|
طرقـت
تبـث
المـوت
طارقـة
الزمن
|
ورمـت
فـؤاد
الـدين
أسياف
المحن
|
|
ان
قلـت
قلـت
جثت
ومن
عرش
العلا
|
ركنـا
رمـت
لا
قلـت
مال
أو
ارجحن
|
|
هلا
تقــــوم
ليعـــرب
اعلامهـــا
|
مــن
بعــده
كلا
وان
قــامت
بمـن
|
|
تعــس
الالــى
قـد
سـاجلته
وانـه
|
زهـر
الريـاض
وتلـك
خضراء
الدمن
|
|
مـا
قسـت
فيـه
سواه
علما
أو
تقى
|
كلا
أمــن
هــو
قــانت
ليلا
كمــن
|
|
حلــت
مواهبــك
العظــام
لوافـد
|
ان
لا
تشـيب
بهـا
وحاشـاك
المنـن
|
|
وســننت
للكـرب
القواطـع
قاطعـاً
|
والعضـب
ليـس
بقـاطع
ان
لـم
يسن
|
|
فأسـن
فـي
الايمـان
كنت
من
الظبا
|
وألـذ
فـي
الاجفـان
من
طيب
الوسن
|
|
نـوح
الثواكـل
عـاد
نـوحي
بعـده
|
لا
الـورق
ان
طفقـت
تنوح
على
قنن
|
|
القلـب
اثـرك
قـد
نـوى
ظعنا
فهل
|
أرجـو
الحيـاة
وان
قلـبي
قد
ظعن
|
|
انــي
بروحــي
افتـديك
ولـو
أرى
|
بالجسـم
تفـدى
كنـت
افديك
البدن
|
|
انـي
لاوطنـك
الحشـا
لـو
لـم
تكن
|
نـار
الشـجا
فيهـا
يؤججها
الشجن
|
|
ومناقبــا
أبــدي
لجهـدي
بـاذلا
|
فيقـل
مـا
أبـدي
ويكـثر
مـا
بطن
|
|
يـا
دوحـة
المجـد
التي
غرست
على
|
هضـب
المفاخر
وهي
في
أعلى
القنن
|
|
أفنانهــا
عـادت
بنيـه
ومـا
ذوى
|
دوح
وأصــبح
مورقـا
منـه
الفنـن
|
|
للّــه
أفنانــا
قضــت
ثمراتهــا
|
أن
لا
يحيــط
بعــدّها
علــى
وظـن
|
|
فهــم
محمــد
الرضـا
المهـدي
اب
|
راهيـم
احمـدها
محمـد
ذو
الفطـن
|
|
بزغـت
شـموس
ضـحى
تنيـروان
تنشأ
|
قل
هم
بدور
دجى
اذا
ما
الليل
جن
|
|
للّــه
مـن
جلـى
دهتكـم
كيـف
لـي
|
ان
قلـت
صـبرا
يا
اباة
الضيم
عن
|
|
وأرى
الـورى
منهـا
بـأعظم
حيـرة
|
وكأنمـا
فقـدوا
الفـرائض
والسنن
|
|
يـا
مدلـج
الانضـاء
وخـدا
عج
الى
|
حـيّ
الكـرام
ونـاد
فيـه
مـن
ظعن
|
|
ارخ
الا
فقــد
الكتـاب
ولـم
يعـد
|
ابــدا
لفقـد
أبـي
محمـد
الحسـن
|