|
هكــذا
هرمــسٌ
أتــم
الخطابــا
|
وتــوارى
إلــى
الألمــب
وآبــا
|
|
فعـــدا
الشــيخ
راجلاً
وأنابــا
|
|
إيذيوســاً
فظــل
عنــد
العجـال
|
عانيــاً
فــي
جيادهـا
والبغـال
|
|
ومضــى
يقصــد
ابـن
فيلا
فألفـا
|
ه
تنحــى
وعنـه
أنـأى
الصـحابا
|
|
مـا
لـديه
غيـر
الفـتى
أفطميـذ
|
وكــــذا
فـــرع
آرسٍ
القميـــذ
|
|
كــان
علـى
زاده
ورشـف
النبيـذ
|
|
قــام
والــزاد
لا
يــزال
لـديه
|
وهمـــا
قائمــان
بيــن
يــديه
|
|
كلهــم
مـا
رأوه
فانسـل
وانصـب
|
ب
علــى
ركبـتي
أخيـل
انصـبابا
|
|
ويـديه
اللـتين
كـم
مـن
فتىً
جل
|
مــن
بنيــه
أبادتـا
قبـل
قبـل
|
|
دهشـوا
عنـدما
علـى
الفور
أقبل
|
|
دهشــة
القـوم
مـن
وفـود
غريـب
|
ســاقه
فــادح
القضـاء
المريـب
|
|
قـــاتلاً
مــن
بلاده
فــر
يلجــا
|
لــديار
ارمــرئٍ
تعلــى
جنابـا
|
|
فأجــالوا
الأبصــار
باســتعجاب
|
وهــو
ألقــى
خطــابه
بـاكتئاب
|
|
يــا
ابــن
فيلا
مقــرب
الأربـاب
|
|
أذكـر
اكـر
بشـيبتي
والـداً
لـك
|
درك
العجــــز
آه
مثلـــي
أدرك
|
|
رب
جــــــارٍ
أصــــــابه
ببلاءٍ
|
وهـو
لا
عـون
صـد
عنـه
المصـابا
|
|
إنمــا
للســرور
يلقــى
سـبيلا
|
ذاك
أن
أبلغـــوه
حيّـــاً
أخيلا
|
|
فيرجـــي
لـــه
معـــاداً
جميلا
|
|
ليــراه
مـن
بعـد
طـول
اغـتراب
|
وأنـــا
آه
ألتظـــي
بالتهــاب
|
|
كـم
فـتىً
باسـلٍ
بـإليون
لي
كان
|
فطــرّاً
بــادوا
وأضـحوا
ترابـا
|
|
عنــدما
جــاءت
الأخــاءة
بحـرا
|
حسـبوا
لـي
خمسـين
عـدّاً
وحصـرا
|
|
مــن
نســاءٍ
شـتّى
وتسـعة
عشـرا
|
|
عصــبةً
إخــوةً
أشــقاء
كــانوا
|
جلهــم
بالجهـاد
للحتـف
دانـوا
|
|
واحـــدٌ
ظـــل
منهـــم
بــذيادٍ
|
عـن
سـرانا
يقـي
البلاد
الخرابا
|
|
ذاك
هكطــور
مــن
قتلـت
أخيـراً
|
وهــو
يحمــي
ذمـاره
والعشـيرا
|
|
ذاك
مــا
سـاقني
هنـا
مسـتجيرا
|
|
فـأممت
الأسـطول
فـي
ذا
السـبيل
|
ولقــد
جئت
بالفكــاك
الجزيــل
|
|
فسـراة
العلـى
أخيـل
اتقـى
وار
|
فـق
بحـالي
واذكر
أباك
اهتيابا
|
|
لا
جـدير
فـي
الخلق
بالرفق
مثلي
|
لا
ولا
فـي
الـورى
امـرؤٌ
ذل
ذلـي
|
|
هــذه
الكــف
أس
بؤســي
وخـذلي
|
|
وبهـا
ابنـي
أضـحى
قـتيلاً
جديلا
|
وأنــا
قــد
قبلتهــا
تقــبيلا
|
|
فبــذا
الشـيخ
هـاج
مـدمع
آخـي
|
ل
لــذكرى
أبيــه
فيلا
اكتئابـا
|
|
فـــبرفق
أنــآه
عنــه
وأجــرى
|
عــبراتٍ
سـحت
علـى
الفـور
حـرى
|
|
فكلا
القيميـــن
نـــاح
لــذكرى
|
|
ذا
لهكطــــور
ســــاجداً
لأخيلا
|
وأخيـــلٌ
فطرقــل
يبكــي
وفيلا
|
|
لبثـــا
ينحبـــان
ثمــة
حــتى
|
لهمـا
اهـتزت
السـقوف
انتحابـا
|
|
وأخيـــلٌ
لمـــا
روى
بنحيبـــه
|
غلــه
قــام
مغضـياً
عـن
كروبـه
|
|
أنهــض
الشــيخ
رافقـاً
بمشـيبه
|
|
ولـــه
وجــه
الخطــاب
فقــالا
|
إي
نعــم
سـامك
القضـاء
وبـالا
|
|
كيـف
قـل
لم
تخف
فجئت
إلى
الفل
|
ك
وحيــداً
لمــن
بنيـك
انتابـا
|
|
لـك
قلـبٌ
مثـل
الحديـد
الصـليب
|
فـانهض
اجلـس
ولنبـق
طي
القلوب
|
|
غصــص
النفــس
لاشـتداد
الخطـوب
|
|
ليــس
يجــدي
بكاؤنـا
والنحيـب
|
فالرزايــا
لكــل
مــرءٍ
نصــيب
|
|
ليـس
يخلو
سوى
بني
الخلد
من
هم
|
مٍ
ولكــن
لنـا
أعـدوا
العـذابا
|
|
فبأعتـــاب
زفـــس
قارورتـــان
|
ذي
لخيـــرٍ
وذي
لشــر
الهــوان
|
|
فيهمـــا
كــل
قســمة
الإنســان
|
|
فالــذي
منهمــا
مزيجـاً
أنـالا
|
زفـس
يلقـى
خيـراً
ويلقـى
وبالا
|
|
والــذي
لا
ينــال
إلا
مــن
الـش
|
شـر
فتنتـابه
الخطـوب
انتيابـا
|
|
بطــــواه
يطـــوي
البلاد
كليلا
|
تائهــاً
فــي
عـرض
الفلاة
ذليلا
|
|
مـن
بنـي
الخلـد
والورى
مخذولا
|
|
فلفيلا
الأربــاب
خيــر
الهبــات
|
أجزلـوا
مـذ
بـدا
لهـذي
الحياة
|
|
فـاق
جاهـاً
وثـروةً
وعلـى
المـر
|
ميــد
أضـحى
قيلاً
مطاعـاً
مجابـا
|
|
ولئن
كــان
فانيــاً
وابـن
فـان
|
أنكحــــوه
إلاهـــةً
ذات
شـــان
|
|
وعلـــى
ذا
منـــوه
بالأشـــجان
|
|
بحمــاه
لــم
يعــط
قـط
بنينـا
|
بعـــده
فـــي
بلاده
يحكمونـــا
|
|
فرعــه
واحــدٌ
سيقضــي
قريبــاً
|
غيــر
مجــدٍ
مشـيبه
حيـن
شـابا
|
|
كيــف
أجـدي
وقـد
شـططت
ديـارا
|
وبــإليون
قمــت
والهــول
دارا
|
|
لـــك
أهمــي
وآلــك
الأكــدارا
|
|
وكــذا
أنـت
قـد
روى
الراوونـا
|
لــك
يــا
شـيخ
طالعـاً
ميمونـا
|
|
كنــت
ذا
دولــةٍ
ومــالٍ
وأبنـا
|
ءٍ
بشــرخ
الصـبا
سـموا
أنجابـا
|
|
مـــن
ذرى
لســبسٍ
مقــر
مقــار
|
لفريجــا
لجــرف
هــذي
البحـار
|
|
سـدت
جـم
القـوى
رفيـع
المنـار
|
|
إنمـا
منـذ
ذا
القتـال
الوبيـل
|
لا
تـــرى
غيــر
قاتــلٍ
وقتيــل
|
|
فاعتصـم
بـالعزاء
لا
تجعـل
الضي
|
يــم
أسـىً
فيـه
تقطـع
الأحقابـا
|
|
ليـس
يجـديك
حـزن
هكطـور
نفعـا
|
لـــن
تقيمنــه
بــذرفك
دمعــا
|
|
رب
خطــبٍ
إليـك
مـن
بعـد
يسـعى
|
|
قــال
يحكـي
فريـام
آل
الخلـود
|
يـا
ابـن
فيلالا
لا
تـدعني
للقعود
|
|
إن
هكطــور
فــي
خيامــك
لا
قـب
|
ر
يـواريه
فـي
الـتراب
احتجابا
|
|
أعطنيـــه
حـــتى
بعينــي
أراه
|
وجزيــل
النفــائس
اقبـل
فـداه
|
|
فبهــا
قــد
أتيــت
أبغـي
شـلاه
|
|
منـك
يـا
مـن
حيـا
قد
استبقاني
|
أنظــر
النــور
سـاطعاً
بالأمـان
|
|
فبهــا
اهنــا
عسـاك
ترجـع
للأو
|
طـان
مـن
بعـد
ما
نأيت
اغترابا
|
|
عنــد
هــذا
أخيـل
أحـدق
شـزرا
|
قــال
يـا
شـيخ
لا
تغظنـي
قسـرا
|
|
لــك
هكطـور
سـوف
يعطـي
فصـبرا
|
|
بنـت
شـيخ
البحـار
أمـي
أتتنـي
|
مــن
لــدى
زفـس
أمـره
بلغتنـي
|
|
وأنـــا
عـــالمٌ
بـــأن
إلاهــاً
|
بــك
حـتى
الأسـطول
جـاء
فغابـا
|
|
أي
مــرءٍ
ولــو
بشــرخ
الشـباب
|
يخــرق
الجيــش
قاصـداً
أبـوابي
|
|
عـن
عيـون
العيـون
طـي
الحجـاب
|
|
أو
أزلاجنــــا
لــــه
يتهيـــا
|
دفعهـا
اصـمت
أن
شـئت
تلبث
حيا
|
|
لا
تهجنــي
فزفــس
أعصــي
ولا
أر
|
عــى
ذليلاً
همــا
وشـيخاً
مصـابا
|
|
جــزع
الشــيخ
للوعيــد
مطيعـا
|
وأخيــلٌ
كــالليث
هــب
ســريعا
|
|
غـــادر
مـــن
رفــاقه
تبعــان
|
بعــد
فطرقــل
أقــرب
الفتيـان
|
|
أفطميــذٌ
وألقميــذ
أخـو
العـز
|
م
جميعـاً
عـدوا
وجـازوا
البابا
|
|
ومـن
المركـب
الريـاش
اسـتقلوا
|
|
غيــر
برديــن
شــائقين
جمـالا
|
وشـــــعارس
مزخرفـــــس
يتلالا
|
|
رام
آخيـــل
أن
يكفـــن
هكطــو
|
ر
بهـا
عنـد
مـا
يتيـح
المآبـا
|
|
والجــواري
لغسـل
هكطـور
نـادي
|
ولتطييبــــه
هنـــاك
بعـــادا
|
|
خشـيةً
أن
يـرى
الأب
ابنـاً
أبادا
|
|
فيثـــور
الأوار
ضـــمن
فــؤاده
|
وأخيــل
يشـتدد
داعـي
اشـتداده
|
|
وبــه
يعمــل
الظــبي
لا
يبـالي
|
أنهــى
زفـس
أم
أنيـل
العقابـا
|
|
غســـلته
وطيبتـــه
الجـــوراي
|
وبـــــبردٍ
كفنــــه
وشــــعار
|
|
وأخيــلٌ
ألقــاه
خلــف
الــدار
|
|
فـــوق
نعـــشٍ
وذان
باســتعجال
|
رفعــاه
لظهــر
كــبرى
العجـال
|
|
عنــد
هــذا
بكـى
أخيـل
وفطـرق
|
ل
دعــا
قــال
لا
تسـمني
عتابـا
|
|
لا
تغــظ
إن
بلــج
آذيــس
ينمـي
|
لــك
أتــى
أعـدت
هكطـور
رغمـا
|
|
فـــأبوه
أدى
الفكــاك
الأتمــا
|
|
وأنــا
منــه
ســهمك
المعتـادا
|
ســوف
أبقــي
وللصــريفة
عـادا
|
|
حـل
فـي
عشـره
البهـي
لدى
الحا
|
ئط
يلقــي
ألفــاظ
نطـقٍ
عـذابا
|
|
لـك
يـا
شـيخ
قـد
أعيـد
فتاكـا
|
وهــو
فـي
نعشـه
فنـل
مبتغاكـا
|
|
فــإذا
الفجــر
بكــرةً
وافاكـا
|
|
فمليّــاً
تــراه
عنــد
المعــاد
|
إنمــا
الآن
خــان
وقــت
الـزاد
|
|
فنيوبـا
لـم
تسـه
عـن
زادها
في
|
صـرحها
مـذ
أصـابها
مـا
أصـابا
|
|
ولـدها
اثنـا
عشـرٌ
بريع
الحياة
|
فتيـــةٌ
ســـتةٌ
وســـت
بنـــات
|
|
فتكـــت
أرطميـــس
بالغـــادات
|
|
وبقـــوس
اللجيــن
فيبــوس
زدى
|
وأبــا
الفتيــان
غيظـاً
وحقـدا
|
|
ذاك
إذ
فـاخرت
نيوبـا
لطونا
ال
|
حســن
يومــاً
بضــنوها
إعجابـا
|
|
فلهـا
اثنـا
عشـرق
وتلـك
اثنان
|
إنمـــا
قـــد
أفنــاهم
هــذان
|
|
أنهــراً
تســعةً
بمــوت
الهـوان
|
|
لبثــوا
لا
قــبرٌ
فزفــس
جهـارا
|
مســخ
النــاس
حــولهم
أحجـارا
|
|
وســراة
الخلــود
عاشــر
يــومٍ
|
دفنـــوهم
والأم
تجـــرع
صــابا
|
|
شــعرت
بــالطوى
بجهـد
البكـاء
|
وهــــي
للآن
تلتظـــي
بشـــقاء
|
|
نالهـا
مـن
لـدى
سـراة
السـماء
|
|
بعــد
أن
أصــبحت
بسـفيل
صـخرا
|
بجبـــالٍ
شـــمٍّ
يروعــن
ذعــرا
|
|
حيث
مثوى
الحور
اللواتي
على
جر
|
ف
أخلــوسٍ
لهــا
الرقــص
طابـا
|
|
وكـــذا
نحــن
زادنــا
نــأتيه
|
وابنــك
القــرم
بـاكراً
تبكيـه
|
|
عنـــدما
للبلاد
ترجـــع
فيـــه
|
|
فهنــاك
الــدموع
ماشـئت
نهمـر
|
ثــم
شــاةً
بيضـاء
أقبـل
ينحـر
|
|
وذووه
مـــن
بعــد
أن
ســلخوها
|
أربوهـــا
وســـفدوا
الآرابـــا
|
|
واشـــتووها
بلاهـــب
النيــران
|
ثـم
ملـوا
الشـواء
فـوق
الخوان
|
|
والفـــتى
أفطميـــذ
للضــيفان
|
|
وزع
الخــبز
بالقفـاع
امتثـالا
|
وأخيــل
اللحــوم
قســم
حــالا
|
|
والأيـادي
مـدت
إلـى
الـزاد
حتى
|
أنفـوا
الـزاد
جملـةً
والشـرابا
|
|
وابــن
دردانــسٍ
أخيــل
تأمــل
|
يعظــم
القـد
والجمـال
المكمـل
|
|
ومحيــا
الأربــاب
إن
هـو
أقبـل
|
|
وأخيــل
فريــام
أعظــم
قــدراً
|
لوقـــارٍ
ومنطـــقٍ
زان
فكـــرا
|
|
لبثـــا
برهـــة
وكـــلٌّ
بكـــلٍّ
|
محــدقٌ
مكــبرٌ
لــه
اســتعجابا
|
|
ثــم
فريــام
قـال
آخيـل
دعنـا
|
بلذيـذ
الهجـوع
ذا
الحيـن
نهنا
|
|
فأنــا
لـم
أغمـض
لعينـي
جفنـا
|
|
مـذ
قضـى
هالكـاً
بسـاعدك
ابنـي
|
بـل
ببـثي
مـا
زلـت
أشقى
بحزني
|
|
أتلــوى
علـى
الـدمال
بصـحن
ال
|
دار
أصـلى
لظـى
الأسـى
اللهابـا
|
|
إن
أذق
زادك
الــذي
لــي
تهيـا
|
أو
ترانــي
رشـفت
كـأس
الحميـا
|
|
فــإلى
الآن
لــم
أذق
قــط
شـيا
|
|
فأخيـلٌ
فـي
الحـال
أصـدر
جهـرا
|
للحواشـــي
وللســـبيات
أمــرا
|
|
أن
يعـدو
في
الباب
فرشاً
ويلقوا
|
لحــف
الـبرفير
الحسـان
قشـابا
|
|
ويمـدوا
فـوق
الفـراش
الزاربـي
|
وعليهــــا
مكثــــف
الأثـــواب
|
|
فـــالجواري
جريـــن
للأعتـــاب
|
|
معهــن
المصــابح
للبــاب
رحـن
|
وفراشــين
فــي
المجــاز
طرحـن
|
|
ولفريـــام
قـــال
إذ
ذا
آخــي
|
ل
يريـــه
مخافـــةً
وارتيابــا
|
|
أيهـا
الشـيخ
خارجـاً
ثـم
قريرا
|
خشــيةً
أن
تلقـى
بخيمـي
أميـرا
|
|
قادمـاً
فـي
الـدجى
هنا
مستشيرا
|
|
فهنــا
فــي
أبحاثنــا
تسـتفيد
|
ذاك
عــرفٌ
جــرى
عليــه
الصـيد
|
|
فــإذا
ا
رأوك
فـي
اليـل
أتـري
|
ذ
درى
والأمــور
بــاتت
صــعابا
|
|
ولعــل
المليـك
يرجـي
الفكاكـا
|
فقــل
الآن
لــي
صــريحاً
مناكـا
|
|
كـم
نهـاراً
تبغـي
لـدفن
فتاكـا
|
|
قــل
فنســي
أصــد
عـن
أهـواءي
|
وأرد
الســـــرى
عـــــن
الإبلاء
|
|
فعلــى
ذا
فريــام
وهـو
يحـاكي
|
بوقــارٍ
ربّــاً
مهيبــاً
أجابــا
|
|
إن
تبـح
أن
حفلـة
الـدفن
تجـري
|
تلــك
آخيــل
منــةٌ
منـك
تـترى
|
|
قـد
حصـرنا
تـدري
بـإليون
حصرا
|
|
والمــدى
شاســعٌ
لقطـع
الوقـود
|
بالرواســي
والرعـب
هـد
جنـودي
|
|
ولنـــا
للبكــاء
تســعة
أيــا
|
مٍ
بهـا
نـذرف
الـدموع
انسـكابا
|
|
ثــــم
يـــومٌ
للـــدفن
والإيلام
|
ثـــم
يــومٌ
للرمــس
والإتمــام
|
|
وإذا
مـا
اقتضـت
دواعـي
الخصام
|
|
نتهيــا
للحــرب
إن
نـأت
فجـرا
|
بعــد
هـذي
الأيـام
ثـاني
عشـرا
|
|
قـال
مـا
شـئت
فليكـن
وبهذا
ال
|
حيـن
نلـوي
عـن
الحروب
الحرابا
|
|
ثــم
يمنـي
فريـام
أمسـك
عهـدا
|
لوفـــاقٍ
جــرى
وأبــرم
عقــدا
|
|
خشــيةً
أن
يسـومه
الرعـب
جهـدا
|
|
عنـد
هـذا
فيـرام
والفيـج
قاما
|
وبظــلّ
الــرواق
بــالأمن
نامـا
|
|
وأخيـــلٌ
فـــي
عزلــةٍ
بحمــاه
|
وبريســاطيب
الهجــوع
اسـتطابا
|
|
وجميــع
الأربــاب
والنـاس
طـرّاً
|
هجعـــوا
والظلام
أســبل
ســترا
|
|
إنمـــا
ظـــل
هرمــسٌ
لا
يكــرى
|
|
فــاكراً
فـي
فريـام
كيـف
يـبين
|
عـن
حمـى
القـوم
لا
تراه
العيون
|
|
فعلــى
راســه
اســتقر
ونــادا
|
ه
أيـا
شـيخ
هـل
أمنـت
الطلابـا
|
|
نمــت
بيـن
العـدى
بـأمن
أخيـل
|
ولقــد
جــدت
بالعطـاء
الجزيـل
|
|
لافتكـاك
ابنـك
الكريـم
النبيـل
|
|
إن
تلاقـــي
هنـــا
أغاممنونــا
|
والســرى
كـدت
ولـدك
الباقينـا
|
|
عنـــك
يعطــونه
ثلاثــة
أضــعا
|
ف
الـذي
قـد
أديـت
مـالاً
لبابـا
|
|
قـام
فريـام
ينهـض
الفيـج
رعبا
|
ولشـــد
العجــال
هرمــس
هبــا
|
|
وبهــا
جـد
ينهـب
السـهل
نهبـا
|
|
لا
يراهـم
مـن
ذلـك
الجيـش
رائي
|
فــأتوا
آمنيــن
مجــرى
المـاء
|
|
فــوق
جـرفٍ
فيـه
تـدفق
زنـث
ال
|
منتمــي
نشــأةً
لزفـس
انتسـابا
|
|
لأعــالي
الأولمــب
هرمــس
راحـا
|
وبــدا
برقــع
الجســاد
صـباحا
|
|
فهنـا
الشيخان
استباحا
النواحا
|
|
ثــم
حثــا
الجيـاد
نحـو
البلاد
|
وبغـــالاً
قلـــت
جـــديل
الجلاد
|
|
جريــا
لا
يراهمــا
بعــد
مــرءٌ
|
أوفتـاةُ
فـي
الأهـل
حيـث
اجتابا
|
|
بهمــا
مــا
درى
بـذاك
المجـال
|
غيــر
كســندرا
فتــاة
الــدلال
|
|
مــن
تجلــت
كعفرذيــت
الجمـال
|
|
أشـرفت
مـن
فرغـام
فـوق
الوهاد
|
فأباهـــا
رأت
وذاك
المنـــادي
|
|
وأخاهــا
رأت
علــى
نعشــه
فـي
|
ه
اذلعبـــت
بغــاله
اذلعبــاب
|
|
ولــولت
والـدموع
ملـء
المـآقي
|
ثــم
جــدت
تصــيح
فـي
الأسـواق
|
|
يـا
رفيقـاتٍ
يـا
خيـار
الرفـاق
|
|
إن
تكونـــوا
حييتــم
هكطــورا
|
وهـــو
حـــيٌّ
بعــوده
منصــورا
|
|
وجـــذلتم
بملتقـــاه
جميعـــاً
|
فانهضــوا
رحبــوا
بـه
ترحابـا
|
|
أكـبروا
الخطـب
والأسى
والوبالا
|
وإلـى
البـاب
بـادروا
استقبالا
|
|
كلهـــم
كلهــم
نســا
ورجــالا
|
|
وأمـــام
الجميــع
زوجٌ
حليلــه
|
أعظمـــت
خطبـــه
وأمٌ
جليلـــه
|
|
بعويـــلٍ
وقطـــع
شــهرٍ
ونــدبٍ
|
جاءتـا
النعـش
تلمسـان
النطابا
|
|
وحواليهمـــا
الجمـــوع
تبــوح
|
بأســـاها
وبـــالنحيب
تصـــيح
|
|
أوشـكوا
كـل
يـومهم
أن
ينوحـوا
|
|
بيـن
تلـك
الأبـواب
من
حول
نعشه
|
إنمـا
الشـيخ
صـاح
من
فوق
عرشه
|
|
إفتحـوا
لي
السبيل
للصرح
من
ثم
|
م
اسـكبوا
الـدمع
فـوقه
تسكابا
|
|
فلــه
وســعوا
الطريــق
فجــدا
|
وأتـى
القصـر
خلفـه
القوم
حشدا
|
|
وضـعوا
الميـت
فـوق
نعـشٍ
أعـدا
|
|
وأقـــاموا
حـــوليه
نــدابينا
|
بشــجي
الأنغـام
تـوري
الشـجونا
|
|
ينشــدون
الرثــاء
بيــن
نسـاء
|
وفــق
ذاك
النشـيد
نحـن
كئابـا
|
|
وانـــبرت
أولاً
فعـــم
العويــل
|
أنـــذروماخ
والـــدموع
تســيل
|
|
فعلـــى
رأســه
ترامــت
تقــول
|
|
مـــت
بعلاه
بالشــباب
النضــير
|
وأنـــا
أيــمٌ
بهــذي
القصــور
|
|
وهنـا
الطفـل
طفلنـا
ونتـاج
ال
|
حــزن
لــن
يـدركن
آه
الشـبابا
|
|
قبـل
ذاك
الزمـان
خلـت
الديارا
|
أصــبحت
قفــرةً
وبــاتت
دمـارا
|
|
إن
تمـت
لا
سـواك
يحمـي
الذمارا
|
|
وجميـــع
البنيـــن
والأطفـــال
|
والعـذاري
والمحصـنات
الخـوالي
|
|
سـوف
يمسـين
فـي
الخلايـا
سبايا
|
وأنـــا
بنيهـــن
وا
أوصـــابا
|
|
وكــذا
أنــت
يــا
بنـي
ستمسـي
|
حيــث
أمســي
تعنـو
بـذلٍّ
وبـؤس
|
|
لفـــتىً
ظــالمٍ
عتــا
ذي
بــأس
|
|
أو
عــدوٍّ
سـيم
الوبـال
الثقيلا
|
يتــوخى
لــك
الحمـام
الـوبيلا
|
|
بـك
يلقـي
مـن
فـوق
بـرجٍ
فيشفي
|
غلــةً
كــادت
النفـوس
الغضـابا
|
|
بـابن
هكطـور
يشـتفي
في
انتقام
|
لأبٍ
أوأخٍ
رمـــــــــــى
أو
غلام
|
|
فهمامــاً
قــد
كــان
أي
همــام
|
|
ولكــم
باســلٍ
بجيــش
الأعــادي
|
كــدم
الأرض
دونــه
فـي
الجهـاد
|
|
فلـــذا
بكتـــه
طــرواد
طــرّاً
|
وعليــه
الفــؤاد
بـالبث
ذابـا
|
|
جــل
عـن
واجـب
التأسـي
أسـاكا
|
ولقـــد
هــد
والــديك
رداكــا
|
|
إنمـا
لـي
فـوق
الجميـع
شـجاكا
|
|
آهٍ
لــو
فهمـت
لـي
ببعـض
الكلام
|
تبســط
الكـف
لـي
أوان
الحمـام
|
|
لتــــذكرته
نهـــاري
وليلـــي
|
ودمــوعي
تنصـب
عمـري
انصـبابا
|
|
ثـــم
غصــت
بفــائض
الزفــرات
|
والعـــذاري
يجــدن
بــالعبرات
|
|
ثــم
صــاحت
إيقــاب
واحسـراتي
|
|
وا
أعــز
البنيــن
وا
هكطــورا
|
كـم
رعتـك
الأربـاب
حيّـاً
قريـرا
|
|
وهـي
مـن
بعـد
فاجعـات
المنايا
|
بـــك
تعنـــي
تجلــةً
وثوايــا
|
|
بأقاصــي
البحــار
فـي
إمـبروس
|
أو
بســـاموس
أو
ربــى
لمنــوس
|
|
بـاع
مـن
فتيـتي
أخيـل
البـؤوس
|
|
كـل
مـن
فـي
يـديه
أضـحى
أسيرا
|
إنمــا
أنــت
مـذ
رمـاك
مغيـرا
|
|
بــك
مـا
زال
طائفـاً
حـول
رمـس
|
لخليــلٍ
أنفــذت
فيـه
الـذبابا
|
|
كـل
هـذا
لـم
يحـي
ذاك
الخليلا
|
وأمــــامي
أراك
رطبـــاً
جميلا
|
|
مثلمـا
لـو
ذا
الحين
رحت
قتيلا
|
|
مثــل
مــن
فيبــسٌ
أبـاد
بسـهم
|
دق
عــن
صــولج
الحنيــة
يرمـي
|
|
وعلا
النــوح
ثــم
هيلانــةٌ
ثــا
|
لثــة
ولــولت
تزيــح
النقابـا
|
|
يـا
أحـم
الأصـهار
إلـف
الـوداد
|
أعلــق
الأهــل
كلهــم
بفــؤادي
|
|
لـم
أرى
مـذ
عشـرين
عامـاً
بلادي
|
|
منـذ
فـاريس
مجتـبي
الخالـدينا
|
ســاقني
قادمــاً
إلــى
إليونـا
|
|
ليتنــي
قبــل
أن
أفـارق
شـعبي
|
وبنـي
أسـرتي
انشـعبت
انشـعابا
|
|
شـأنك
الرفـق
بـي
لقد
كان
دوما
|
قـط
مـا
سـمتني
المهانـة
يومـا
|
|
وإذا
كـــادني
ســباباً
ولومــا
|
|
أي
صــهراٍ
أو
زوجــه
أو
شـقيقه
|
أو
حمـاتي
إيقـاب
تلـك
الشفيقه
|
|
غيـر
فريـام
مـن
بـدا
كـأبٍ
لـي
|
كنـت
رفقـاً
عنـي
تزيـح
السبابا
|
|
ســوف
أبكيــك
سـوف
أبكـي
شـقا
|
ئي
ليــس
لــي
راحـمٌ
وإلـف
ولاء
|
|
قــد
قلانــي
الجميـع
فـوق
بلائي
|
|
وبكــت
والجمــوع
نـاحت
جميعـا
|
ثــم
فريـام
صـاح
فيهـم
سـريعا
|
|
يـا
سراة
الطرواد
قوموا
فسيروا
|
واجمعـوا
وافـر
الوفود
احتطابا
|
|
لا
تخــافوا
مــن
الأخـاءة
غـدرا
|
فأخيــلٌ
لـي
قـال
أن
لـن
يكـرا
|
|
قبــل
فجــرٍ
يلـوح
ثـاني
عشـرا
|
|
أســرعوا
جملــةً
لشــد
البغـال
|
وقــوي
الــثيران
حـول
العجـال
|
|
ثــم
سـاروا
بهـن
فـوراً
وجـدوا
|
وإلــى
السـور
أقبلـوا
أسـرابا
|
|
أنهــراً
تســعةً
بجمــع
الضـرام
|
لبثـــوا
ثـــم
عاشــر
الأيــام
|
|
رفعــوا
الميـت
والعيـون
هـوام
|
|
فــوق
ذاك
الوفـود
ثـم
النـارا
|
أضـــرموها
بـــه
تـــؤج
أوارا
|
|
ولهــم
حيــن
لاح
ورد
بنــان
ال
|
فجـر
مـن
حـوله
أقـاموا
عصـابا
|
|
حيــث
هبــت
لــواهب
النيــران
|
أخمــدوها
بصــرف
خمـر
الـدنان
|
|
ولفيـــــف
الإخـــــوان
والخلان
|
|
جمعـوا
كـل
أعظـم
الميـت
جمعـا
|
بكئيــب
الفــؤاد
يـذودن
دمعـا
|
|
أودعوهــا
مــن
ثــم
حـق
لجيـنٍ
|
وكســـوه
برفيرهـــم
جلبابـــا
|
|
أنزلوهــا
فــي
حفــرةٍ
حفروهـا
|
وبجلمـــود
صـــخرهم
طمروهـــا
|
|
ثـم
شـادوا
الضـريح
إذ
دفنوهـا
|
|
وحـــواليه
أوقفــوا
الأرصــادا
|
مـن
سـراة
السـرى
قرومـاً
شدادا
|
|
خشــيةً
مــن
عــدوهم
أن
يفـاجي
|
بغتــةً
حيــن
غفلــةٍ
واحتسـابا
|
|
وإذ
القــبر
أكملــوا
وأتمــوا
|
صـرح
ذاك
المليـك
فريـام
أمـوا
|
|
حيــث
حــوله
للعــزاء
انضـموا
|
|
ولهــم
هيــأ
المليــك
طعامــا
|
كـان
فـي
مـأتم
الفقيـد
ختامـا
|
|
ذاك
مـا
كـان
مـن
مناحـة
هكطـو
|
ر
الــذي
روض
الجيــاد
الصـلابا
|