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يـا
سـاقيَ
الخمـره
روحي
فداك
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عامــل
بلا
أجـره
قصـدي
نـراك
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إنـي
رهين
أمرك
يا
ذا
الحبيب
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اليَــدُ
بيــدك
أنــت
الرقيـب
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نَطَقــتُ
عــن
لسـنك
بكـل
غيـب
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فــإن
قُلــتُ
جهـراً
إنّـي
أراك
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نعــم
ولا
فخــرَهُ
حُــزتُ
رضـاك
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يـا
قلـبي
لا
تـترُك
حبّ
الحبيب
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لأنـــهُ
ســـرُّك
فكُـــن
لــبيب
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فــإن
ظهــر
منـكَ
أفـرح
وطـب
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وقُـل
لمـن
يـرى
يفهَـم
معنـاك
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الســر
قــد
جـرى
فيـه
منـاك
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يـا
مـن
تُريد
تترُك
حب
الصليب
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أعمِـد
لنـا
واهتِك
صون
الحبيب
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يظهَــر
لــك
منــكَ
سـرٌّ
عجيـب
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نفــي
عــنِ
الـورى
ومـا
عـدك
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يـا
لهـا
مـن
خمره
فيها
شفاك
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إن
كـان
فـي
زعمِـكَ
أمـرٌ
صعيب
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أحسـِن
فينـا
ظنّـك
يضـحى
قريب
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لأنـــهُ
إنّـــك
كيـــفَ
يغيــب
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مـن
عجيـبِ
القُدرةَ
تجهَل
معناك
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وأنـتَ
فـي
الحضـرَة
لا
مـن
معَك
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الحــقُّ
لا
ينفَــك
عـنِ
المُنيـب
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والبَصـر
لا
يُـدرِكُ
قـرب
القريب
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حــتى
يتشــرّك
هــذا
القليـب
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يظهَـر
معنـى
الكثرة
وذا
وذاك
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والحـــقُّ
لا
يُـــرى
إلّا
هُنــاك
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أرجِـع
لـك
بصـرَك
وانظُـر
نصيب
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وانسـلِخ
عـن
عرشـِك
واصعَد
وغِب
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والتَفِــت
لِشــكلكَ
فيـه
تُصـيب
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نتــائجَ
الفكـرةَ
فيهـا
هـداك
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تصـفو
لـك
المِـرأ
تـرى
وجهَـك
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أنــتَ
مـع
نفسـكَ
تظهَـر
نجيـب
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لكــن
فــي
ســرّك
شــكٌّ
وريـب
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لا
ينفَـع
فـي
مرضـك
إلّا
الطبيب
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إن
جئتــهُ
تنجــو
مــنَ
الهلاك
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أراك
فــي
فــترَه
فمـا
دهـاك
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إنّـي
طبيب
جرحِكَ
يا
ذا
المصيب
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أشـفَقتُ
مـن
أمـرِكَ
اللَـهُ
رقيب
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إنــت
مــع
ضـُعفِك
عنّـي
تعيـب
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أراكَ
فــي
حيـرةَ
يصـعُب
هـداك
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مـا
دُمـت
فـي
غمرةَ
تتبع
هواك
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أعييـتُ
من
نُصحكَ
يا
ذا
الكئيب
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اللَـهُ
فـي
عونِـكَ
هـوَ
المجيـب
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يفُــكُّ
لــك
أسـرَك
أمـرٌ
صـعيب
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كفاهـا
مـن
حسـرَه
تجهَـل
مولاك
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والبصــر
لا
يــرى
إلا
فـي
ذاك
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إنّـي
كنـتُ
مثلـكَ
نزعـم
لـبيب
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وعنـدي
مـن
جهلـك
أوفَـر
نصيب
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حــتى
بــدا
منـكَ
أمـرٌ
غريـب
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وجــدُتكَ
صــوره
فيهــا
سـواك
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أنــتَ
محـضُ
عـبره
لمَـن
يـراك
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إن
كنـتَ
فـي
زَعمِـك
أنتَ
المحبّ
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والحــقُّ
فـي
ظنّـك
منـكَ
قريـب
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بـالَغتَ
فـي
جهلـكَ
حد
التعصيب
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إنسـانٌ
في
النظره
نفسُ
الإشراك
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والشــركُ
لا
يطـرأ
علـى
مـولاك
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إنّـي
حليـف
نصـحكَ
قـولي
مُهيب
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إن
شئتَ
أن
تنفكّ
من
ذا
اللهيب
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إتبَـع
لنـا
واسـلُك
نهجي
قريب
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قريــبٌ
بــالمرّه
فيــا
ليتَـك
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تتَبـع
لـهُ
شـبراً
تبلُـغ
مُنـاك
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إلهــيَ
ببابــكَ
أحمــد
منيـب
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العلاوي
عبـــدُك
كيــفَ
يخيــب
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بلغنـي
عـن
لسـنك
أنـك
مجيـب
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أجــب
المضــطر
فقــد
دعــاكَ
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بجميــل
البُشـرى
طـالِب
رِضـاك
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إنّـي
خـديمُ
شرعِكَ
ياذا
الحبيب
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وقفـتُ
مـن
أجلـكَ
ضـدّ
الرقيـب
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إجعلنـي
فـي
ضمنك
من
الترهيب
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يـا
صـاحبَ
العشره
ما
لي
سواك
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يـا
عـروس
الحضرة
قلبي
يهواك
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