|
النــاس
فـي
لغـو
ولهـو
وطـرب
|
إذا
دعوا
للخير
جدوا
في
الهرب
|
|
واشـتغلوا
بـالقِرب
عـن
القُـرب
|
والـدين
إن
ذكرته
قالوا
انخلي
|
|
عـن
جهلهـم
ولهـوهم
ما
انفكوا
|
وعــروة
الـدين
القـديم
فكـوا
|
|
إن
قلــت
صـلوا
خمسـكم
وزكـوا
|
أموالكم
تزكو
لكم
قالوا
انخلي
|
|
أحـوال
أهـل
عصـرنا
كمـا
تـرى
|
سـاروا
ولكـن
سـيرهم
إلـى
ورا
|
|
لا
تـذكر
الـدين
لهم
بين
الورى
|
فالـدين
إن
ذكرته
قالوا
انخلي
|
|
إذا
أصـابوا
الشـاة
والبعيـرا
|
وركبــوا
البغــال
والحميــرا
|
|
ولبســوا
الــديباج
والحريـرا
|
فالـدين
إن
ذكرته
قالوا
انخلي
|
|
أو
رقصــوا
فصــفقوا
فـأعجبوا
|
مـن
كـان
فيهـم
حاضراً
وأطربوا
|
|
وشـربوا
الصـهباء
حـتى
طربـوا
|
فالـدين
إن
ذكرته
قالوا
انخلي
|
|
أو
ركبـــوا
مطيــة
الخيانــة
|
واتخـــذوها
بـــدل
الأمانـــة
|
|
بطانـــة
وبئســـت
البطانـــة
|
فالـدين
إن
ذكرته
قالوا
انخلي
|
|
وعــاؤهم
مـن
عـرض
الـدنياملي
|
لكنــه
مـن
عنـبر
الـدين
خلـي
|
|
فــذاك
مــذكور
لهـم
وذا
سـُلي
|
فـان
تـذكرهم
بـه
قالوا
انخلي
|
|
إنــا
روينـا
عـن
رسـول
اللـه
|
الخلــق
كلهــم
عيــال
اللــه
|
|
فــأيهم
أكــثر
نفعــاً
كانــا
|
أرفعهــم
يــوم
الجـزا
مكانـا
|
|
فــأيهم
أكــثر
نفعــاً
كانــا
|
أكملهــــم
بربـــه
إيمانـــا
|
|
فــأيهم
أكــثر
نفعــاً
كانــا
|
أثقلهـم
يومـا
الجـزاء
ميزانا
|
|
فــأيهم
أكــثر
نفعــاً
كانــا
|
أعمهــــم
لخلقـــه
إحســـانا
|
|
أكــثرهم
نفعــاً
رســول
اللـه
|
النعمـة
العظمـى
عظيـم
الجـاه
|
|
فاقـدر
إذن
قدر
النبي
المصطفى
|
وقـدر
مـن
فـي
إثـره
قد
اقتفى
|
|
الخلفـــاء
الراشــدون
بعــده
|
الحـــافظون
شـــرعه
وعهـــده
|
|
هــم
نقلــوا
آثــاره
ودونـوا
|
هــم
وطــدوا
ومهـدوا
وهونـوا
|
|
ترتيبهمــف
ي
الفضـل
كـالخلافه
|
بـــذا
أديـــن
لا
أرى
خلافـــه
|
|
لكــن
أحــب
المرتضــى
عليــا
|
أكـــثر
وهـــو
واجــب
عليــا
|
|
لمـا
حـوى
من
المزايا
الفاخرة
|
ففيـه
نـافس
مـن
تشـا
وفـاخره
|
|
قـد
قـال
طـه
المصـطفى
النـبي
|
أقفــــاكم
أفقهكــــم
علـــي
|
|
فـإن
تـرد
مـا
فيـه
مـن
مزيـة
|
فراجـــع
القصــيدة
العينيــة
|
|
هـم
غرسـوا
وغيرهم
يجني
الثمر
|
أكـــــــــثرهم
غرســــــــاً
|
|
ومثلــه
ابـن
بنتـه
ذاك
الأغـر
|
عـمِّ
الـورى
بعـدله
بحـراً
وبـر
|
|
وأمســكت
ذئابهــا
عـن
الغنـم
|
مقــدماً
مــن
المصــالح
الأهـم
|
|
مقــدماً
مصــالح
الــدين
علـى
|
مصـالح
الـدنيا
لـذا
قدراً
علا
|
|
شـرط
الأميـر
أن
يكـون
فـي
عنا
|
والنـاس
منـه
فـي
رخـاء
وهنـا
|
|
مثــل
أميــر
المـؤمنين
عمـرا
|
عــم
الــورى
بعــدله
وغمــرا
|
|
يطعمهــــم
وإنــــه
يجــــوع
|
يكســــوه
وثــــوبه
مرقـــوع
|
|
يأتــدمون
اللحــم
وهـو
أدمـه
|
الزيـت
حـتى
اخضـر
منـه
جسـمه
|
|
لـم
يـأل
جهـداً
فـي
صـلاح
الأمة
|
فكــم
وكــم
أزاح
عنهــم
غمـة
|
|
كــان
يقاســي
كـل
صـعب
قاسـي
|
يبغـي
رضـا
اللـه
ونفـع
الناس
|
|
يجعـل
مـا
يرضـي
الإلـه
والورى
|
أمــــامه
وحـــظ
نفســـه
ورا
|
|
بنفســـه
يعـــول
كـــل
كَـــلَّ
|
تواضـــعاً
مــع
قــدره
الأجــل
|
|
كـــان
يعـــس
ليلاً
المدينـــة
|
ويخــدم
المســكين
والمسـكينة
|
|
كــان
يفــر
مــارد
الشــيطان
|
مــن
دربــه
ليــس
لـه
سـلطان
|
|
كــم
آيــة
وافـق
فيهـا
اللـه
|
كقــــوله
مخاطبــــاً
لطــــه
|
|
إحجـــب
نســـاءك
المطهـــرات
|
واتخــذوا
مــن
جملــة
الآيـات
|
|
قــد
ســخر
اللـه
لـه
الهـواء
|
والنــار
والـتراب
ثـم
المـاء
|
|
أنفعهـا
المـاء
الرحيق
السلسل
|
وإن
أقواهــا
الهـواء
المرسـل
|
|
قصـــته
مــع
الأميــر
ســارية
|
فاشــية
بيــن
الـورى
وسـارية
|
|
وكـــم
وكــم
منقبــة
ســواها
|
علــى
مــدى
الأيـام
لا
ننسـاها
|
|
هــذا
الــذي
يسـتوجب
المحبـة
|
وقـد
يـرى
التـبرير
مـن
أحبـه
|
|
يكفيــك
منهــا
أنَّ
أرض
الشـام
|
جعلهــا
وقفــاً
علــى
الأنــام
|
|
كــانت
لــه
فراســة
لا
تخطــي
|
يعـدل
فـي
حـال
الرضـا
والسخط
|
|
أشـــرقت
الأرض
بنـــور
ربهــا
|
ليمكــن
انتفــاع
أهلهـا
بهـا
|
|
وإنّ
مـــن
آيـــاته
الكبـــار
|
منـــامكم
بالليــل
والنهــار
|
|
وفــي
اختلاف
الليــل
والنهـار
|
آيـــات
حــق
لأولــي
الأبصــار
|
|
وفــي
طلــوع
الشـمس
كـل
يـوم
|
فـــوائد
شـــتى
لكـــل
قــوم
|
|
فـي
الصيف
قالوا
تنضج
الثمارا
|
وفــي
الشــتا
تســخن
الآبـارا
|
|
تبــدو
منيــرة
مـع
ارتفاعهـا
|
مسـرعة
لـم
تعـي
فـي
إسـراعها
|
|
تنظرهــــا
تظنهـــا
صـــغيرة
|
لكنهــا
فــي
فعلهــا
كــبيرة
|
|
تنظرهـــا
تظنهـــا
لا
تحـــرك
|
وإنهــا
فــي
ســيرها
لا
تـدرك
|
|
كــم
فرســخاً
قـط
قـدعت
وميلا
|
عنــد
سـؤال
المصـطفى
جـبريلا
|
|
واللــه
واللـه
الـذي
أنشـاكم
|
ثــم
علــى
أقــدامكم
أمشـاكم
|
|
إن
عــــذاب
ربكـــم
لواقـــع
|
فمــا
لـه
بعـد
الوقـوع
دافـع
|
|
يــوم
تمــور
الســموات
مـورا
|
ثــم
تســير
الراســيات
سـيرا
|
|
يـــوم
تكــون
الارض
كــالفراش
|
ثــم
يكــون
النــاس
كـالفراش
|
|
يـوم
تـدنو
الشـمس
مـن
رؤوسهم
|
كإصــبع
فلا
تســل
عــن
بوسـهم
|
|
يــوم
يفــر
المـرء
مـن
أخيـه
|
وأمـــه
أيضـــا
ومــن
أبيــه
|
|
والشـمس
تـدنو
مـن
رؤوسهم
فلا
|
يكـــون
بينهــم
وبينهــا
خلا
|
|
إلا
يسـيراً
قـدر
ميـل
المكحلـة
|
يـوم
شـديد
الهـول
لا
مـرد
لـه
|
|
يـــوم
شــديد
كربــه
وهــوله
|
مــا
أحــد
يســمع
فيـه
قـوله
|
|
يـــوم
شــديد
كربــه
وهــوله
|
مــا
احــد
يحمــل
عنـه
ذنبـه
|
|
يــــومئذٍ
يظهــــر
للكفـــار
|
وغيرهــــم
عظمـــة
الجبـــار
|
|
يــود
كــل
منهــم
أن
ينصــرف
|
ولـو
إلـى
الجحيـم
حـتى
لا
يقف
|
|
فبينمــا
هـم
فـي
أشـد
الكـرب
|
لــم
يــدوا
لمخلــص
مــن
درب
|
|
إذ
جــاءهم
رحمــة
ربهـم
بهـم
|
حـتى
يزيـل
مـا
بهـم
من
كربهم
|
|
هــو
الحـبيب
الشـافع
المشـفع
|
هــو
الــذي
لكــل
كـرب
يـدفع
|
|
يشــفع
فيهــم
فيــزول
كربهـم
|
وقــد
بــدا
لكـل
قـوم
دربهـم
|
|
فـــدرب
كـــل
مـــؤمن
تقـــي
|
الـــى
جـــوار
ربــه
العلــي
|
|
ودرب
كــــل
كــــافر
شــــقي
|
إلــى
لظــى
وقعــر
جــب
غــي
|
|
فيُحــــلُّ
عنهــــم
الوثــــاق
|
بجــــاهه
ويرفـــع
الخنـــاق
|
|
فزمــــرة
تســــاق
للجنـــان
|
وزمــــرة
تســـاق
للنيـــران
|
|
فــذلكم
فصــل
القضـاء
بينهـم
|
وعنــد
ذاك
يعلمــون
أيـن
هـم
|
|
وهـذه
الشـفاعة
العظمـى
الـتي
|
يقــول
فيهـا
يـا
إلهـي
أمـتي
|
|
واشــتهرت
بأنهـا
فصـل
القضـا
|
واسـتعت
مـن
بعـد
ماضاق
الفضا
|
|
قــد
بقيــت
لـه
شـفاعات
أخـر
|
أربعـــة
ليــوم
حشــر
تــدخر
|
|
بيانهـــا
فـــي
كتـــب
الكلام
|
يضــيق
عــن
تفصــيلها
نظـامي
|
|
تــردد
الانســان
فــي
الآثــار
|
يـــوجب
بعدالــدار
والمــزار
|
|
بـالله
فاسـتعن
وبـالله
استدل
|
فــأنت
إن
فعلــت
هـذا
لا
تضـل
|
|
لا
تطلبــن
بيـن
الـورى
ظهـورا
|
إن
الظهــور
يثقــل
الظهــورا
|
|
ينفــع
كــلَّ
أحــد
مــا
أعطـى
|
وإن
يكــن
معطـى
ذئابـاً
معطـا
|
|
إن
لـم
تكـن
صـاحب
عرنيـن
أشم
|
كنـت
لريـح
الـذل
والهوان
أشم
|
|
تجعــل
مــن
نهضــتك
وقومتــك
|
أن
تجمـع
المـال
لبعـل
زوجتـك
|
|
مــودة
النــاس
لكــم
قريبــة
|
مــالم
يصــبكم
داء
أو
مصـيبة
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
واتقــوا
اللـه
فهـذا
الضـابط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
واتقــوا
اللــه
ولا
تغــالطوا
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يســتوي
القاعــد
والمرابـط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يسـتوي
المقسـط
ولا
والقاسـط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يســتوي
الصـاعد
لا
والهـابط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يســتوي
القريـب
لا
والشـاحط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يســتوي
القـابض
لا
والباسـط
|
|
قوموا
اصبروا
وصابروا
ورابطوا
|
لا
يسـتوي
الراضـي
بنا
والساخط
|
|
فــرق
بعيــد
بيــن
ذا
وذاكـا
|
إن
كنــت
لا
تـدري
فسـل
أباكـا
|
|
العقــل
بـالآداب
ينمـو
مثلمـا
|
ينمـو
نبـات
الارض
إن
يُسقى
بما
|
|
إن
نــزل
القضـا
وجـاء
القـدر
|
يــذهب
العقــل
ويعمـى
البصـر
|
|
لا
خيـر
فـي
يـوم
بلا
علـم
يمـر
|
فـي
الذوق
لا
يحلو
لنا
لكن
يمر
|
|
مـرارة
الـوقت
أمتهـا
إن
تشـا
|
بعســل
العلـم
وشـيء
مـن
نشـا
|
|
العلـم
خيـر
مـن
حطـام
المـال
|
لنفعــه
فــي
الحـال
والمـآله
|
|
يــا
قــارئاً
مواقــع
النجـوم
|
وقعــت
فــي
كنـز
مـن
العلـوم
|
|
تغنيــك
عــن
شـيخ
مـرب
مرشـد
|
وعـــن
مغـــنٍ
مطــرب
ومنشــد
|
|
حــزب
الإمــام
النــووي
جنــة
|
مــن
شــر
خلـق
إنسـه
والجنـة
|
|
قــارئه
فــي
الصـبح
والمسـاء
|
ورد
مـــع
الحضــور
والصــفاء
|
|
قـد
قـال
بعـض
العـارفين
فيـه
|
لا
يســــتطيع
أحـــد
يـــؤذيه
|