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نبهنـــا
بكتبـــه
النبهـــاني
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علــى
نفيــس
الــدر
والمرجـان
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كأنهــا
الصـهباء
فـي
الفنجـان
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وابــن
منهــا
كتــب
الجرجـاني
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هيهــات
تنفعـك
الثيـاب
الـبيض
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والقلـب
مـن
ألـم
الـذنوب
مريض
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فـي
كـثرة
النـوم
ضـياع
الـوقت
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وفـــي
ضــياعه
حلــول
المقــت
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عنــدك
دينــار
وتطلــب
العمـل
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مــاذاك
إلا
عــن
جنــون
وخبــل
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كيـــف
ظـــل
العــود
يســتقيم
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والعـــود
أعــوج
وفيــه
جيــم
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معــــتزلي
ورجــــل
مجوســــي
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تنــــاظرا
فقـــال
للمجوســـي
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لــمَ
لــم
تســلم
فقــال
عنــي
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فــإن
ربــي
لــم
يــرده
منــي
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فقــال
بــل
أراد
لكــن
ثبطــك
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عنــه
أبــو
مــرة
حيــن
خبطـك
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فقــال
إن
يقهــر
لــه
ويغلــب
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إذن
أكــن
مــع
الشـريك
الأغلـب
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فتــاب
عــن
مــذهبه
المعـتزلي
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وقــال
قـد
قلـت
لـه
وقـال
لـي
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أريـــد
دنــوه
ويريــد
بعــدي
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وفــي
قلــبي
لــه
شــوق
شـديد
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ولكـــن
إن
أرى
خيـــراً
فــإني
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ســأترك
مــا
أريـد
لمـا
يريـد
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قــل
للــذي
يصــيب
مـا
يكفيـه
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لا
تشــتغل
بــالفكر
والوســواس
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ومـــن
لـــه
كِــنٌ
يكــن
فيــه
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لا
تضـــر
بالأخمـــاس
الأســـداس
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والــق
عــن
قلبــك
مـا
تلقيـه
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فيــه
مــن
الأوخــام
والأدنــاس
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لا
تبــد
منــه
ضــد
مـا
تخفيـه
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فـــإنه
نـــوع
مـــن
الإلبــاس
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وغيظـــك
اكظمـــه
ولا
تشـــفيه
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فالكـاظمون
الغيـظ
أهـل
البـاس
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واخــتر
صـديق
الصـدق
واصـطفيه
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للـــدين
والـــدنيا
وللإينــاس
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ومــن
طــوى
لســانه
فــي
فيـه
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فمــا
عليــه
بعــده
مــن
بـاس
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طــوبى
لمــن
شــغله
مــا
فيـه
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مــن
العيـون
عـن
عيـوب
النـاس
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كمـــا
تــدين
أيهــا
الانســان
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مــن
خيــر
أو
شــر
بــه
تـدان
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لا
يســأم
الإنسـان
مـن
خيـر
وإن
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مســـه
الشـــر
فـــإنه
يجـــن
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محبــة
اللــه
العظيــم
الشـان
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إرادة
الإنعـــــام
والإحســــان
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وقيـل
فـي
المعنـى
هـي
الإنعـام
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وفضـــله
الفـــائض
والإكـــرام
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النـــاس
خمســـة
إذا
حســبتهم
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ففــارسٌ
يــوم
الـوغى
ذو
درقـه
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يجــول
فــي
ميــدانها
مبـارزاً
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إذا
رأى
صـــف
القتــال
خرقــه
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ومحســـن
ينفــق
جــوداً
مــاله
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جميعـــــه
ذهبــــه
وورقــــه
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وعـــالم
يـــدرس
فــي
كتــابه
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يســـــرد
ورقـــــة
فورقــــة
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يفيــد
مـا
اسـتفاده
مـن
غيـره
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مراعيــاً
وجـه
الـذي
قـد
خلقـه
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وحـــاكم
أقــام
فينــا
عــدله
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فــي
قلبــه
للعــالمين
شــفقة
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وعابــد
يقـوم
فـي
جنـح
الـدجى
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يشـكو
الجـوى
مـن
النـوى
وحرقه
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فهــــؤلاء
خيرهــــم
وغيرهـــم
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لا
همـــو
لحــم
ولا
هــم
مرقــه
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بــل
همــج
مـن
همـج
إذا
مشـوا
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يضــيقوا
علــى
التقــي
طرقــه
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يُحـرم
بيـع
الخمر
في
الشرع
كما
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يحـــرم
شــربها
بنــص
أحكمــا
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لأنهــا
كمــا
أتــى
فـي
الخـبر
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أم
الخبـــائث
وأصـــل
الضــرر
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ومثلهــا
فـي
ذاك
بيعـك
العنـب
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لمــن
يريــد
عصــره
فليجتنــب
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لأنـــــه
وســــيلة
لشــــربها
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والنــار
قــدتحرق
مـن
بقربهـا
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يقيســما
قلــت
صــحيح
النظــر
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بالنــار
أصــلها
صـغير
الشـرر
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وكــل
مـا
أدى
علـى
الشـر
فشـر
|
ومــن
يقــل
خلاف
مـا
قلـت
فشـر
|
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فــي
مكـة
أم
القـرى
خيرالقـرى
|
صـدقا
ومـا
كـان
حـديثا
يفـترى
|
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منها
بدا
نور
الهدى
ماحي
الردى
|
خيـر
الأنـام
المصطفى
بحر
الندى
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