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أطـرق
الشـاكي
ونـام
الموجَعُ
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وانتَشى
الليل
بكاساتِ
السكون
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غيــرُ
شــاك
كفّنتــه
الأضـلع
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وبكتــهُ
بمراثيهــا
العيـون
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حــرّم
اللَــه
عليـه
الفرحـا
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واســـتبدّت
بقــواه
النــوَبُ
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فجفــا
الأيــام
فجـراً
وضـحى
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وتمنــى
لــو
طـواه
المغـربُ
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هزّنــي
إذ
هــزّه
صـوت
الألـم
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فتســـمّعتُ
إلـــى
أصـــدائه
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فــإذا
لحــنٌ
تغشـّاه
النـدم
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ضــارعٌ
للَــه
فــي
عليــائه
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قلـتُ
هذا
البعث
مجهول
الندى
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أتــرى
يمتــدُّ
بـي
أم
يقصـرُ
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يـا
يـدَ
الأقـدارِ
لاكنـتِ
يـداً
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شــابهَ
الناسـكَ
فـي
الـداعر
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قـد
كفـاني
وكفى
قلبي
الهوى
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هــدنا
مــن
راحــتيه
معـول
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خالـد
اللعنـة
مسـعور
القوى
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يجهــلُ
الرحمـة
فيمـا
يجهـل
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حـــدثيني
أبــدُنياك
جديــد
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يـا
يـدَ
الأقدار
أم
جفّ
القلم
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والـذي
خبّـأت
وعـدٌ
أم
وعيـد
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وشـــروق
أم
غـــروب
وظلــم
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حـدّثيني
عن
وجودي
في
الحياه
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مـا
الذي
أغراك
بي
حتى
أجىء
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أيهـا
الجاني
الذي
فكّت
يداه
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ورمــى
فـي
قيـده
كـل
برىـء
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هـا
هـو
القلـب
الـذي
طهّرته
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من
هوى
الدنيا
وآثام
الشباب
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ثــار
فـي
صـدري
إذ
نـاديته
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إسترح
يا
قلب
من
هذا
العذاب
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ظننـي
أهرقـت
في
البلوى
دمه
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فرمــاني
بجحــود
الجاحـدين
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رحمتـا
للقلـب
مـن
ذا
علّمَـه
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أنّنـي
أنكـرت
ماضـيه
الدفين
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ماضــيَ
الحـب
الـذي
ألهمنـي
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صـادح
الشـعر
وفرحـان
المنى
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لــم
يــزل
بملأ
وجـه
الزمـن
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ضــحكا
حلــواً
وبشـرا
وسـنا
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قلـتُ
يـا
قلـب
حنانـاً
إنمـا
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هــذه
الـدنيا
عجـوزٌ
سـاحره
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أيهـذا
الطفـل
تلهيـه
الدمى
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إن
فـي
الأولـى
معـاني
الآخره
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قـال
لـي
القلـب
وقـد
أحزنه
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إننـي
ألهيـتُ
عـن
حـر
جـواه
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يـا
مريـض
العمـر
عجـل
دفنه
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قبـل
أن
تعشيك
أضواء
الحياه
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كــم
ترنّمـتَ
بألحـان
الصـبا
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وتركـت
الـدهر
يلهـو
بصـباك
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ثــم
وافــاك
شــباب
شــيبا
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وأنــا
قلبــك
لا
قلـب
سـواك
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بيــن
أحنــائي
آمــال
دنـا
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عهـدُها
بـالموت
والمـوت
عجِل
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أفنِهـا
أنـت
فقد
تخشى
الفنا
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وكلانــا
عــن
قريــب
مرتحـل
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قلـت
يـا
قلـب
ومـا
أباسـني
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أنـا
أقضـى
والمنـى
لا
تنقضي
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مـا
الـذي
أبقيـت
لي
من
حسن
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بعـد
أن
يرضـيك
مـالا
أرتضـى
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هــات
آمـالي
فقـد
أعـددتها
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للبلـى
مـن
قبل
أن
تروى
فمك
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وغــداً
تهتــف
مـا
أنسـيتها
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آه
مـا
أقسـاك
بـل
ما
أرحمك
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