|
هــل
غيــر
بابـك
للغريـب
مؤمـل
|
أو
عــن
جنابــك
للأمــاني
معـدل
|
|
هـي
همـة
بعثـت
إليـك
على
النوى
|
عزمـاً
كمـا
شـحذ
الحسـام
الصيقل
|
|
متبــوأ
الـدنيا
ومنتجـع
المنـى
|
والغيــث
حيـث
العـارض
المتهلـل
|
|
حيــث
القصـور
الزاهـرات
منيفـة
|
تعنـى
بهـا
زهـر
النجـوم
وتحفـل
|
|
حيـث
الخيـام
الـبيض
يرفع
للعلا
|
والمكرمــات
طرافهــا
المتهــدل
|
|
حيــث
الحمـى
للعـز
فـي
سـاحاته
|
ظــل
أفــاءته
الوشــيج
الــذبل
|
|
حيـت
الكـرام
ينوب
عن
نار
القرى
|
عــرف
الكبــاء
بحيهـم
والمنـدل
|
|
حيـث
الرمـاح
يكـاد
يـورق
عودها
|
ممــا
تعــل
مـن
الـدماء
وتنهـل
|
|
حيـث
الجيـاد
أملهـن
بنـو
الوغى
|
ممـا
أطـالوا
في
المغار
وأوغلوا
|
|
حيـث
الوجـوه
الغـر
قنعها
الحيا
|
والبشــر
فــي
صــفحاتها
يتهلـل
|
|
حيـث
الملـوك
الصيد
والنفر
الألى
|
عــز
الجــوار
لــديهم
والمنـزل
|
|
مـن
شـيعة
المهـدي
بـل
مـن
شـيع
|
ة
التوحيــد
بــه
الكتـاب
يفصـل
|
|
بــل
شـيعة
الرحمـن
ألقـى
حبهـم
|
فـي
خلقـه
فسـموا
بـذاك
وفضـلوا
|
|
شـادوا
علـى
التقـوى
مباني
عزهم
|
للــه
مـا
شـادوا
بـذاك
وأثلـوا
|
|
قــوم
أبــو
حفــص
أب
لهـم
ومـا
|
أدراك
والفـــــاروق
جــــد
أول
|
|
نسـب
كمـا
اطـردت
أنـابيب
القنا
|
وأتـــى
علــى
تقــويمهن
معــدل
|
|
ســام
علــى
هـام
الزمـان
كـأنه
|
للفخــر
تــاج
بالبــدور
مكلــل
|
|
فضــل
الأنــام
حـديثهم
وقـديمهم
|
ولأنــت
إن
فضــلوا
أعــز
وأفضـل
|
|
وبنـوا
علـى
قلـل
النجوم
ووطدوا
|
وبنــاؤك
العــالي
أشــد
وأطـول
|
|
ولقــد
أقـول
لخـائض
بحـر
الفلا
|
والليــل
مزبــد
الجـوانب
أليـل
|
|
مــاض
علىغــول
الــدجى
لا
يتقـي
|
تيهـــاً
وذابلــه
ذبــال
مشــعل
|
|
متقلـــب
فــوق
الرحــال
كــأنه
|
طيــف
بــأطراف
المهــاد
موكــل
|
|
يبغـي
منـال
الفوز
من
طرق
الغنى
|
ويــرود
خصــبها
الــذي
لا
يمحـل
|
|
أرح
الركــاب
فقـد
ظفـرت
بـواهب
|
يعطــي
عطــاء
المنعميـن
فيجـزل
|
|
للـه
مـن
خلـق
كريـم
فـي
النـدى
|
كـــالروض
حيـــاه
نــدى
مخضــل
|
|
هــذا
أميــر
المـؤمنين
إمامنـا
|
فـي
الـدين
والدنيا
إليه
الموئل
|
|
هــذا
أبـو
العبـاس
خيـر
خليفـة
|
شـهدت
لـه
الشـيم
الـتي
لا
تجهـل
|
|
مستنصـر
بـالله
فـي
قهـر
العـدا
|
وعلـــى
إعانـــة
ربــه
متوكــل
|
|
ســبق
الملـوك
إلـى
العلا
متمهلا
|
للــه
منــك
الســابق
المتمهــل
|
|
فلأنـت
أعلـى
المـالكين
وإن
غدوا
|
يتســابقون
إلــى
العلاء
وأكمــل
|
|
قــايس
قــديماً
منكــم
بقـديمهم
|
فـــالأمر
فيــه
واضــح
لا
يجهــل
|
|
دانــوا
لقــومكم
بــأقوم
طاعـة
|
هـي
عـروة
الـدين
الـتي
لا
تفصـل
|
|
ســائل
تلمســاناً
بهــا
وزناتـة
|
ومريــن
قبلهــم
كمـا
قـد
ينقـل
|
|
وأســأل
بأنــدلس
مـدائن
ملكهـا
|
تخـبرك
حيـن
استيأسوا
واستوهلوا
|
|
واســأل
بــذا
مراكشـاً
وقصـورها
|
ولقــد
تجيـب
رسـومها
مـن
يسـأل
|
|
يـا
أيهـا
الملـك
الـذي
في
نعته
|
ملــء
القلـوب
وفـوق
مـا
يتمثـل
|
|
للـــه
منـــك
مؤيـــد
عزمــاته
|
تمضـي
كمـا
يمضـي
القضاء
المرسل
|
|
جئت
الزمــان
بحيـث
أعضـل
خطبـه
|
فــافتر
عنــه
وهـو
أكلـح
أعصـل
|
|
والشــمل
مــن
أبنــائه
متصــدع
|
وحمـــى
خلافتـــه
مضــاع
مهمــل
|
|
والخلـق
قـد
صـرفوا
إليك
قلوبهم
|
ورجـوا
صـلاح
الحـال
منـك
وأملوا
|
|
فعجلتــه
لمــا
انتــدبت
لأمــره
|
بالبــأس
والعـزم
الـذي
لا
يمهـل
|
|
ذللــت
منــه
جامحــاً
لا
ينثنــي
|
ســـهلت
وعــراً
كــاد
لا
يتســهل
|
|
وألنـت
مـن
شـرس
العتـاة
وذدتهم
|
عـن
ذلـك
الحـرك
الـذي
قد
حللوا
|
|
كــانت
لصــولة
صــولة
ولقــومه
|
يعـدوا
ذؤيـب
بهـا
وتسطو
المعقل
|
|
ومهلهـل
تسـدي
وتلحـم
فـي
الـتي
|
مــا
أحكموهـا
بعـد
ففـي
مهلهـل
|
|
عجـب
الأنـام
لشـأنهم
بـادون
قـد
|
قــذفت
بحيهــم
المطــي
الــذلل
|
|
رفعوا
القباب
على
العماد
وعندها
|
الجـرد
السـلاهب
والرمـاح
العسـل
|
|
فـي
كـل
ظـامي
الترب
متقد
الحصى
|
تهــوي
للجتــه
الظمــاء
فتنهـل
|
|
جــن
شــرابهم
الســراب
ورزقهـم
|
رمــح
يــروح
بـه
الكمـي
ومنصـل
|
|
حــي
حلــول
بــالعراء
ودونهــم
|
قـذف
النوى
إن
يظعنوا
أو
يقبلوا
|
|
كـانوا
يروعـون
الملوك
بما
بدوا
|
وغــدت
ترفــه
بــالنعيم
وتخضـل
|
|
فبــدوت
لا
تلــوي
علـى
دعـة
ولا
|
تــأوي
إلـى
ظلـل
القصـور
تهـدل
|
|
طــوراً
يصــافحك
الهجيـر
وتـارة
|
فيـــه
بخفــاق
البنــود
تظلــل
|
|
وإذا
تعــاطي
ضـمراً
يـوم
الـوغى
|
كــأس
النجيــع
فبالصـهيل
تعلـل
|
|
مخشوشــنا
فــي
العـز
معتملاً
لـه
|
فــي
مثـل
هـذا
يحسـن
المسـتعمل
|
|
تفـري
حشـا
البيـداء
لا
يسري
بها
|
ركــب
ولا
يهــوي
إليهــا
جحفــل
|
|
وتجــر
أذيــال
الكتـائب
فوقهـا
|
تختـال
فـي
السـمر
الطوال
وترفل
|
|
ترميهـــم
منهمــا
بكــل
مدجــج
|
شـاكي
السـلاح
إذا
اسـتعار
الأعزل
|
|
وبكـــل
أســـمر
غصــنه
متــأود
|
وبكـــل
أبيـــض
شـــطه
متهــدل
|
|
حــتى
تفــرق
ذلـك
الجمـع
الألـى
|
عصـفت
بهـم
ريـح
الجلاد
فزلولـوا
|
|
ثــم
اســتملتهم
بأنعمــك
الـتي
|
خضــعوا
لعــزك
بعـدها
وتـذللوا
|
|
ونزعـت
مـن
أهـل
الجريـد
غوايـة
|
كــانت
بهــم
أبـداً
تجـد
وتهـزل
|
|
خربــت
مـن
بنيانهـا
مـا
شـيدوا
|
وقطعـت
مـن
أسـبابها
مـا
أصـلوا
|
|
ونظمــت
مــن
أمصــاره
وثغــوره
|
للملــك
عقــداً
بــالفتوح
يفصـل
|
|
فســددت
مطلـع
النفـاق
وأنـت
لا
|
تنبــو
ظبـاك
ولا
العزيمـة
تنكـل
|
|
بشــــكيمة
مرهوبـــة
وسياســـة
|
تجــري
كمــا
يجـري
فـرات
سلسـل
|
|
عــذب
الزمـان
لهـا
ولـذ
مـذاقه
|
مـن
بعـد
مـا
قـد
مر
منه
الحنظل
|
|
فضــوى
الأنــام
لعـز
أروع
مالـك
|
ســهل
الخليقــة
ماجــد
متفضــل
|
|
وتطـابقت
فيـك
القلوب
على
الرضى
|
ســيان
منهــا
الطفـل
والمتكهـل
|
|
يـا
مالكـاً
وسـع
الزمـان
وأهلـه
|
دعـة
وأمنـاً
فـوق
مـا
قـد
أملوا
|
|
فــالأرض
لا
يخشــى
بهـا
غـول
ولا
|
يعـدو
بسـاحتها
الهزبـر
المشـبل
|
|
والســفر
يجتــابون
كــل
تنوفـة
|
ســرب
القطـا
مـا
راعهـن
الأجـدل
|
|
سـبحان
مـن
بعلاك
قـد
أحيا
المنى
|
وأعــاد
حلـي
الجيـد
وهـو
معطـل
|
|
سـبحان
مـن
بهـداك
أوضـح
للـورى
|
قصــد
الســبيل
فأبصـر
المتأمـل
|
|
فكأنمــا
الــدنيا
عـروس
تجتلـى
|
فتميـس
فـي
حلـل
الجمـال
وترفـل
|
|
وكـــأن
مطبقـــة
البلاد
بعــدله
|
عــادت
فســيحاً
ليـس
فيـه
مجهـل
|
|
وكــأن
أنــوار
الكـواكب
ضـوعفت
|
مـن
نـور
غرتـه
الـتي
هـي
أجمـل
|
|
وكأنمــا
رفــع
الحجــاب
لنـاظر
|
فـرأى
الحقيقـة
فـي
الـذي
يتخيل
|
|
مــولاي
غاضــت
فكرتــي
وتبلــدت
|
منــي
الطبــاع
فكـل
شـيء
مشـكل
|
|
تســمو
إلـى
درك
الحقـائق
همـتي
|
فأصـــد
عــن
إدراكهــن
وأعــزل
|
|
وأجـد
ليلـي
فـي
امـتراء
قريحتي
|
وتعــود
غــوراً
بينمــا
تسترسـل
|
|
فــأبيت
يعتلــج
الكلام
بخــاطري
|
والنظــم
يشـرد
والقـوافي
تجفـل
|
|
مـن
بعـد
حـول
أنتقيـه
ولـم
يكن
|
فــي
الشـعر
حـولي
يعـاب
ويهمـل
|
|
فأصــونه
عــن
أهلــه
متواريــاً
|
أن
لا
يضـــمهم
وشـــعري
محفـــل
|
|
وهـي
البضـاعة
في
القبول
نفاقها
|
ســيان
فيهــا
الفحـل
والمتطفـل
|
|
وبنــات
فكــري
إن
أتتـك
كليلـة
|
مرهـاء
تخطـر
فـي
القصـور
وتخطل
|
|
فلهـا
الفخـار
إذا
منحـت
قبولها
|
وأنـا
علـى
ذاك
البليـغ
المقـول
|
|
وإليـك
مـن
سـير
الزمـان
وأهلـه
|
عــبراً
يـدين
بفضـلها
مـن
يعـدل
|
|
صـحفاً
تـترجم
عـن
أحـاديث
الألـى
|
غــبروا
فتجمــل
عنهــم
وتفصــل
|
|
تبـدي
التبـابع
والعمـالق
سـرها
|
وثمـــود
قبلهـــم
وعـــاد
الأول
|
|
والقــائمون
بملــة
الإســلام
مـن
|
مضــر
وبربرهــم
إذا
مـا
حصـلوا
|
|
لخصــت
كتــب
الأوليــن
لجمعهــا
|
وأتيـت
أولهـا
بمـا
قـد
أغفلـوا
|
|
وألنـــت
حوشـــي
الكلام
كأنمــا
|
شــرد
اللغـات
بهـا
لنطقـي
ذلـل
|
|
أهــديت
منــه
إلـى
علاك
جـواهراً
|
مكنونـــة
وكواكبـــاً
لا
تأفـــل
|
|
وجملتــه
لصــوان
ملكــك
مفخـرا
|
يبـأى
النـدي
بـه
ويزهـو
المحفل
|
|
واللــه
مـا
أسـرفت
فيمـا
قلتـه
|
شــيئاً
ولا
الاســراف
ممــا
يجمـل
|
|
ولأنـت
أرسـخ
فـي
المعـارف
رتبـة
|
مـــن
أن
يمــوه
عنــده
متطفــل
|
|
فملاك
كــــل
فضـــيلة
وحقيقـــة
|
بيــديك
تعـرف
وضـعها
إن
بـدلوا
|
|
والحــق
عنـدك
فـي
الأمـور
مقـدم
|
أبــداً
فمــاذا
يــدعيه
المبطـل
|
|
واللــه
أعطــاك
الـتي
لا
فوقهـا
|
فـاحكم
بمـا
ترضـى
فـأنت
الأعـدل
|
|
أبقــاك
ربــك
للعبــاد
تربهــم
|
فــالله
يخلقهــم
ورعيــك
يكفـل
|