|
يـــا
عليـــا
بــه
تبــاهى
العلاء
|
وتنـــاهى
فـــي
نعتـــه
الاطــراء
|
|
مــا
لمجــد
شــأوت
فيــه
انتهـاء
|
غايــة
المــدح
فــي
علاك
ابتــداء
|
|
ليــت
شــعري
مــا
تصـنع
الشـعراء
|
|
كنـــت
للمجتـــبي
بحـــرب
وســلم
|
وزراً
قائمـــــا
بكـــــل
مهــــم
|
|
انـــت
صـــنو
لــه
بعلــم
وحكــم
|
يـا
أخـا
المصـطفى
وخيـر
ابـن
عـم
|
|
وأميـــــر
ان
عــــدت
الامــــراء
|
|
رتــــب
نلتهــــا
بنســـبة
طـــه
|
قصـــرت
كــل
رتبــة
عــن
مــداها
|
|
ان
نظرنــا
الأنــام
مــن
مبتـداها
|
مــا
نــرى
مـا
اسـتطال
إلا
تنـاهى
|
|
ومعاليـــك
مـــا
لهـــنّ
انتهــاء
|
|
لــدراريك
فــي
ســما
المجـد
ضـوء
|
وبحضــــن
الأدوار
منهــــن
خبـــء
|
|
يقتفــي
الختــم
مـن
سـواريك
بـدء
|
فلــــك
دائر
اذا
غــــاب
جــــزء
|
|
مـــن
نـــواحيه
اشـــرقت
اجــزاء
|
|
أو
كشــمس
يغشــى
ســناها
البهـاء
|
مـــن
غبـــار
تـــثيره
الهيجــاء
|
|
فيميــط
البهــاء
عنهــا
الهــواء
|
أو
كبـــدر
مـــا
يعــتريه
خفــاء
|
|
مــــن
غمــــام
إلا
عـــراه
إنجلاء
|
|
أنـــت
بحـــر
لكنــه
غيــر
آجــن
|
لقريــــش
بـــه
حمـــى
ومســـاكن
|
|
لـــك
مــدّ
قبــل
التكــوّن
كــائن
|
يحــذر
البحــر
صـولة
الجـزر
لكـن
|
|
غـــارة
المـــد
غـــارة
شـــعواء
|
|
نلــت
فضــلا
أبــا
تــراب
فأقصــى
|
كـــل
فضــل
عــم
الوجــود
وخصــا
|
|
وبيــــوم
الحســــاب
لا
يستقصـــى
|
ربمــا
رمــل
عالــج
يــوم
يحصــى
|
|
لـــم
يــق
فــي
رمــاله
الاحصــاء
|
|
ولــــو
أن
الأقلام
كــــل
نبــــات
|
وميــــاه
البحــــار
حـــبر
دواة
|
|
ضــقت
عمــا
أظهــرت
مــن
خارقـات
|
وتضـــيق
الأرقـــام
عــن
معجــزات
|
|
لــك
يــا
مــن
اليــه
ردت
ذكــاء
|
|
منهجـــا
للهـــدى
خلقــت
قــديما
|
جئت
تهــدي
عميــا
وتشــفي
سـقيما
|
|
فاتخــــذناك
هاديــــا
وحكيمـــا
|
يــا
سـراطا
الـى
الهـدى
مسـتقيما
|
|
وبـــه
جـــاء
للصـــدور
الشــقاء
|
|
شـدت
فـي
ذي
الفقـار
للـدين
أصـلا
|
فتســــامى
قــــدراً
وعــــن
وجلا
|
|
وعلـــى
مـــا
أسســت
قــولا
وفعلا
|
بنـــي
الــدين
فاســتقام
ولــولا
|
|
ضـرب
مـا
ضـيك
مـا
اسـتقام
البناء
|
|
أنـــت
والحـــق
دمتمـــا
بوفــاق
|
أنـت
يـوم
اللقـا
علـى
الحـوض
ساق
|
|
أنـــت
ذاك
الكــرار
يــوم
ســياق
|
أنـــت
للحـــق
ســلم
مــا
لــراق
|
|
يتـــــأتى
بغيــــره
الارتقــــاء
|
|
فيــك
خيــر
الأنــام
اوتــي
سـؤلا
|
مثــل
مـا
أوتـي
ابـن
عمـران
قبلا
|
|
يــا
أيــا
شــبر
وقــد
صــح
نقلا
|
انــــت
هـــارون
والكليـــم
محلا
|
|
مـــن
نــبي
ســمت
بــه
الأنبيــاء
|
|
قــل
تعــالو
تـدعيما
بمحكـم
ذكـر
|
لـــك
فخـــر
بهــا
علا
كــل
فخــر
|
|
أنــا
أدري
وجملــة
الخلــق
تـدري
|
أنــت
ثــاني
ذوي
الكســا
ولعمـري
|
|
أشــرف
الخلــق
مـن
حـواه
الكسـاء
|
|
كنتــف
ي
جيـب
الغيـب
معنـى
يصـان
|
حيـــــن
لا
أعصــــر
ولا
أحيــــان
|
|
أيقـــلّ
الاســـرار
منـــك
مكـــان
|
ولقـــد
كنـــت
والســـماء
دخــان
|
|
مـــا
بهـــا
فرقـــد
ولا
جـــوزاء
|
|
بــك
ليــل
العمــاء
ضــاء
بلا
لـي
|
فاستضـاء
الوجـود
مـن
ظلمـة
الغـي
|
|
درّة
كنــــت
والجــــواهر
لاشــــي
|
فــي
دجــى
بحـر
قـدرة
بيـن
بـردي
|
|
صـــدف
فيـــه
للوجـــود
الضــياء
|
|
نقطـــة
أفرغـــت
وليـــس
وعـــاء
|
ملئت
حكمـــــــــــــــة
ولا
إملاء
|
|
تحــت
بــاء
لهــا
القبــاء
غطـاء
|
لا
الخلا
يـــــوم
ذاك
فيهــــا
خلاء
|
|
فيســــــــــــــمى
ولا
الملاء
ملاء
|
|
خـــبر
جاءنـــا
يـــاذا
مـــأثور
|
وحـــــديث
مسلســـــل
مشـــــهور
|
|
عنعنتـــه
عـــن
الصـــدور
صــدور
|
قـــال
زوراً
مــن
قــال
ذلــك
زور
|
|
وافــترى
مــن
يقــول
ذاك
افـتراء
|
|
قصــب
الســبق
فــي
مقــام
كريــم
|
حزتهــا
مــن
لــدن
حكيــم
عليــم
|
|
أنــت
يــا
مــن
سـبقت
فـي
تقـديم
|
آيــة
فــي
القــديم
صــنع
قــديم
|
|
قـــاهر
قــادر
علــى
مــا
يشــاء
|
|
هــل
أتــى
فــي
سـواك
ذكـر
حكيـم
|
لـــك
فـــي
نـــص
آيـــة
تعظيــم
|
|
أو
لــم
يغـن
مـن
لـه
الجهـل
خيـم
|
نبـــأ
والعظيـــم
قـــال
عظيـــم
|
|
ويــل
قــوم
لــم
يغنهــا
الأنبـاء
|
|
خصــك
اللــه
مــن
لــدنه
بمفخــر
|
فـــي
مرايــا
العقــول
لا
يتصــور
|
|
كنــت
فــي
غايــة
الهويــة
حيـدر
|
لـم
تكـن
فـي
العموم
من
عالم
الذر
|
|
وينهـــى
عـــن
العمــوم
النهــاء
|
|
إنمــا
النــاس
ان
نظــرت
معــادن
|
فرقهـــا
فـــي
تفاضـــل
متبـــان
|
|
خلنـــي
مـــن
دفـــائن
وضـــغائن
|
معــدن
النــاس
كلهــا
الأرض
لكــن
|
|
أنـــت
مــن
جــوهر
وهــم
حصــباء
|
|
كـم
قضـينا
مـن
نشـر
تلـك
المطاوي
|
عجبــا
يوقــع
النهــى
فـي
مهـاوي
|
|
ولقــد
صــح
اذ
ســبرنا
الفحــاوي
|
شــبه
الشــكل
ليــس
يقضـي
تسـاوي
|
|
إنمـــا
فــي
الحقــايق
الاســتواء
|
|
لــم
ينــل
نجـم
الأرض
مهمـا
تزيـا
|
مثــل
نجــم
الســما
مكانـا
عليـا
|
|
فاتحــاد
الألفــاظ
لــم
يغـن
شـيا
|
لا
تفيــد
الــثرى
حــروف
الثريــا
|
|
رفعـــــة
أو
يعمــــه
اســــتعلاء
|
|
روضــــة
أنــــت
للعقــــول
ودوح
|
يجتنــي
مــن
طوبــاك
وشــد
ونصـح
|
|
ومـــتى
هـــب
مــن
عــبيرك
نفــح
|
شـــمل
الـــروح
مــن
نســيمك
روح
|
|
حســين
مــن
ربــه
اتــاه
النـداء
|
|
طالمــــــا
للأملاك
كنـــــت
دليلا
|
ولنـــا
موســـهم
هـــديت
ســبيلا
|
|
يــوم
نــادى
رب
الســما
جـبرئيلا
|
قـــائلا
مـــن
أنــا
فــروى
قليلا
|
|
وهـــو
لـــولاك
فـــاته
الاهتــداء
|
|
لـــك
شـــكل
نتيجـــة
للقضـــايا
|
لـــك
قلـــب
للعـــالمين
مرايــا
|
|
لكــف
عــل
حــوى
رفيــع
المزايـا
|
لـــك
غســـم
رآه
خيــر
البرايــا
|
|
مــــذ
تـــدلى
وضـــمه
الاســـراء
|
|
فوعـــاه
بـــالحس
حـــدا
ورســما
|
حيــث
ســاوى
معنــاه
منــك
مسـمى
|
|
قبــل
عــرض
الأسـماء
إسـما
فاسـما
|
خــط
مـع
إسـمه
علـى
العـرش
قـدما
|
|
فــي
زمــان
لــم
تعــرض
الأســماء
|
|
إثــر
هــذا
ابــدى
عــوالم
ملــك
|
فـــاطر
الأرض
والســـما
ذات
حبــك
|
|
وانـــاط
الـــبروج
فيهــا
بســلك
|
ثــم
لاح
الصــباح
مــن
غيــر
شــك
|
|
وبـــدا
ســـرها
وبـــان
الخفــاء
|
|
فقـــــدناها
مســــبب
الأســــباب
|
نوبـــــة
للأرحـــــام
والأصــــلاب
|
|
وجــرى
مــا
جــرى
بــام
الكتــاب
|
وبــرى
اللــه
آدمــا
مــن
تــراب
|
|
ثــــم
كـــانت
مـــن
آدم
حـــواء
|
|
فكـــأن
الأصـــلاب
كـــانت
بروجــا
|
ومـــن
الشـــمس
عمهـــن
البهــاء
|
|
شــرف
اللــه
فيــك
صــلبا
فصـلبا
|
ازكيـــــاء
نمتهــــم
ازكيــــاء
|
|
لـــم
تلـــد
هاشـــمية
هاشـــميا
|
كعلــــــيّ
وكلهـــــم
نجبـــــاء
|
|
وضـــــعته
ببطـــــن
أول
بيــــت
|
ذاك
بيــــت
بفخــــره
الاكتفـــاء
|
|
يـــابن
عــم
النــبي
ليــس
ودادي
|
بـــوداد
يلـــوح
منـــه
الريــاء
|
|
أمـــر
النـــاس
بـــالمودة
لكــن
|
منهــم
أحســنوا
ومنهــم
اســاءوا
|
|
فــالورى
فيــك
بيــن
غــال
وقـال
|
وموبـــال
وذو
الصـــواب
الـــولاء
|
|
وولائي
ان
بحــــت
منــــه
بشـــيء
|
فبنفســـــي
تخلفـــــت
اشــــياء
|
|
أتقـــي
ملحـــداً
وأخـــش
عـــدوا
|
يتمــــارى
ومــــذهبي
الاتقــــاء
|
|
وفــــرار
مــــن
نســـبة
لغلـــو
|
انمـــا
الكفـــر
والغلــو
ســواء
|
|
أنـــا
لا
انــس
معشــرا
أخرجــوكم
|
نحــو
شــعب
تفــر
عنــه
الضــباء
|
|
وأصـــروا
علــى
القطيعــة
مــادا
|
مـــوا
وخطـــت
صـــحيفة
ســـوداء
|
|
هــم
قريــش
وكفرهــم
ليــس
ينسـى
|
ابـــدا
مـــا
تغنـــت
الورقـــاء
|
|
باعـدوا
المصـطفى
علـى
القـرب
منه
|
أي
خطـــــب
أقـــــارب
أعــــداء
|
|
ذا
مـــبيت
الفــراش
يــوم
قريــش
|
كفـــراش
وأنـــت
فيهـــم
ضـــياء
|
|
فكـــأني
أرى
الصـــناديد
منهـــم
|
وبأيـــــديهم
ســـــيوف
ظمــــاء
|
|
صـــاديات
الـــى
دم
هـــو
للمــا
|
ء
طهـــور
لـــو
غيرتــه
الــدماء
|
|
دم
مــن
ســاد
فــي
الأنـام
جميعـا
|
ولــــديه
أحرارهــــم
أدعيــــاء
|
|
قصـــرت
مــذ
رأوك
منهــم
خطــاهم
|
ولـــديهم
قــد
اســتبان
الخطــاء
|
|
شــكر
اللــه
منــك
ســعيا
عظيمـا
|
قصـــرت
عـــن
بلـــوغه
الاتقيــاء
|
|
ورجــــال
قـــد
آذنـــت
بســـجود
|
ليعـــوق
ونســـرهم
ثـــم
فــاءوا
|
|
عميــت
أعيــن
عــن
الرشــد
منهـم
|
وبـــذا
ذا
الفقــار
زال
العمــاء
|
|
يســـتغيثون
فــي
يغــوث
الــى
ان
|
منــك
قــد
حـل
فـي
يغـوث
القضـاء
|
|
لــــك
طـــول
علا
قريـــش
بيـــوم
|
فيــــه
طـــول
وريحـــه
نكبـــاء
|
|
كــم
رجــال
أطلقتهــم
بعــد
أسـر
|
أشـــنع
الأســـر
انهـــم
طلقـــاء
|
|
إن
تزويـــــج
فـــــاطم
لعلــــي
|
هــو
مــن
فــاطر
السـماء
ابتـداء
|
|
أمـــر
اللــه
جبرئيــل
أن
اهبــط
|
لحبيــــبي
ولتهبــــط
الســــراء
|
|
وليـــزوج
شـــمس
الفخــار
ببــدر
|
يخجـــل
البــدر
نــوره
والســناء
|
|
لـــو
بأرحـــامهم
فنـــى
كعلـــي
|
أو
كمـــن
ارضـــعتهما
الزهـــراء
|
|
لــدعاهم
مــذ
باهـل
القـوم
جهـراً
|
وهـــل
القبــح
يعــتريه
الخفــاء
|
|
يـــردع
الخصـــم
شــاهدان
حنيــن
|
بعــد
بــدر
لـو
قـال
هـذا
ادعـاء
|
|
ان
يــوم
النفيــر
والعيــر
يــوم
|
هــو
فــي
الــدهر
رايــة
ولــواء
|
|
أرغــم
اللــه
فيــه
أنــف
قريــش
|
وأبـــى
الملحـــدون
ذاك
الابـــاء
|
|
ســل
وليــدا
وعتبــة
مــا
دعـاهم
|
لفنــــاء
علا
عليــــه
الفنــــاء
|
|
لا
تســـل
شـــبية
فقـــد
اســكرته
|
نشــوة
كرمهــا
القنــا
والظبــاء
|
|
مــذ
دعــوا
للنــزال
انصـار
صـدق
|
زان
فيهـــم
عفـــافهم
والحيـــاء
|
|
بــــرز
الأوس
نحـــوهم
فأجـــابوا
|
لا
حيــــاء
فلتــــبرز
الأكفــــاء
|
|
ثــــم
أســـكنهم
بقعـــر
قليـــب
|
بعــد
مــا
عنهــم
يضــيق
الفضـاء
|
|
وحنيـــن
وقــد
شــكت
حمــل
ثقــل
|
مـــذ
وطاهـــا
حســامك
الغــبراء
|
|
حــل
فــي
بطنهـا
مـن
الشـرك
رهـط
|
حــاربوا
المصـطفى
وبـالاثم
بـاءوا
|
|
ليـــس
إلا
مخاضـــها
يـــوم
حشــر
|
يــوم
لــم
تعـرف
المخـاض
النسـاء
|
|
أحــــد
قـــد
رآك
اثبـــت
منـــه
|
يــوم
ضــاقت
مـن
القنـا
البيـداء
|
|
يــوم
حــامت
ليــوث
قحطـان
رعبـا
|
وبلاء
الاصـــــــــــحاب
ذاك
البلاء
|
|
وخبــــت
جمـــرة
لعبـــد
منـــاف
|
ضــج
مــن
حرهــا
الهـدى
والنقـاء
|
|
أنــا
لا
أنــس
ان
نســيت
الرزايـا
|
كبــــداً
فلـــذة
لهنـــد
غـــذاء
|
|
كــم
شــرقتم
مــن
آل
حــرب
بحـرب
|
والـــى
اللـــه
ترجــع
الخصــماء
|
|
ليــس
خطــب
بــل
كـان
اعظـم
خطـب
|
كســـر
ســن
لــه
النفــوس
فــداء
|
|
فــر
مــن
فــر
والمنــادي
ينـادي
|
إثـــر
مـــن
لا
لســـمعهم
إصــغاء
|
|
كــل
هــذا
وانــت
تــبري
رؤوســا
|
هــم
لمــن
حــل
فـي
لظـى
أوليـاء
|
|
ولصـــــبر
صـــــبرته
ولعبـــــء
|
قـــد
تحملتـــه
أتـــاك
النــداء
|
|
لا
فـــتى
فـــي
الانـــام
إلا
علــي
|
وكـــذا
الســـيف
عمــه
اســتثناء
|
|
ثــم
فــي
فتــح
خيـبر
نلـت
فخـراً
|
شـــاهد
الفخـــر
رايـــة
بيضــاء
|
|
اعطيـــت
ذا
بســالة
حبــه
اللــه
|
يمينـــا
مــا
فــوق
هــذا
عطــاء
|
|
فســـقى
مرحبـــا
بكــأس
ابــن
ود
|
مســـكراً
عنـــه
تقصــر
الصــهباء
|
|
ودحــــا
بـــاب
خيـــبر
بيميـــن
|
هــــي
للـــدين
عصـــمة
ووقـــاء
|
|
قــال
لمــا
شــكت
مواضــيه
سـغبا
|
تلــك
أم
القــرى
وفيهــا
القـراء
|
|
جــاء
نفـس
الألـه
فـي
ذلـك
اليـوم
|
وبالفتـــــح
تمــــت
النغمــــاء
|
|
وحــــديث
الغــــدير
فيــــه
بلاغ
|
بمعـــــــانيه
حـــــــارت
الآراء
|
|
هبـــط
الـــروح
مســـتقلا
بـــامر
|
مــــــــن
مليـــــــك
آلاؤه
الالاء
|
|
بهجيـــــر
مــــن
الفلا
وهجيــــر
|
محـــرق
منـــه
تفـــزع
الحربــاء
|
|
قـال
بلـغ
مـا
انـزل
اللـه
فـي
من
|
تشــــكر
الارض
فضـــله
والســـماء
|
|
فانـــاخ
الركـــاب
بيـــن
بطــاح
|
لــم
يحــم
حولهــا
الكلا
والمــاء
|
|
ثــم
نــادى
أكــرم
بـه
مـن
منـاد
|
حــــان
فــــرض
وللفــــروض
أداء
|
|
فاســـتداروا
مــن
حــوله
كنجــوم
|
حــول
بــدر
تجلــى
بــه
الظلمـاء
|
|
فبــدا
منــه
مــا
بـدا
فيـك
مـدح
|
نتجــــت
منــــه
فتنـــة
صـــماء
|
|
هـــو
حكـــم
لكنـــه
غيــر
مــاض
|
رب
حكـــم
قـــد
خـــانه
الامضــاء
|
|
إنمـــا
المصـــطفى
مدينــة
علــم
|
بابهـــا
أنـــت
والــورى
شــهداء
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أنــت
فصـل
الخطـاب
حيـن
القضـايا
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علـــم
فيـــك
تقتـــدي
العلمــاء
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وفصــــيح
كـــل
الأنـــام
لـــديه
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بعــــد
طـــه
فصـــيحهم
فأفـــاء
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ليـــــس
إلاك
للفصــــاحة
نهــــج
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وعلـــى
النهــج
تســلك
البلغــاء
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بـــك
واللـــه
لا
بغيـــرك
مــدحا
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نزلــت
هــل
أتــى
وفيهـا
الغنـاء
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وتصـــدقت
فـــي
الصـــلاة
وجــاءت
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آيـــة
فيـــك
حمـــدها
والثنــاء
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ثــم
لمــا
هنالــك
انقطـع
الـوحي
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وفـــي
الخــافقين
قــام
العــزاء
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وبكــت
فــاطم
لفقــد
حــبيب
الـل
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ه
أشـــجى
القلـــوب
ذاك
البكــاء
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مــــذ
ترويــــت
بالخلافـــة
أورى
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نــارهم
فــي
القلـوب
ذاك
الـرواء
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يـــوم
غصـــت
فيحـــاؤهم
بخميــس
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زال
فيــه
عــن
القلــوب
الصــداء
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أصـــبحت
ضـــبة
كاعجـــاز
نخـــل
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خــان
فيهـا
عنـد
اللقـاء
البقـاء
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وأيبحــــت
أرواحهــــم
ودمـــاهم
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وأصــــينت
أمـــوالهم
والنســـاء
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وبصـــفين
وقعـــة
مـــا
علمنـــا
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انتــج
الحــرب
مثلهــا
والوغــاء
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يــوم
وافــت
كتـائب
الشـام
تـترى
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حميــــر
والسكاســــك
الســـفهاء
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قــادهم
ذو
الكلاع
نحــو
اهـل
بـدر
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مثلمـــا
قــاد
ذا
الكلاع
البغــاء
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لخميــس
فــي
قلبــه
أســد
اللــه
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وخيـــل
مـــن
فوقهـــا
أصـــفياء
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ركــــع
ســــجد
إذا
جـــنّ
ليـــل
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حلفـــاء
مـــع
الـــوغى
أصــدقاء
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عــالجوا
الشــام
بالقنــا
لسـقام
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حـــل
فيــه
والــداء
ذاك
الــداء
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ان
تســـل
عـــن
مصــاحف
رقموهــا
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هـــو
مكــر
عــن
الكفــاح
وقــاء
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شـــبهت
كفـــى
بهــا
قتــل
عمــا
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ر
بيانــــا
لــــو
أنهــــم
عقلاء
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ولـــودّوا
تحكيمهـــا
لســوى
مــن
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حكمــــوه
لــــو
أنهـــم
أمـــاء
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وتمـــم
شـــيطانهم
قـــد
دعــاهم
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فاجـــابوا
ومـــا
عراهــم
بطــاء
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ســكنوا
النهـر
وان
يـا
بئس
مثـوى
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وغــدا
فــي
لظــى
يطــول
الثـواء
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قـــد
تجرعـــت
صـــابراً
لا
لشــوق
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حركتــــه
البيضـــاء
والصـــفراء
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يـــوم
طلقتهـــا
فســامتك
لــدغا
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وهــي
أفعــى
يعــزّ
فيهـا
الرقـاء
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قلـــدت
كلــب
ملجــم
ســيف
غــدر
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قـــد
ســـقته
ذعافهــا
الرقطــاء
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مــا
عـرا
الـدين
مثـل
يومـك
خطـب
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مـــــدلهم
ونكبـــــة
دهيـــــاء
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ثـــــــم
كـــــــر
البلا
وأيّ
بلاء
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مســــتطيل
أتـــت
بـــه
كـــربلاء
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لهـــف
نفســـي
لمســـتظام
غريــب
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فـــي
رباهـــا
وأهلـــه
غربـــاء
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وحريـــم
قــد
ســلبت
بعــد
صــون
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ثــم
ســارت
مــا
ســارت
الأســراء
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يــوم
بـاتت
تبكـي
السـماء
عليهـم
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بـــدماء
وهـــل
يفيـــد
البكــاء
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أهــل
بيـت
قـد
أذهـب
اللـه
عنكـم
|
كــــل
رجــــس
تحفـــه
الأســـواء
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قــاتلوكم
بهــا
قتــال
مــا
يــث
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بـــت
فيـــه
للأمهـــات
الزنـــاء
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أيهـــا
الراكــب
المهجــر
يحــدو
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يعملات
مــــا
مســــها
الامضــــاء
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يمـــم
الركـــب
للغـــري
ففيـــه
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بحــــر
جــــود
وروضـــة
غنـــاء
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ثـم
قـم
لـي
مقـام
مـن
مسـه
الضـر
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وغــــاداه
كــــل
يـــوم
عنـــاء
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وأذل
عـــــبرة
كصــــوب
ســــحاب
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هطلــــت
عنـــه
ديمـــة
وطفـــاء
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والتثــم
تربــة
وقــل
يـا
غيـاثي
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ورجــائي
إن
خــاب
معنــى
الرجـاء
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إن
أتتكـــم
هديـــة
مثــل
قــدري
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فمقــــداركم
ســــيأتي
الجـــزاء
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ألا
يـا
وزير
العصر
أظهرت
في
الورى
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مكـــارم
فيهــا
تقصــر
الــوزراء
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حقيــق
بــأن
تفــديك
منـا
بـانفس
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ولا
شــــيء
إلا
للنفــــوس
فـــداء
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وتزعــم
أن
نجـزي
أياديـك
بالفـدا
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ومـــا
لا
يأديــك
العظــام
جــزاء
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لقد
ذل
فيك
الظلم
والجور
في
الورى
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كمــا
عــزّ
فيـك
العلـم
والعلمـاء
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