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ضـحكت
وجـوه
الـدهر
بعـد
عبـوس
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وتجللتنـــا
رحمــة
مــن
بــوس
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وتوضـحت
غـرر
البشـائر
بعـد
ما
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انبهمـت
فأطلعهـا
حـداة
العيـس
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صـدعوا
بهـا
ليـل
الهموم
كأنما
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صــدعوا
الظلام
بجـذوة
المقبـوس
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فكـأنهم
بثـوا
حيـاة
فـي
الورى
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نشــرت
لهـا
الآمـال
مـن
مرمـوس
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قـرت
عيـون
الخلـق
منهـا
بالتي
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أضـفت
مـن
النعمـاء
خيـر
لبـوس
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فكــأن
قــومي
نــادمتهم
قرقـف
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شـربوا
النعيـم
لهـا
بغير
كؤوس
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يتمـايلون
مـن
المسـرة
والرضـى
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ويقــــابلون
أهلـــة
بشـــموس
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مــن
راكـب
وافـى
يحيـي
راكبـاً
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وجليـــس
أنــس
قــاده
لجليــس
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ومشـــفع
للـــه
يــؤنس
عنــده
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أثـر
الهـدى
في
المعهد
المأنوس
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يعتـــد
منهــا
رحمــة
قدســية
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فيبـــوء
للرحمـــن
بالتقــديس
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طـــب
بــإخلاص
الــدعاء
وإنــه
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يشـفي
مـن
الـداء
العياء
ويوسي
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يـا
ابـن
الخلائف
والذين
بنورهم
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نهجــت
ســبيل
الحـق
بعـد
دروس
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والناصـر
الـدين
القـويم
بعزمة
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طــرد
اســتقامتها
بغيـر
عكـوس
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هجـر
المنـى
فيهـا
ولذات
المنى
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فــي
لــذة
التهجيـر
والتغليـس
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حـاط
الرعيـة
بالسياسـة
فانضوت
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منـــه
لإكـــرم
مالــك
وســؤوس
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أســد
يحـامي
عـن
حمـى
أشـباله
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حــتى
ضــووا
منــه
لأمنـع
خيـس
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قسـماً
بموشـي
البطـاح
وقـد
غدت
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تختــال
زهـواً
فـي
ثيـاب
عـروس
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والمــاثلات
مـن
الحنايـا
جثمـا
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يخــبرن
عــن
طســم
وفـل
جـديس
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خــوص
مضــمرة
البطــون
كأنهـا
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أنضــاء
ركــب
فـي
الفلاة
حـبيس
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وخز
البلى
منها
الغوارب
والذرى
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فلفتــن
خـزراً
بـالعيون
الشـوس
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لبقــاك
حــرز
الأنــام
وعصــمة
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وحيـــاة
أرواح
لنـــا
ونفــوس
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ولأنــت
كافــل
ديننــا
بحمايـة
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لــولاك
ضــيع
عهــدها
وتنوســي
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اللــه
أعطــاك
الـتي
لا
فوقهـا
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وحبــاك
حظــاً
ليــس
بـالموكوس
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تعنـو
القلـوب
إليك
قبل
وجوهنا
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ســيان
مــن
رأس
ومــن
مــرءوس
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فــإذا
أقمـت
فـإن
رعبـك
راحـل
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يحمــي
علـى
الأعـداء
كـل
وطيـس
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وإذا
رحلـــت
فللســعادة
آيــة
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تقتادهــا
فــي
مــوكب
وخميــس
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وإذا
الأدلـة
فـي
الكمال
تطابقت
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جــاءت
بمســموع
لهــا
ومقيــس
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فــانعم
بملكــك
دولــة
عاديـة
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تشـقي
الأعـادي
بالعـذاب
الـبيس
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وإليكهــا
منـي
علـى
خجـل
بهـا
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عــذراء
قــد
حليـت
بكـل
نفيـس
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غـذراً
فقـد
طمـس
الشـباب
ونوره
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وأضـاء
صـبح
الشـيب
عنـد
طمـوس
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لــولا
عنايتــك
الـتي
أوليتنـي
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مــا
كنـت
أعنـى
بعـدها
بطـروس
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واللـه
مـا
أبقـت
ممارسة
النوى
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منــي
ســوى
مــرس
أحــم
دريـس
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أنحـى
الزمان
علي
في
الأدب
الذي
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دارســـــته
بمجـــــامع
ودروس
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فســطا
علـى
وفـري
وروع
مـأمني
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واجتـث
مـن
دوح
النشـاط
غروسـي
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ورضــاك
رحمــتي
الـتي
أعتـدها
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تحيـي
منـى
نفسـي
وتـذهب
بوسـي
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