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بـدت
تختـال
فـي
حُلل
الجمالِ
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وجــادت
بالزيـارة
والوصـال
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تميــس
فلا
يعادلهــا
قضــيب
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وإن
ترنــو
تـداعب
بالنصـال
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بمبســمها
لَعَمــرُ
أبيــك
درٌّ
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وفــي
أعماقهـا
نبـع
الـزلالِ
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وخصــر
يســتبيك
إذا
تــولت
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كغصـن
البـان
في
كُثب
الرمالِ
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تبــدّت
كالقضـيب
علـى
كـثيب
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وجلّـت
كـالمنيرة
في
الليالي
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فقمـت
أداعـب
الوجنـات
منها
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وألثــم
ثغرهـا
حكـي
اللآلـي
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وأهصــرُ
غصــنها
ضـماً
ولمّـاً
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وألهــو
بـاليمين
وبالشـمال
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ومـن
خلـق
العفـاف
لنا
رقيب
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بطهـر
الحـب
فـي
حسـن
الخلال
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وقـد
غـاب
الرقيب
وطاب
أنسي
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وطيـر
الحـب
يصـدح
بامتثـال
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تقـول
أراك
تظهر
لي
اشتياقاً
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وتفعــل
كــالمودع
للرحــال
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فقلـت
لهـا
رويـدك
إن
قلـبي
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وحـبي
لـم
يكـن
يومـاً
بسالي
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ولكنــي
عزمــت
وفــيّ
عــزمٌ
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ليهــزأ
بالأســنّة
والعـوالي
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سـئمت
مـن
المقـام
وكـل
شيء
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إذا
مــا
دام
يُسـأم
لا
محـال
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سأضـرب
فـي
الحياة
بسهم
جدي
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ونحظــى
بالمســرة
والوصـال
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وأرجـع
إن
يشا
الباري
قريباً
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إليـك
لنبتنـي
صـرح
المعالي
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فرقــرق
لؤلـؤ
فـي
مقلتيهـا
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وصـاحت
آه
مـن
مـرّ
الليـالي
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أتـترك
يـا
حبيب
الروح
قلباً
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يكـاد
يـذوب
مـن
شـوقٍ
لحالي
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وتسـلوني
وأنـت
نعيـم
روحـي
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ولا
ترعـى
المـودة
أو
تبـالي
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ليحفـــظ
الإلـــه
بكــل
أرض
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ويرزقـك
السـلامة
فـي
الكمال
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وجمنـا
لـم
نحـر
قـولاً
ولكـن
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نُهير
الدمع
فاض
على
التوالي
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ولاح
الصـبح
مـن
تحـت
الثريا
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كمـا
لاح
المشـيب
بعيـن
قـال
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فيــالله
كــم
ذابــت
قلـوب
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وكــم
ســالت
دمـوع
كـاللآلي
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ليـوم
السـبت
مـن
شوال
قمنا
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لأربـع
قـد
خلـون
وعشـر
تـال
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ركبنـا
اللجّـة
الزرقاء
نحدو
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وفوضــنا
الأمـور
لـذي
الجلال
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وسـار
الفلـك
يمخـر
في
عباب
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تقـاذفه
الجنـوب
مـع
الشمال
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ولاح
لنـا
الكـويت
علـى
مغيب
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وقـد
جزنـا
بـه
وقـت
الزوال
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ومـن
حـالول
سـرنا
بانتبـاه
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ومجرانـا
السـماك
بكـل
حـال
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وهبـت
عنـد
نصـف
الليـل
ريح
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وهـبّ
الجمـع
يمسـك
بالحبـال
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يغطـي
المـوج
منّـا
كـل
شـيء
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ويظهــر
بالعنـاد
ولا
يبـالي
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وصـوت
النوخـذا
يـأتي
إلينا
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كما
الوديان
تهدر
في
الجبال
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وعصـف
المـوج
شـتتنا
فبتنـا
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كريــش
لا
يقــر
علــى
مجـال
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بلاد
قـد
زهـا
العمـران
فيها
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وشــيدت
بــالرقيّ
وبالجمـال
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تــرى
بيـض
الأوانـس
سـارحات
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يشـابهن
الغصـون
علـى
رمـال
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نشـرن
غـدائراً
وسـَفرنَ
حـوراً
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وكشــفن
الوجـوه
عـن
اللآلـي
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