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ألا
مـا
لـذا
الليـل
لا
يصبح
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أمــا
كــل
ليـل
لـه
مصـبح
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ومـــا
لكـــواكب
جــوزائه
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رواكــد
فـي
الجـو
لا
تـبرح
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ومــا
لــدياجيه
اســحنككت
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بحيــث
الــدياجيّ
لا
تمصــح
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ومــا
لليــالي
إذا
أحسـنت
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بلـــق
بافقـــاده
تقبـــح
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أرى
النــاس
شـراء
مأكولـة
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للاحـــداث
لكنهـــا
تجلــح
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ولـــو
أن
حيــا
بــإدراكه
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جميــع
العلا
بالبقـا
يفلـح
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لكـان
ابـن
ايـاه
ايـاه
أي
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وربــى
ولكــن
مـن
المفلـح
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فـتى
الخمـس
لم
تبق
ممدوحة
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لــدى
الخمـس
الابهـا
يمـدح
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وفـــيّ
تقـــيّ
نقـــيّ
نــه
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رضـــى
ثقــة
ملــك
جحجــح
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جـواد
جـواد
غـداة
الجـواد
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مـن
اسـمائه
الفاحش
الشحشح
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حليــمٌ
إذا
احللـم
مستحسـن
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جهــولٌ
إذا
الحلـم
مسـتقبح
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حمــولٌ
بحــال
بهــا
حـاتم
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علـى
الضـيف
والجار
يقرندح
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طويــل
يــد
غيــر
دحـداحه
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لئيــم
وقـد
يلـؤم
الدحـدح
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أبعـد
الكريـم
النثا
ترنجى
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عـــواقب
أطهارهــا
منكــح
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لســيان
مــن
بعــده
مـونثٌ
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ومـــن
بـــذكورتها
تطفــح
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لئن
كـان
فقـد
العلا
دايعـا
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إلـى
النـوح
فلتنـح
النـوّح
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ولكـن
رضـانا
بحكـم
المليك
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صــلاحٌ
وفــي
مثلــه
أصــلح
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لئن
أودعــوه
جــثى
ملحــد
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بــه
ظــل
ممسـاه
والمصـبح
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وأصــبح
منطويــا
بالضـريح
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مربّــا
بـه
السـيد
المضـرحُ
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فقـد
كـان
والأرض
يمسـى
بها
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ومــن
أي
الأرض
بهــا
يصـبح
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وقـد
كـان
تطوى
لكسب
العلا
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بـه
المهمـة
الاشـدح
الشّودحَ
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فمـا
وجـدُ
ظمئان
حـاد
إلـى
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قـــرورٍ
قرارتـــهُ
أبطـــحُ
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أشـد
مـن
أوجاعنـا
مـذ
نعى
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فـتى
الخمـس
نـاع
ولا
يفـرح
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أقــول
إذ
اخــبرني
مخــبر
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بمـا
قـال
بعض
الأعادي
لحوا
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الا
أيهـا
الشـامتون
اخسئوا
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وموتــوا
بغيظكـمُ
واكلحـوا
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ويـا
أيها
الشامتون
ارغموا
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وموتوا
بداء
الخرى
وادنحوا
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وايـاكم
أيّـاكُم
ان
تفرحـوا
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بــرزء
محمــد
أو
تمرحــوا
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عليكـم
فـذا
البحر
فلتغطوا
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بحيــث
اليهــودي
لا
يســبح
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فــان
لنــا
غيــره
ســادةً
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بهـم
مـن
دجى
الخطب
يستصبحُ
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وجــوهم
مــن
بنــي
عــامر
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بــدورٌ
بـدور
الـدجى
تفضـح
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سـقى
اللّـه
ذاك
الصدى
ديمة
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مـن
الـروح
لـم
تـك
تستوكح
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سقى
اللّه
ذا
القبر
ما
شاءه
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مـن
الرحمـة
السـحب
الدلّـح
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وكــان
لـه
قـبره
قـبر
مـن
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لـه
القـبر
مـن
بيتـه
أفسح
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وكــان
لـه
مـوته
مـوت
مـن
|
لـه
المـوت
مـن
عيشـه
اروح
|
|
وعنـه
اعـف
واصفح
الهي
فكم
|
عـن
العبـد
تعفـو
وكم
تصفح
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