|
مــا
فــاز
إلا
السـاكت
الصـموت
|
عــن
كـل
مـن
يحيـا
ومـن
يمـوت
|
|
مــا
كــل
كلمــة
لهــا
جــواب
|
جـــواب
مــا
تكرهــه
الســكوت
|
|
الصـــمت
قـــالوا
ســلم
الخلاص
|
والنطـق
حبـس
الـدر
فـي
الأقفاص
|
|
الصــــمت
قربــــة
بلا
عنـــاء
|
وزينـــة
المـــرء
بلا
افــتراء
|
|
وهيبــة
مــن
غيــر
مـا
سـلطان
|
وقلعــة
مــن
غيــر
مـا
بنيـان
|
|
وراحــــة
الكتبـــة
الأبـــرار
|
وغنيــــة
عـــن
ذل
الاعتـــذار
|
|
طـوبى
لمـن
قـد
قـال
خيراً
فغنم
|
أو
كــف
عـن
أذى
العبـاد
فسـلم
|
|
مـن
كـان
فـي
الـدنيا
لـه
عـدو
|
فمـــا
لـــه
نـــوم
ولا
هـــدو
|
|
يـا
سـعد
مـن
قـد
كـان
مسـتقلا
|
ولــو
رعــى
الحشـيش
والبـاقلا
|
|
إذا
أراد
حاجـــــة
أمضــــاها
|
بشـــرط
كــون
ربنــا
يرضــاها
|
|
يلطــف
بالضــعيف
حــتى
يبلغـا
|
مـن
الأمـاني
فـوق
ماكـان
ابتغي
|
|
ويحجـــب
القــوي
عــن
مرامــه
|
وربمـــا
يـــراه
فــي
منــامه
|
|
مفتــاح
دنيـاك
الدنيّـة
الشـبع
|
وهو
الذي
يدعو
الفتى
إلى
الطمع
|
|
والجــوع
مفتــاح
لبـاب
الآخـرة
|
ففيــه
نـافس
مـن
تشـا
وفـاخرة
|
|
فــوائد
الجــوع
وآفـات
الشـبع
|
يُعنـــى
بهــا
لتتقــى
وتتبــع
|
|
ســاداتنا
قــالوا
لنـا
الجـوع
|
لكـــل
قلـــب
ســـالك
ينبــوع
|
|
سـهل
بـن
عبـدالهل
صـاحب
الورع
|
إمــامهم
فيــه
وهــم
لـه
تبـع
|
|
مــارنَّ
عــود
لهـوهم
مـن
خـوفه
|
مــــارنَّ
إلا
لخلــــو
جــــوفه
|
|
كالخيـــل
لا
يســبق
منهــا
إلا
|
مضـــــمِّر
لأكلــــه
مــــا
قلا
|
|
كــان
البخــاري
صـاحب
الصـحيح
|
وصـــاحب
التعــديل
والتجريــح
|
|
ياكـــل
تمـــرة
وقيــل
لــوزة
|
والتسـتري
فـي
اليـوم
قدر
جوزة
|
|
ومثلنـــا
يأكـــل
ممــا
دبــا
|
وغيـــره
مــن
الغــذا
أردبــا
|
|
نعبـــد
والعبـــادة
التـــذلل
|
للــه
وهــو
القــاهر
المــذلل
|
|
ذلــل
أنعامــاً
لنــا
لا
تعقــل
|
منهــا
ركوبنــا
ومنهــا
نأكـل
|
|
نأكـــل
ثمنحــن
فــي
انصــرام
|
عــن
شــكر
ذي
الجلال
والإكــرام
|
|
نأكـــل
لا
عـــن
ســـغب
وجــوع
|
نشــرب
شـرب
الهيـم
مـن
ينبـوع
|
|
نأكــل
خــبز
الــبر
والفطيـرا
|
أكلاً
ذريعــاً
لــم
نـدع
تقصـيرا
|
|
والتبـــن
والحشــيش
والشــعير
|
كـــل
علـــى
أمثالنــا
كــثير
|
|
عجــل
الهــوى
عليــه
عاكفونـا
|
وعــن
عــذاب
القــبر
غافلونـا
|
|
النفــس
منــي
تطلــب
الخبيثـا
|
مــن
كــل
شــيء
طلبـاً
حيثيثـا
|
|
وتكــــره
الطيـــب
كـــالجعلان
|
يــؤذيه
ريـح
الـورد
والريحـان
|
|
لخبثهــــا
ضـــيَّعتِ
الحقوقـــا
|
لا
خالقـــاً
ترضــي
ولا
مخلوقــا
|
|
لا
تعــرف
المعــروف
والإنصــافا
|
تهاونـــاً
بــالحق
واســتخفافا
|
|
ديــــدنها
دنــــاءة
ومنكـــر
|
يـا
ليتهـا
لـم
تـك
شـيئا
يذكر
|
|
يـا
لـبيت
أمـي
لـم
تلدني
أبدا
|
وليــت
جسـمي
للوجـود
مـا
بـدا
|
|
فـي
النفـس
فـي
إعطائهـا
هواها
|
مـــــذاهب
ثلاثــــة
تراهــــا
|
|
إعطاؤهــا
والمــد
فـي
رباطهـا
|
تخيُّلاً
لهــــا
علـــى
نشـــاطها
|
|
ومنعهــا
مــن
كــل
مـا
تطلبـه
|
يركــــب
ظهرهـــا
ولا
تركبـــه
|
|
والراجـــح
المعتمــد
التوســط
|
لقــوله
خيــر
الأمــور
الوســط
|
|
أوصــيك
نفســي
أبلــغ
الوصـية
|
مــأثورة
عــن
أفضــل
البريــة
|
|
تعرَّفـــي
للـــه
فــي
الرخــاء
|
يعرفــك
فــي
الشــدة
والضـراء
|
|
مــا
أحــد
أســوأ
حــالاً
منــي
|
فـي
الإنـس
إطلاقـا
ولا
فـي
الجـن
|
|
أعنـي
بـه
الـديني
أما
الدنيوي
|
فشــــابعمنه
ومنـــه
مرتـــوي
|
|
جســمي
ينــاديني
جميعــي
قـذر
|
حســاً
ومعنــى
والأخيــر
أقــذر
|
|
حـالي
كـبير
مثل
حالي
في
الصغر
|
لا
عقـل
لـي
ولا
فكـر
لـي
ولا
نظر
|
|
إنـــي
أخــاف
ربــي
القــديرا
|
يمســخ
جسـمي
قـرداً
أو
خنزيـراً
|
|
لــو
يعلـم
النـاس
بقبـح
حـالي
|
لبـــادروا
ضـــربي
بالنعـــال
|
|
فمثلــــي
كمثــــل
الغــــراب
|
يضـــل
عـــن
طريقــه
الصــواب
|
|
لا
تصـــحبوني
إننـــي
مشـــؤوم
|
لا
مثـل
لـي
فـي
الشؤم
إلا
البوم
|
|
ثــم
دويــس
كـان
فـي
المدينـة
|
يقــول
قــومي
أنصـتوا
لسـيرتي
|
|
مـا
دمـت
فيكم
فاحذروا
الدجالا
|
فــإن
قضــيت
فــاطمئنوا
بـالا
|
|
فمـــات
يـــوم
ولــدتني
أمــي
|
أســعد
خلــق
اللــه
طـه
الأمـي
|
|
ومـــات
إذ
فطمــت
ذو
الوقــار
|
رفيقـــه
صــاحبه
فــي
الغــار
|
|
ومــات
إذ
بلغــت
مولانــا
عمـر
|
مـن
جنّـد
الجنـود
والمـدن
عمّـر
|
|
ومــات
بعــد
يــوم
أو
يــومين
|
مــن
زمـن
الـزواج
ذو
النـورين
|
|
ومـات
فـي
اليـوم
الـذي
ولد
لي
|
الأنــزع
الكــرار
مولانــا
علـي
|
|
وضــــده
طــــاووس
اليمـــاني
|
كــان
مباركــاً
عظيــم
الشــان
|
|
إن
أبــــي
تبركــــاً
ســـماني
|
باســم
أبــي
صــالح
الجيلانــي
|
|
رجــاء
أن
أكــون
تحــت
نظــره
|
ومستضــيئاً
مــن
شــعاع
قمــره
|
|
وكنيــتي
أبــو
المعـالي
وكفـى
|
مـن
وضـع
آل
البيت
من
آل
الوفا
|
|
اللــه
خصــهم
بهــا
واختارهـا
|
لهـم
وقـد
أبـدت
لنـا
أسـرارها
|
|
وإن
مــن
أســرارها
انقلاب
مــن
|
كــان
شــريراً
إلــى
حـال
حسـن
|
|
الحــب
ينمـو
رغـم
بعـد
الـدار
|
والقـرب
قـد
يفضـي
علـى
الإضجار
|
|
لا
ســـيما
مـــن
زائر
ثرثـــار
|
كـــــأنه
مطـــــالب
بثــــار
|
|
يرمــي
بســهم
قوســه
الوتــار
|
مــن
حجــر
أو
شــرر
مــن
نـار
|
|
الحــب
والــدعا
مــع
التنـائي
|
خيـــر
مــن
الــدنو
واللقــاء
|
|
وذا
كمـــا
قـــالوا
للاتقـــاء
|
مــن
آفــة
النفــاق
والريــاء
|
|
مــن
موجبـات
الـرزق
والرغـائب
|
دعـــوة
كـــل
غـــائب
لغــائب
|
|
ومـــرض
القلـــب
أشــد
مرضــا
|
علاجـــه
أشـــد
شـــيء
عرضـــا
|
|
وإن
أمـــراض
القلـــوب
أجــدر
|
بــأن
تــداوى
فهــي
داء
اخطـر
|
|
إن
للمـــال
زكـــاة
تســـتبين
|
وزكــاة
الجـاه
عـون
المسـتعين
|
|
وعـــثرة
فـــي
رجلـــه
تقــال
|
وعــــثرة
اللســـان
لا
تقـــال
|
|
مـــن
كـــف
فكــه
وفــك
كفــه
|
فــذاك
بــاب
الــذم
عنـه
كفـه
|
|
وكفــــه
مـــن
كفـــه
وفكـــه
|
مــــن
فكـــه
فصـــكه
وفكـــه
|
|
مـن
فضـل
ربنـا
الكريـم
الباري
|
أن
زيَّـــن
الغــبراء
بالأشــجار
|
|
وزيــــن
الأشـــجار
بالثمـــار
|
وزيــــن
الـــبيوت
بـــالزوار
|
|
وزيـــن
الســـماء
بـــالكواكب
|
وزيـــن
البحـــار
بـــالمراكب
|
|
توبـــة
كـــل
مــذنب
إقــراره
|
فـــإن
يتــب
فــذلك
اعتــذاره
|
|
إن
التقــــي
ســــلاحه
صـــلاحه
|
وغيـــــره
ســــلاحه
رمــــاحه
|
|
همــــة
كـــل
أحـــد
جـــواده
|
وصــــــدقه
شــــــرابه
وزاده
|
|
صــــلاح
كـــل
مـــؤمن
ســـلاحه
|
وحرفــــة
الفلاحــــة
فلاحــــه
|
|
لكـن
مـن
المزيـد
فـي
الفاقـات
|
مـا
لا
تـرى
فـي
الصـوم
والصـلاة
|
|
لكــــل
شـــيء
عـــدة
وآلـــة
|
وعـــدة
المــؤمن
عقــل
نــاله
|
|
مـا
العقـل
غلا
مـا
هدى
إلى
هدى
|
وكفــــه
وردّه
عــــن
الـــردى
|
|
فــالكلب
والخنزيــر
خيـر
ممـن
|
عصــى
الــذي
فضــله
بــه
ومـن
|
|
والعاقــل
الــذي
أطــاع
اللـه
|
لا
مـن
أطـاع
النفـس
فـي
هواهـا
|
|
عليــــك
بالصــــلاح
والإصـــلاح
|
واحــذر
مــن
الخصـام
والتلاحـي
|
|
زأرة
كــل
أســد
فــي
الــزارة
|
أهــون
مــن
زورة
بعـض
الـزارة
|
|
إن
يـأتني
مـن
فضـل
ربـي
القوت
|
هــان
علــي
الــدرُّ
واليــاقوت
|
|
تقـــول
إنـــي
صــامت
وصــائم
|
وأنــت
فــي
لحــم
أخيـك
سـائم
|
|
إن
الـذي
يسـير
فـي
النهج
الأسد
|
أهيـب
عنـد
النـاس
من
مشي
الأسد
|
|
لا
خيـر
فـي
جـود
الفـتى
المطال
|
وإن
يكـــن
كـــالمطر
الهطــال
|
|
إن
كــثر
العصــاة
والطاغونــا
|
فــالله
سـخطاً
يرسـل
الطاعونـا
|
|
مـا
سـخروا
بالـدين
واسـتهانوا
|
إلا
أحــــاط
بهــــم
الهـــوان
|
|
المســـتهين
بالهـــدى
يزيـــد
|
علـــى
الـــذي
فعلـــه
يزيــد
|
|
يـا
حبـذا
الـوادق
عنـدما
رعـد
|
وحبــذا
الصـادق
بعـد
مـا
وعـد
|
|
ألفــى
قرينــاً
مخلصـاً
يناصـحه
|
فظنـــه
قرنـــاً
بــه
ينــاطحه
|
|
للمســلم
المســلمُ
طــائع
سـلس
|
وعـــن
الكـــافر
جامــح
شــرس
|
|
قـد
سـخر
الفلـك
لنـا
في
الماء
|
وســـير
الأفلاك
فـــي
الســـماء
|
|
إن
وقعـــت
شـــديدة
تواكلــوا
|
أو
نعمـــة
ســـابغة
تـــآكلوا
|
|
مـن
راقـب
القريـب
منه
الباسطا
|
وكــان
فينــا
مقسـطاً
لا
قاسـطا
|
|
فهـو
الـذي
في
جنة
الخلد
استقر
|
وحبــذا
المـأوى
وحبـذا
المقـر
|
|
مـــا
كــثرة
الكلام
والمقالــة
|
بعــــثرة
خفيفــــة
مقالــــة
|
|
إن
أنـت
لـم
تملـك
أخـي
لسـانك
|
ملكــت
شــيطان
الهــوى
عنانـك
|
|
إن
قلَّـــت
الأعـــوان
والأنصــار
|
كلـــت
عــن
التبصــر
الأبصــار
|
|
ولا
تعــاتب
مــن
تريــد
شــفها
|
فـــإنه
يُعـــد
منـــك
ســـفها
|
|
إذا
أردت
يومــــاً
المعاتبـــة
|
فليكـــن
العتــاب
بالمكاتبــة
|
|
رب
بليــــغ
بيِّــــن
المقـــال
|
أورده
مــــــوارد
العـــــذال
|
|
أورده
مــــــورد
القــــــذال
|
وإن
يكــن
مــن
زمــرة
الأبطـال
|
|
وكــم
رأينـا
مـن
ضـعيف
أعرجـا
|
وفــي
مــدارج
المعـالي
أعرجـا
|
|
وكــم
رأينـا
مـن
صـحيح
للقـدم
|
ليـس
لـه
فـي
حلبـة
الخيـر
قدم
|
|
أكــرم
حــديث
القـوم
بالإنصـات
|
مــن
غيــر
غفلــة
ولا
التفــات
|
|
صــدق
الــوداد
المحـض
والإخـاء
|
يظهــر
فــي
الشــدة
لا
الرخـاء
|
|
الــدر
أغلـى
قيمـة
مـن
الصـدف
|
وولــد
الشــريف
أولـى
بالشـرف
|
|
إن
أخـــذتك
يومـــاً
الزعــازع
|
لــم
تغـن
عنـك
شـيئا
الوعـاوع
|
|
مـن
طـالع
الإحيـاء
صـدقاً
وقـرا
|
احـرز
فـي
الدارين
أصناف
القرى
|
|
فيــه
عــن
كــل
كتــاب
غنيــة
|
والصـيد
كل
الصيد
في
جوف
الفرا
|
|
مــا
أحــد
ألــف
مثــل
الاحيـا
|
فكـــم
مــوات
للقلــوب
أحيــا
|
|
وأحســد
النــاس
لــك
الأقــارب
|
فاحــــذرهم
فـــإنهم
عقـــارب
|
|
كـــل
صـــديق
لـــك
أو
قريــب
|
يـــود
أن
تمـــوت
عــن
قريــب
|
|
إذا
أراد
اللــــه
بالمريــــد
|
خيــراً
هــداه
لأولــي
التجريـد
|
|
وصـــدَّه
عـــن
صــحبة
القــراء
|
عنايــــة
منــــه
بلا
عنــــاء
|
|
بالعلمـــاء
زينــة
الارض
كمــا
|
أن
النجـوم
الزهـر
زينـة
السما
|
|
العلــم
عــن
درس
وعــن
تلقيـن
|
وليـــس
عــن
طــرس
ولا
ترقيــن
|
|
وطلــب
الشــهرة
بيــن
النــاس
|
فــــذاك
مــــن
علامـــة
الإفلاس
|
|
مــن
واصــل
الأوراد
والأذكــارا
|
زوجــه
مــن
حورهــا
الأبكــارا
|
|
مــن
كـان
بـالله
الغنـي
غنـاه
|
أذهــب
عنــه
كــل
مــا
عنــاه
|
|
نــال
المنــى
وكــل
مـا
أرادا
|
مــــن
لازم
الأذكـــار
والأورادا
|
|
مــا
أحســن
الجميــل
بـالجزاء
|
وأحســن
الشــعرى
ورا
الجـوزاء
|
|
وكـــل
مـــا
تأخــذه
بالنصــب
|
مثــل
الــذي
تأخــذه
بالغصــب
|
|
كــم
أحـدث
الزمـان
أمـراً
مُـرَّا
|
ولــم
يــزل
يضــرب
زيـد
عمـرا
|
|
أكـــثر
مـــن
تراهــم
أغمــار
|
وإن
تنفســــت
بهـــم
أعمـــار
|
|
قبورنـــا
عمــا
قريــب
تبنــى
|
وعــن
معاصــي
ربنـا
مـا
تبنـا
|
|
نفعــل
مــا
شــئنا
ولا
نبــالي
|
لا
يخطــر
المــوت
لنــا
ببــال
|
|
كأننــا
لــم
نــر
شخصـاً
ماتـا
|
حـــتى
نكــون
مثلــه
أمواتــا
|
|
بـــالله
نحــن
واليــه
نرجــع
|
يـا
ليـت
شـعري
بعده
ما
المضجع
|
|
قـل
روضـة
فيهـا
النسيم
المنعش
|
أو
حفــرة
فيهـا
الأفـاعي
تنهـش
|
|
فــانظر
فـأي
المنزليـن
ترتضـي
|
تمشــي
بليـل
داج
أو
شـمس
تضـي
|
|
فــانظر
إلـى
ظنـك
بـالله
فـإن
|
يــك
خيــراً
أو
سـوى
هـذا
يعـن
|
|
ظنــي
بــرب
العـرش
بـل
يقينـي
|
مــن
العــذاب
مطلقــاً
يقينــي
|
|
واذكــر
هجــوم
هــادم
اللـذات
|
كأنــــك
الآن
مــــن
الأمـــوات
|
|
لا
تلتهــي
لا
تلتهــي
لا
تلتهــي
|
عــن
ذكـره
وعـن
سـواه
فـانتهي
|
|
لا
تغـــترر
بزخـــرف
المقـــال
|
كلا
ولا
بظــــــاهر
الأحـــــوال
|
|
كـــم
قبـــة
رفيعــة
المنــار
|
تبصــــرها
لكــــن
بلا
مـــزار
|
|
والـــدار
قبـــة
لهــا
مــزار
|
مزارهـــا
الــدرهم
والــدينار
|
|
لا
الطيــن
والأخشــاب
والاحجــار
|
ســيان
تلــك
الــدار
والقفـار
|
|
النفـس
مـن
أرسـلها
مـع
الهـوى
|
فهـو
الـذي
فـي
ابعد
الهوى
هوى
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إن
تــرض
عــن
نفسـك
لا
تمسـكها
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وإن
تكـــن
تمســـكها
تملكهــا
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لا
يصــل
العبــد
علــى
الحريـة
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مــا
بقيــت
مــن
نفســه
بقيـة
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قريبــــه
ســــروره
بقلبــــه
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محبـــــه
معـــــذب
بحبـــــه
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مـــن
كــان
لا
يعــرف
ذا
الجلال
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شــــغله
برؤيــــة
الأعمــــال
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يـا
طـالب
الـدنيا
لتعطـي
وتبر
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تركـك
الـدنيا
لـدى
اللـه
أبـر
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إنمــا
الــدنيا
كريــح
مرقــا
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يكفيـك
منهـا
مـا
يسـد
الرمقـا
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دنيـاك
تحلـو
يـا
فـتى
ثـم
تمر
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وتحــــلُّ
ســـاعة
ثـــم
تمـــر
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مــن
جعــل
التقـوى
لـه
لجامـا
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جعلـــه
النــاس
لهــم
إمامــا
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مــن
جعــل
التقـوى
لـه
بضـاعة
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حفظـــه
اللـــه
ومــا
أضــاعه
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مــن
جعــل
التقـوى
لـه
لباسـاً
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فـــإنه
قـــد
أحكــم
الأساســا
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مـن
أحكـم
التقـوى
أساسـاً
وأتم
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تفجــرت
فيــه
ينــابيع
الحكـم
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قـد
قـال
أهل
الله
أرباب
الورع
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لا
يحصـــد
الانســان
إلا
مــازرع
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لا
يهمـل
الكتـاب
منـك
مـا
صـدر
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كـــل
كـــبير
وصــغير
مســتطر
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دع
طمعـــاً
يورثـــك
المذلـــة
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ولا
تخـــف
مـــن
عيلــة
وقلــة
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الـذل
كـل
الـذل
فـي
أن
تطعمـا
|
والعـز
كـل
العـز
فـي
أن
تقنعا
|
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واذكــر
جــواب
الحسـن
البصـري
|
لكنزنــــا
وذخرنــــا
علــــي
|
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فمــا
ملاك
الــدين
إلا
بــالورع
|
ومــا
هلاك
الــدين
إلا
بــالطمع
|
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لـــو
كــان
لابــن
آدم
وديــان
|
وكلهـــــا
مــــن
ذهــــب
ملآن
|
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لــم
يمتنـع
عـن
طلـب
الزيـادة
|
ويرغـــب
الســلطان
والســيادة
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ليـس
الغنـى
عـن
كـثرة
الفلـوس
|
ولكــن
الغنــى
غنــى
النفــوس
|
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ألا
اســمعوا
مـا
قـاله
القصـاب
|
قــوم
أجــابوه
لقــد
أصــابوا
|
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تضــرب
فـي
مـوج
الخطـا
وتسـبح
|
فمــا
عســى
تـدفع
عنـك
السـبح
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الــود
والميــل
الـى
المحبـوب
|
يلزمــه
الوفــاق
فـي
المطلـوب
|
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ومــن
تكــن
لــه
صــلات
واصـبة
|
فطاعـــة
لــه
علينــا
واجبــة
|
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من
فاته
القيام
في
الليل
الأخير
|
مـن
كـل
ليـل
فـاته
خيـر
كـثير
|
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مـن
كـان
بـالله
العزيـز
أعرفا
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مـن
كـل
خلـق
اللـه
كـان
أخوفا
|
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دليــل
قــرب
السـاعة
الشـكاية
|
ممــن
لــه
فـي
كيسـه
الكفايـة
|
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فيكــثر
الشــكوى
بملــء
فيــه
|
وعنـــده
واللــه
مــا
يكفيــه
|
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الرفــق
فــي
كــل
الأمـور
زيـن
|
والحمـــق
عيــب
فاضــح
وشــين
|
|
وليــس
للنــاس
بلا
خيــر
جمـال
|
ومـا
لهـم
في
الخير
مطلقاً
مجال
|
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الفقــر
فخـر
وهـو
أن
لا
تشـهدا
|
إلا
إلـــه
العـــالمين
أحـــدا
|
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تمزيقـــك
الفــراء
والأعراضــا
|
يورثـــك
الجفـــاء
والإعراضــا
|
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مــالي
وللمســير
خلــف
العيـر
|
لا
نـــاقتي
فيهـــا
ولا
بعيــري
|
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وكــل
مـا
يحـدث
فـي
المسـتقبل
|
فطبـــق
مـــا
أراده
فــي
الأزل
|
|
بلا
تقـــــــدم
ولا
تـــــــأخر
|
ولا
تبـــــــدل
ولا
تغيـــــــر
|
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دليـــل
إذن
اللــه
فــي
الكلام
|
تــأثيره
فــي
الـروح
والأجسـام
|
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وكـل
مـن
يـزرع
فـي
القلب
الإحن
|
يحصـد
فـي
مسـتقبل
الدهر
المحن
|
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إذا
الفقيـــر
لحمـــاكم
جــاء
|
يرجــو
النـدى
فحققـوا
الرجـاء
|
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مــا
جــاءكم
ليســأل
الــدعاء
|
بـــل
جـــاءكم
ليملأ
الأمعـــاء
|
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إن
الطـــبيب
تــابع
للتجربــة
|
وبــائع
مــا
معـه
فـي
الأجربـة
|
|
الـدين
نصـح
جـا
عـن
ابـن
جابر
|
لكـــل
مســـلم
وكـــل
كـــافر
|
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الخطــأ
المحــض
مــع
استرشـاد
|
خيــر
مــن
الصــواب
باسـتبداد
|
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مســـرة
الانســـان
والمســـاءة
|
نتيجـــة
الإحســـان
والإســـاءة
|
|
وكـــل
مــن
تناقصــت
أمــواله
|
تقهقـــرت
إلـــى
ورا
أحــواله
|
|
كــل
طريــق
قـد
عـدتها
الحجـة
|
فإنهــــا
طريقــــة
معوجــــة
|
|
ومجـــد
كـــل
تـــاجر
جرابــه
|
ومجـــد
كـــل
عـــالم
كتــابه
|
|
فـي
قـرع
بـاب
المقـرف
اللئيـم
|
قلــع
لنــاب
الماجــد
الكريـم
|
|
ليــس
الصـديق
مـن
يقـول
كيسـي
|
بــل
الصـديق
مـن
يقـول
كيسـنا
|
|
ولا
الرفيــق
مــن
يقــول
عيسـي
|
بــل
الرفيـق
مـن
يقـول
عيسـنا
|
|
مـا
الثمـر
اليـانع
تحت
الخضرة
|
أحســـن
منخــط
بهــي
النضــرة
|
|
فصــحِّة
الخــط
حديقــة
الحــدق
|
وثقــة
الــرواة
أروى
مـن
غـدق
|
|
تعمـل
في
القاضي
الخبيث
الرشوة
|
أشــد
مــا
تفعـل
فيـه
النشـوة
|
|
يحــوي
نصــيبه
ومـن
قـد
نصـبه
|
قبـــل
ذوي
فروضــها
والعصــبة
|
|
قــل
للــذي
فــي
رزقـه
إقتـار
|
جــود
النــبي
المصـطفى
مـدرار
|
|
بحـــر
خضـــم
دائمـــاً
زخــار
|
لا
ســــاحل
لــــه
ولا
قــــرار
|
|
وأفضـــل
المكاســـب
الزراعــة
|
تــــوكلا
وبعـــدها
الصـــناعة
|
|
وبعــــدها
تجـــارة
الـــبزاز
|
وأفضــل
الجميــع
سـهم
الغـازي
|
|
لأنــــه
رزق
رســــول
اللــــه
|
وغيــــره
يشــــوبه
التلاهـــي
|
|
كــلٌ
مــن
الطاعــة
والعصــيان
|
فـــي
حقـــه
ســـبحانه
ســيان
|
|
لا
يســقط
الميســور
بالمعســور
|
مطـــرد
فـــي
أكـــثر
الأمــور
|
|
المـرء
إن
أصـلح
مـا
منـه
فسـد
|
أرغــم
مــن
لـه
تصـدى
بالحسـد
|
|
هــي
الـدنيا
اجتمـاع
وافـتراق
|
فلا
كـــــدر
يـــــروم
ولا
رواق
|
|
الأخ
فـــي
اللــه
عزيــزٌ
جــدا
|
إن
تلقـــه
تلــق
عنــا
وجــدا
|
|
فـــواته
خوفــاً
علــى
فــواته
|
ولا
تخــــالفه
إلـــى
وفـــاته
|
|
ومــن
يقــف
علــى
حــدود
الأدب
|
رقـــاه
مــولاه
رفيــع
الرتــب
|
|
ومــن
يـزر
للـه
أربـاب
الرتـب
|
جنـى
مـن
النخيـل
أصـناف
الرطب
|
|
مـا
الشـأن
عندي
في
دوام
الطلب
|
الشـــان
أن
تــرزق
حســن
الأدب
|
|
إن
يعــط
غيــر
الاقربيـن
مـاله
|
فــذاك
أجــر
واحــد
لكــن
لـه
|
|
أجـران
إن
يعـط
القريـب
النفقة
|
أجــر
القرابــة
وأجـر
الصـدقة
|
|
والفضـــل
أن
يقــدم
الاقاربــا
|
وإن
يكونـــوا
معـــه
عقاربــا
|