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يـا
سائراً
من
مصر
أعني
القاهرة
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عـج
بـالمطيّ
على
البلاد
الطاهرة
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وجـز
البحـار
ولا
تخـف
أمواجهـا
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والـبر
لا
تخـشَ
السـباع
الكاسرة
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واقصـد
مـن
الشـام
المقدس
قرية
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فيهـا
القـرى
أنـواعه
متكـاثرة
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فيهـا
الفتـوة
والفتاوة
والرضى
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ووجــوه
أهليهــا
وجـوه
ناضـرة
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هــي
قريــة
تـدعى
بـدير
عطيـة
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مشــهورة
فـي
بـدوها
والحاضـرة
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تعطيـك
مـا
يرضـيك
مـن
إحسانها
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وتفـوز
منهـا
بالهبـات
الوافرة
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فـإذا
وصـلت
وقـد
بـدت
أعلامهـا
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وشــممت
رائحــة
هنالـك
عـاطرة
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فأنـخ
مطيـك
فـي
فنا
ذاك
القنا
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واقصـد
بني
القصاب
وقت
الهاجرة
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وقــل
السـلام
عليكـم
مـن
غـائب
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طـول
الجفـا
والبعـد
كدر
خاطره
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قلـق
الفـؤاد
يـبيت
معظـم
ليله
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مترقبـاً
يرعـى
النجـوم
الزاهرة
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هــذا
وإن
رســالة
منكــم
أتـت
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فـي
طيهـا
بـاء
الـبراءة
ظاهرة
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يبا
ابن
الشقيق
لقد
طلبت
براءة
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مـن
عنـد
سلطان
البرايا
صادرةه
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أنّــى
لعمــك
أن
يعـوم
ببحرهـا
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أنّــى
يطيـق
لعلـم
ذاك
مـذاكرة
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وأبيــك
لســت
بصــالح
لمصـالح
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ترضـيك
فـي
الدنيا
ولا
في
الآخرة
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إنــي
غــبي
فــي
الأمـور
مغفـل
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لا
أســتطيع
لمـا
طلبـت
مباشـرة
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مـالي
إلـى
نيـل
المعـالي
نهضة
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مـالي
مـع
ابناء
الزمان
معاشرة
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لـي
همـة
عـن
درك
قصـدك
قاصـرة
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لكنهــا
نحــو
السفاسـف
طـائرة
|
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ولهــا
ســكون
عـن
تطلـب
رتبـة
|
لكنهــا
نحــو
الــدنايا
دائرة
|
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والنـاس
قـد
راجـت
بضاعة
بيعهم
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وبضـاعتي
بيـن
البرايـا
بـائرة
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وحمـار
عجـزي
فـي
العناء
يعوقه
|
قيـد
القضـا
عن
أن
يزحزح
حافره
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كيـف
الوصـول
إلـى
مناك
ودونها
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قلـل
الجبال
بل
الحصون
العامرة
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ليكــن
لكـم
يـا
آل
قصـاب
ولـي
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نفـس
علـى
ضـيق
المعيشـة
صابرة
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ولنصــطبر
مثـل
الـذين
تقـدموا
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وكمـا
صبرنا
في
السنين
الغابرة
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ولنتبــع
فـي
ذاك
منهـج
والـدي
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ذي
الزهد
والتقوى
وأمي
الطاهرة
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ولنـدعُ
مولانـا
المهيمـن
ولنقـل
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لبيــك
إن
العيــش
عيـش
الآخـرة
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والنفــس
ترغـب
أن
تكـون
غنيـة
|
ولهـا
من
المال
البحور
الزاخرة
|
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والنفــس
يكفيهـا
لقيمـات
كمـا
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يكفــي
لعورتهــا
ثيـاب
سـاترى
|
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كـن
راضـياً
ابـن
الشقيق
وحامداً
|
إحســان
مـولاك
الكريـم
وشـاكره
|
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والعمــر
آخــره
تصـرم
وانقضـى
|
فاجعـل
إلهـي
خيـر
عمـري
آخـره
|
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احرص
على
التحصيل
في
حال
الصبا
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ولا
تكــن
تلعــب
مـع
مـن
لعبـا
|
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فـإن
مـا
يحفـظ
فـي
حـال
الصغر
|
يثبـت
فـي
النفس
كنقش
في
الحجر
|
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العلــم
مــاتحفظه
فــي
الصـدر
|
فــاحفظ
تكـن
بـه
عظيـم
القـدر
|
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ولا
تضــع
وقتــاً
وعــذ
بــالله
|
منكـــل
بطـــال
كســـول
لاهــي
|
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لا
فـــي
معــاش
دنيــوي
يســعي
|
ولا
بمــــرج
أخــــروي
يرعـــى
|
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فغيــره
أولــى
وأحــرى
وأحــب
|
لأهلـــه
منــه
حمــار
ذو
ذنــب
|
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ولا
تكــــن
مثـــل
فلان
كانـــا
|
لا
يعــرف
الكميــون
والــدكانا
|
|
ولا
حمـــار
الشــيخ
والفــدانا
|
ولا
حصـــاد
الــزرع
والعــدانا
|
|
أقصــى
النســاء
ثيبــاً
وبكـرا
|
ولــم
يخالــل
خالــداً
وبكــرا
|
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لـم
يرتـعِ
لاا
فـي
رياض
المدرسة
|
حـــتى
غــدت
مســكنه
ومغرســه
|
|
مشـــمراً
عــن
ســاق
الاجتهــاد
|
فـي
الحفـظ
للعلـم
وفـي
الأوراد
|
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فلـــم
يكـــن
إلا
قليــل
حــتى
|
آثـــر
غيـــرَه
أمـــوراً
شــتى
|
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فاعتــاض
عنــه
ســفهاً
كميونـا
|
واتخـــذ
الصــَّدي
لــه
زبونــاً
|
|
يركــب
فــي
كميـونه
إلـى
صـدد
|
يقـول
يـا
شـيخ
الكمايين
المدد
|
|
ومـــن
فليطـــة
فــتى
أتانــا
|
قــد
تــرك
الحمــار
والأتانــا
|
|
وتـــرك
الكبـــاش
والســـخالي
|
جميعهــا
للخــال
وابـن
الخـال
|
|
حرصــاً
علــى
تحصـيل
مـا
عسـاه
|
ينفعـــه
دينــاً
وفــي
دنيــاه
|
|
فجــد
كــل
الجـد
فـي
التحصـيل
|
فــي
بكــرة
النهــار
والأصــيل
|
|
مسـابقاً
فـي
الحفـظ
مـن
جـاراه
|
يعجـــب
منـــه
كـــل
مــن
رآه
|
|
فمـــا
مضـــى
إلا
قليــل
حــتى
|
انحـــل
حبــل
عزمــه
وانبتــا
|
|
فكـــر
راجعـــاً
إلــى
فليطــة
|
لـم
يسـتطع
صـبراً
علـى
اللطيطة
|
|
فكــان
فيمــا
رامــه
ميســونا
|
إذا
آثـرت
علـى
الرفيـع
الدونا
|
|
أو
مثــل
قـوم
السـيد
المعصـوم
|
موسـى
الكليـم
في
اختبار
الثوم
|
|
وغيــره
مــن
البقــول
والبصـل
|
إذ
سـئموا
السـلوى
ومناً
كالعسل
|
|
فــأين
أنــت
مــن
فـتى
عجلـون
|
جـــواد
جـــد
حــافظ
المتــون
|
|
فجـــدَّ
مثـــل
جـــده
ولا
تـــن
|
واحـذر
بـأن
تكـون
مثل
الرستني
|
|
فمـــا
للرجـــوع
كــل
الميــل
|
ولــم
يبــت
إلا
ســواد
الليــل
|
|
يهتـف
فـي
الصـبح
من
الخوف
متى
|
فعـاد
مـع
فتـاه
مـن
حيـث
أتـى
|
|
كـــأنه
فيمـــا
عنــاه
عُيّــرا
|
أو
أنـــه
بمــا
جــرى
تطيــرا
|
|
وكنــت
قــد
قـابلته
ومـن
معـه
|
بمرحبـــا
أهلاً
وســـهلاً
وســـعه
|
|
وقــد
عقـدت
القلـب
مـن
صـميمه
|
أن
أبـذل
المجهـود
فـي
تعليمـه
|
|
لكـن
رحـى
الأقـدار
لا
تجـري
على
|
قطــب
مــراد
أحــد
مــن
الملا
|
|
تصـديق
معنـى
قـول
سـيد
البشـر
|
الصـادق
المصـدوق
فـي
كـل
خـبر
|
|
مـا
لاق
فـافعله
ودع
مـا
لم
يلق
|
كـــلّ
ميســر
لمــا
لــه
خلــق
|