــم
تـــكُ
قبلًا
مُظلمـــاتٍ
عصــورها؟
|
|
لئن
كــان
قصــر
الخلــد
ليــس
بخالـد
|
فمــا
أفنــت
الحمــراء
بعــد
دهورهـا
|
|
ورُبَّ
عُصــــــور
ســــــُميت
ذهبيـــــةً
|
وقــد
كــان
لولانــا
عزيــزًا
نظيرهــا
|
|
وإنَّ
رجـــــائي
أن
تعــــود
ﺑ
فيصــــل
|
وتبســـم
عــن
عهــد
الرشــيد
ثغورهــا
|
|
رحمــــــــــــــاك
ربــــــــــــــي
|
...
|
|
جهابــذة
التــاريخ،
هــل
مــن
مُخــبر
|
عـن
العُـرْب
يومًـا
أيـن
شـالت
نسـورها؟
|
|
ومـــاذا
دهــى
قــومي
فبَــدَّدَ
شــملهم
|
كـأن
لـم
يكـن
مـأوى
العـروش
سـديرها؟
|
|
وكيــف
هــوى
مــن
أُمَّــتي
نجـم
سـعدها؟
|
وكيـــف
ذوى
بيــن
الريــاض
نضــيرها؟
|
|
أمـــا
آن
أن
تحيـــا
معــالم
مجــدنا
|
وتنشـــر
موتانـــا
وينفـــخ
صــورها؟
|
|
إليــك
إلهــي
المشــتكى
مــن
ذنوبنـا
|
ورحمـــاك
ربــي
أنــت
أنــت
غفورهــا
|
|
تـــدارك
بقايـــا
أُمَّـــةٍ
قــام
فيصــل
|
عُبَيـــدك
يبغـــي
هـــديها
ويُجيرهـــا
|
|
فخـــذ
بيـــديه
إنَّـــه
ابـــن
محمــد
|
نبيــك
مَــن
لــولاه
مــا
ضــاء
نورهــا
|
|
همــــــــــــــــــــــــــا
الثقلان
|
...
|
|
غفونـــا
عـــن
الأيــام
ملــء
جفوننــا
|
فلــم
ننتبــهْ
حــتى
اسـتطارت
شـرورُها
|
|
ضـــللنا
فلـــم
نحفــظ
وصــاة
محمــد
|
وقـــد
عطَّــر
الأَســْمَاع
منــا
عبيرهــا
|
|
همــــــا
الثقلان
آلـــــه
وكتـــــابه
|
بـــــدونهما
لا
تســــتقيم
أمورهــــا
|
|
أضـــعناهما
حـــتى
أضـــعنا
نفوســـنا
|
وحلــت
مكــان
اللــب
فينــا
قشــورها
|
|
فيـــا
أُمَّـــة
خـــانت
عهـــود
نبيهــا
|
فكـــان
كمــا
شــاء
العــدو
مصــيرها
|
|
ألــم
يكــف
مــا
عـانى
الكتـاب
وأهلـه
|
وكيــف
بنــا
لـو
لـم
يُغثهـا
غيورهـا؟
|
|
ربيـــب
الهُـــدى
رب
الفضـــائل
فيصــل
|
عميــم
النــدى
فــذ
المزايــا
كثيرهـا
|
|
جلالـــة
الملـــك
والتاريـــخ
وقــومه
|
...
|
|
هــو
الملـك
المنجـي
مـن
الهلـك
قـومه
|
وقـــد
زخـــرت
بالحادثـــات
بحورهــا
|
|
ورُبَّ
حقــــوقٍ
صــــان
هيكـــل
مجـــدها
|
ومــا
غيــره
يــوم
الحفــاظ
ظهيرهــا
|
|
ومــــا
هــــي
إلا
غيــــرة
هاشــــمية
|
تُجيــر
برغــم
الــدهر
مــن
يسـتجيرها
|
|
رأى
أُمَّـــة
قـــد
مــرَّ
بالــذل
حلوهــا
|
وكــان
بهــا
يحلــو
قــديمًا
مريرهــا
|
|
رأى
ضـــجة
التاريـــخ
يشـــكو
لرَبِّــه
|
جفـــاء
قـــرون
نــام
عنــه
شــعورها
|
|
لـــدى
هيكــل
لا
ينــدب
المجــد
غيــره
|
وشـــقَّ
لـــه
جيــب
القلــوب
صــبورها
|
|
فعــزَّ
علــى
ابــن
الـوحي
أن
لا
يُجيبـه
|
فتحمـــد
آصـــال
الزمـــان
بكورهـــا
|
|
فجــدد
عهــدًا
كــان
فــي
المجــد
آيـة
|
بمحلــول
نــور
الخلــد
خطـت
سـطورها
|
|
مـــآثر
كـــان
اللــه
بــانيَ
مجــدها
|
بـــأرضٍ
هُــدى
جبريــل
كــان
يزورهــا
|
|
فيــا
ابــن
رســول
اللـه
شـكرًا
لعزمـة
|
يَســـُر
رســولَ
اللــه
يومًــا
مصــيرها
|
|
أعـــرت
بهــا
التاريــخ
نظــرة
باســل
|
حقيقًـا
بـأن
يحمـي
الحمـى
مـن
يعيرهـا
|
|
حفظــت
بقايــا
قومــك
العُــرْب
بـالظبى
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فللــــه
أبطــــال
ســـيوفك
ســـورها
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وأحييــت
حــق
الضــاد
مــن
بعـد
مـوته
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فســـَرَّ
حمــاة
الضــاد
منــك
نشــورها
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فضـــائل
هــز
الشــرقَ
والغــربَ
ســرُّها
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وخَـــــصَّ
بلادَ
الرافــــدين
ســــرورها
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بكــت
عيننــا
حينًــا
وقــرَّت
ﺑ
فيصــل
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ومــا
مثـل
بـاكي
العيـن
يومًـا
قريرهـا
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جلالـــــــة
الملــــــك
والعــــــراق
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...
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تربـــعْ
علـــى
عـــرش
العــراق
مُهَنِّئًا
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ومـــا
فـــاز
باللـــذات
إلا
جســورُها
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وشـــيِّدْ
قصــورًا
شــامخاتٍ
مــن
العُلــى
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جماجمنــــا
إمَّـــا
تشـــاء
صـــخورها
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ملكــت
قلــوبَ
الشــَّعب
يـا
ملـك
الهـدى
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وقـــد
مُلئت
منــك
انشــراحًا
صــدورها
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لــك
العهــد
مِنَّــا
والوفــاء
شــعارنا
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وشـــاهدنا
يـــوم
الحفـــاظ
ذكورهــا
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بأنـــك
لــو
نبغــي
نــذورًا
لمجــدنا
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فأرواحنـــا
مثــل
الضــحايا
نــذورها
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حلا
لـــك
الآجـــال
فــي
حومــة
الــوغى
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حلال
لـــك
الأمـــوال
حـــتى
نقيرهـــا
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سنســـعى
إلـــى
عـــزٍّ
نُصــيب
كئوســه
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ولــو
أنَّ
أيــدي
المـوت
كـانت
تـديرها
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ولــو
زحــلٌ
مــن
دوننــا
كــانَ
حَـائِلًا
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أشـــار
لــه
بالســيف
مِنَّــا
مُشــيرها
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نصـــبنا
لــه
الأرصــاد
وهــي
مــدارس
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يشــق
الفضــا
بــالفن
يومًــا
خبيرهـا
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إذا
أبحـــرت
بــالعلم
والعــدل
أمــة
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يكــون
إلــى
الشـعرى
العبـور
عبيرهـا
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تصــــافح
ســــكان
الســـماء
تطـــوُّلًا
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ويفضـــل
أهـــل
الأرض
طـــرًّا
أميرهــا
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كــأني
بأرجــاء
العــراق
وقــد
شــدت
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علـــى
أَثَلات
العـــدل
شــدوًا
طيورهــا
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كـــأني
بأرجــاء
العــراق
وقــد
غــدت
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حــــدائق
لكـــنَّ
العلـــوم
زهورهـــا
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كــأني
بأرجــاء
العــراق
وقــد
غــدت
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ســــماء
ولكـــنَّ
الفنـــون
بـــدورها
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كــأني
بمــاء
الرافــدَيْن
علــى
الـثرى
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يســـيل
لجينًـــا
والنضـــار
بــذورها
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كـــأنيَ
بالحـــدباء
مــذ
بــك
شــُرِّفت
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قـــد
اعتــدلت
قــدًّا
ودُقَّــت
خصــورها
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فــــأهلًا
بمـــن
رب
الســـماء
لجـــده
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لقـــد
قـــال
أهلًا
يــوم
راح
يزورهــا
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جلالــــة
مولانــــا
المعظـــم
فيصـــل
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ليحــــيَ
كمـــا
تحيـــا
بلاد
يجيرهـــا
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