هــزت
الــزوراء
أعطــاف
الصـفا
|
وصــفت
لـي
رغـدة
العيـش
الهنـي
|
فــارع
مـن
عهـدك
مـا
قـد
سـلفا
|
وأعـــد
يـــا
فتنــة
المفتتــن
|
عــارض
الشــمس
جبينــاً
وجــبين
|
لنـــرى
أيكمـــا
أســـنى
ســنا
|
واسـب
فـي
عطفـك
عطـف
الياسـمين
|
وانثن
إذا
غصناً
إذا
الغصن
انثنى
|
حبــذا
لـو
قلبـك
القاسـي
يليـن
|
إنمـــا
قـــدك
كـــان
الألينــا
|
فــانعطف
غصـناً
إذا
مـا
انعطفـا
|
قـــدك
المهـــزوز
هــز
الغصــن
|
إن
فـــي
خـــديك
روضــاً
شــغفا
|
مقلــة
الــرائي
وكــف
المجتنـي
|
يـا
غـزال
الكـرخ
وأوجـدي
عليـك
|
كـــاد
ســري
فيــك
أن
ينهتكــا
|
هــذه
الصــهباء
والكــاس
لـديك
|
وغرامـــي
فــي
هــواك
احتنكــا
|
فاسـقني
كأسـاً
وخـذ
كأسـاً
إليـك
|
فلذيـــذ
العيـــش
أن
نشـــتركا
|
أتــرع
الأقــداح
راحــاً
قرقفــا
|
واسـقني
واشـرب
أو
اشـرب
واسقني
|
ولمــاك
العــذب
أحلــى
مرشــفا
|
مــن
دم
الكــرم
ومــاء
المــزن
|
مــن
طلا
فيهــا
النــدي
ابتسـما
|
إذ
سـرت
تـارج
فـي
نشـر
العـبير
|
أطلعـــت
شــمس
ســماها
أنجمــا
|
مــن
حبــاب
ولهـا
البـدر
مـدير
|
فاســــما
أرض
أو
الأرض
الســـما
|
إذ
غــدت
تلــك
كهــذي
تســتنير
|
فـــي
ربــوع
ألبســتها
مطرفــا
|
أنمـل
الزهـر
مـن
الوشـي
السـني
|
وحمـــام
البشــر
فيهــا
هتفــا
|
معربــاً
فــي
لحنــه
لــم
يلحـن
|
وحميـــا
الكـــاس
لمــا
صــفقت
|
أخـــذت
تجلــى
عروســاً
بيــديه
|
خلتهــا
فــي
ثغــره
قــد
عتقـت
|
زمنــاً
واعتصــرت
مــن
وجنــتيه
|
مــن
بــروق
بالثنايــا
ائتلقـت
|
فــي
عقيـق
الجـزع
أعنـي
شـفتيه
|
كشــفت
ســتر
الــدجى
فانكشــفا
|
وانجلـــى
الأفـــق
بصــبح
بيــن
|
أكســــبتنا
ســــقتنا
نطفــــا
|
خفـــة
الطبـــع
وثقــل
الألســن
|
ســـلها
حمـــراء
مــن
إبريقــه
|
بســنا
تحســبها
نــار
الفريــق
|
وغـــدا
يمزحهـــا
مـــن
ريقــه
|
حبـــذا
مـــزج
رحيـــق
برحيــق
|
رقصـــت
بالـــدن
مــن
تصــفيقه
|
حببــاً
كالــدر
فـي
ذوب
العقيـق
|
رســـب
اليــاقوت
فيهــا
وطفــا
|
فــوقه
لؤلــؤه
الرطــب
الســني
|
مــا
رآهــا
الــبرق
إلا
انشـغفا
|
بســــناها
شــــغف
المفتتــــن
|
أنـت
يـا
روح
المنـى
روحـي
فداك
|
مســـقمي
حبــاً
ومــبرمي
ســقمي
|
أتشــكي
لــك
مــن
ســيف
جفــاك
|
لا
تبــح
يــا
مـانع
الريـق
دمـي
|
قــد
شــربت
الخمـر
لكـن
كلمـاك
|
مـــا
رأت
عينـــي
ولا
ذاق
فمــي
|
لــو
بــه
ابتـل
غليلـي
لا
نطقـا
|
لا
بـــــدمعٍ
حــــره
أشــــعلني
|
كلمـــا
كفكفـــت
منـــه
وكفــا
|
فـــوق
خـــدي
وكيـــف
المـــزن
|
أصــبحت
روحــي
فــي
مثـل
الخلال
|
إذا
تلاشــى
الجســم
فــي
علتــه
|
وأنـا
أصـبحت
روحي
في
مثل
الخلال
|
إذ
تلاشـــى
الجســم
فــي
علتــه
|
وأنــا
أصــبحت
عـن
شخصـي
مثـال
|
بـــارزاً
للنـــاس
فــي
صــورته
|
مــن
رآنـي
خـالني
طيـف
الخيـال
|
واعـــتراه
الشــك
فــي
يقظتــه
|
لا
تســـلني
عــن
نحــولي
فجفــا
|
ناحـــل
الأجفــان
قــد
أنحلنــي
|
مــن
لــذي
جســم
عليــل
نحفــا
|
بــالهوى
ليــت
الهـوى
لـم
يكـن
|
مــن
رشــاً
لمــا
تبــدى
رايعـاً
|
أشـــرق
افـــتر
تثنـــي
نفــرا
|
قمـــراً
تمـــاً
وبرقـــاً
لامعــاً
|
وقنـــاً
لــدناً
وظبيــاً
أغفــرا
|
إن
بـــدا
الربيـــع
اليانعـــا
|
وعــن
الزهــر
المنــدى
أســفرا
|
خـــده
والصــدغ
فيــه
اكتنفــا
|
وردة
محفوفــــة
فــــي
سوســـن
|
أو
شــــقيق
فـــوقه
الآس
ضـــفا
|
أو
كمـــي
متـــقٍ
فـــي
جوشـــن
|
أو
هــو
الـديباج
زرتـه
الحسـان
|
فــي
قميــص
مــن
حريــر
أخضــر
|
أو
هـو
اليـاقوت
فـي
عقد
الجمان
|
نــاطه
الزنجــي
فــوق
المنجــر
|
أو
هـو
الجمـر
ذكـا
بيـن
الدخان
|
أو
هــو
الكــافور
تحـت
العنـبر
|
أو
هــو
الــدينار
حيـن
انصـرفا
|
فـــي
يميـــن
الحبشــي
الأدكــن
|
أو
هــو
المريــخ
شــق
الســدفا
|
وتـــراءى
فـــي
الظلام
المــردن
|
قرطــــوه
بالثريـــا
والأثيـــر
|
ولــووا
فــي
جيــده
طـوق
الهلال
|
وكســـوه
دون
موشـــي
الحريـــر
|
قمـــص
العــز
وأبــراد
الــدلال
|
وجلــوه
جلــوة
البــدر
المنيـر
|
قمــراً
يشــرق
فـي
بـرج
الجمـال
|
كســروي
الشــكل
رومــي
القفــا
|
يوســفي
الحســن
صــلت
المرســن
|
قلبــه
ينحــت
مــن
صــم
الصـفا
|
وجنــى
وجنتــه
الــورد
الجنــي
|
أنــا
أســاد
الشــر
دون
الشـرى
|
تتقينــــي
فلمــــاذا
أتقيـــه
|
مـن
مريـض
الجفـن
كـم
قـد
شـهرا
|
صــارماً
فيــه
حمــى
رشـفة
فيـه
|
ودمــــي
طـــل
لـــديه
هـــدرا
|
أتـــراه
أن
ودي
القتــل
يــديه
|
مــا
لــه
ســاق
لجسـمي
التلفـا
|
وهـو
فـي
شـرع
الهـوى
لـم
يضـمن
|
لا
تقـــل
يحكـــم
فينــا
جنفــا
|
إنــــه
أدرى
بهــــذي
الســـنن
|
وافـــر
الأرداف
أبـــدت
نقصـــه
|
بــدقيق
الخصــر
إذ
رجــت
لـديه
|
مـــا
تـــأملت
بعينـــي
شخصــه
|
غيــرةً
مــن
نظـرة
العيـن
عليـه
|
ولــو
اســتطاعت
لكــانت
قمصــه
|
أعيـــن
مـــا
نظــرت
إلا
إليــه
|
إنهـــا
منـــذ
تـــولى
وجفـــا
|
هجـــرت
حـــتى
لذيـــذ
الوســن
|
أنــا
أهـوى
أنـا
يراهـا
مألفـاً
|
لتقيـــه
أعينـــي
مــن
أعينــي
|
ملـــك
بالحســن
أضــحى
معجبــاً
|
وهــو
لا
يحكــم
إلا
فــي
القلـوب
|
إن
جنــى
ذنبــاً
تجنــى
مغضــبا
|
ولــه
مــن
ذنبــه
نحــن
تنــوب
|
مــن
رأى
قبلــك
يـا
غـض
الصـبا
|
مــذنباً
يجــزي
بـريئاً
بالـذنوب
|
قلـــت
إذ
مـــر
بقـــد
أهيفــا
|
ومـــن
الدهشـــة
مــا
يخرســني
|
أيهــا
الســاكن
قلــبي
مألفــا
|
كيـــف
ترضــى
بحريــق
المســكن
|
فاحــد
بـالركب
إذا
الركـب
حـدا
|
فيــه
يومـاً
وأقـم
مـا
أن
أقـام
|
يممــن
نجــداً
إذا
مــا
أنجــدا
|
وإذا
أتهـــم
فالمســـرى
تهــام
|
وهــو
أن
يشــهد
فــأم
المشـهدا
|
وســـلام
لـــك
مــن
دار
الســلام
|
إن
ثــوى
جســمي
فحــل
النجفــا
|
ففـــؤادي
عنـــده
لـــم
يظعــن
|
أيــن
مــن
حلــو
بجمـع
والصـفا
|
مـــن
مقيـــم
بــالغري
الأيمــن
|
أيهـــا
العــذال
كفــو
عــذلكم
|
بــالهوى
العــذري
عـذري
اتضـحا
|
وامنحــوا
يـا
أهـل
نجـد
وصـلكم
|
مســــتهاماً
يتشـــكى
البرحـــا
|
واذكرونـــي
مــن
ذكــراي
لكــم
|
رب
ذكـــرى
قلبـــت
مــن
نزحــا
|
الوفـا
يـا
عـرب
يـا
أهـل
الوفا
|
لا
تخونــوا
عهــد
مــن
لـم
يخـن
|
لا
تقولـــوا
صــدع
عنــا
وجفــا
|
عنـــدكم
روحــي
وعنــدي
بــدني
|
أنــا
مــا
حــولت
عنــد
شــغفي
|
لا
ولا
مــن
ســكرتي
فيكــم
صـحوت
|
عنكــم
لــم
أسـل
فـي
شـيءٍ
وفـي
|
قربكــم
عـن
كـل
شـيء
قـد
سـلوت
|
ليــس
فـي
الـدنيا
صـفي
أو
وفـي
|
أنــا
قــد
جربــت
جيلـي
وبلـوت
|
فلكـــم
جبـــت
إليكــم
نفنفــا
|
طالبـــاً
أو
انكــم
مــن
وطنــي
|
فحفــت
عيســي
ومـن
بعـد
الحفـا
|
لــم
تجــد
بـالربع
غيـر
الـدمن
|
يــا
معيســيل
اللمـى
خـذ
بيـدي
|
أنــا
فــي
حبــك
مشــبوب
غريـق
|
بـــت
أستشـــفي
بــدمعي
كبــدي
|
كيـــف
يستشــفى
حريــق
بحريــق
|
فخـــذوا
دمعـــي
وردوا
كمـــدي
|
ليــس
لـي
فيكـم
رفيـق
أو
فريـق
|
أســفاً
مــن
أهــل
نجــد
أســفا
|
كيــف
أهــواهم
وهــم
مـن
زمنـي
|
وإذا
نبـــت
البطـــاح
اختلفــا
|
غلـب
الشـوك
علـى
الـورد
الجنـي
|
لا
تخــل
ويــك
ومــن
يسـمع
يخـل
|
أننــي
بــالراح
مشـغوف
الفـؤاد
|
أو
بمهضـوم
الحشـا
سـاهي
المقـل
|
أخلجــت
قــامته
ســمر
الصــعاد
|
أو
بربــــات
خــــدور
وكلــــل
|
يتفنـــــن
بقـــــرب
وبعــــاد
|
إن
لــي
مــن
شــرفي
بـرداً
ضـفا
|
هــو
مــن
دون
الهــوى
مرتهنــي
|
غيــر
أنــي
رمــت
نهـج
الظرفـا
|
عفـــة
النفـــس
وفســق
الألســن
|
لســت
بالغيــد
مشــوقاً
مغرمــا
|
لا
ولا
استســـــقيتهن
الأكؤســــا
|
أو
تصـــبيني
الغــواني
بعــدما
|
حــاك
لــي
مــبيض
فـودي
برنسـا
|
فــابغ
مــن
حزمـك
طرفـاً
ملجمـا
|
إذ
غــدت
خيــل
التصــابي
شمسـا
|
وإلــه
واســل
ويــك
عمـن
سـلفا
|
عهـــده
حــتى
كــأن
لــم
يكــن
|
أن
يخنــك
الصــبر
فــالأنس
وفـى
|
يـوم
تزويـج
الفـتى
عبـد
الغنـي
|
سـعد
بالسـعد
انجلـى
قطر
العراق
|
مــالئاً
بالبشــر
أقطــار
الملا
|
وحميــا
الكــاس
تجلــو
الرفـاق
|
وبهــــا
مجلــــس
أنســـي
كملا
|
فاسـقني
أسـقيت
بالكـأس
الـدهاق
|
أننـــا
اليـــوم
بلغنــا
الأملا
|
فاتــل
مــن
غـر
القـوافي
صـحفا
|
مــا
يعيهــا
القلــب
قبـل
الأذن
|
حاليـــات
بتهـــاني
المصـــطفى
|
وأخـــي
الحمــد
أخيــه
الحســن
|
عارضــــاً
عـــافٍ
وروضـــاً
رائد
|
نبتــاً
مـن
قبـل
نبـت
العارضـين
|
أملاً
راجٍ
وغيظــــــاً
حاســــــد
|
مــن
رأى
الغيظيـن
كانـا
أمليـن
|
مـــا
تعـــدى
واحـــد
ع
واحــد
|
بــاقتران
كــاقتران
الفرقــدين
|
جريــا
مجراهمــا
مــا
اختلفــا
|
مســـتقلين
معـــاً
فـــي
ســـنن
|
لا
يــــزل
شــــملهما
مؤتلفـــا
|
أبـــد
الـــدهر
وعمــر
الزمــن
|
قـل
لشـاني
المصـطفى
كنـت
الفدا
|
للـــذي
ترهـــب
مـــن
أنصـــله
|
ملـــك
مــا
إن
تجلــى
أو
بــدا
|
ســـجد
الـــدهر
علـــى
أرجلــه
|
وإذا
غاضـــت
ينـــابيع
النــدى
|
أخـــذت
تمتـــاح
مـــن
أنملــه
|
والحيــا
مــن
راحــتيه
اغترفـا
|
فســــقى
الأرض
بغيــــث
هتــــن
|
تحســـب
التـــبر
لــديه
خزفــا
|
بـــاذلاً
مــا
يقتنــه
المقتنــي
|
يتبـــع
الهمـــة
ماضــي
عزمــه
|
فيــرى
الأبعــد
أدنـى
مـا
ينـال
|
ونـــزاه
هينـــا
فـــي
ســـلمه
|
وإذا
ناضـــل
يصـــمي
بالنضــال
|
لا
تهـــال
الحـــرب
إلا
باســـمه
|
وهـو
مـن
حـرب
الضـواري
لا
يهـال
|
يســم
الصــعب
إذا
مــا
أرجفــا
|
ســـمة
الــذل
إلــى
أن
ينثنــي
|
لــو
بشــم
الراســيات
اعتكفــا
|
واختفـــى
خـــائفه
لــم
يــأمن
|
وأخــوه
القــرم
وقــاد
الــذكا
|
كــاد
أن
يهتــك
أسـتار
الغيـوب
|
كلمـــا
صـــوب
فكـــراً
أدركــا
|
خـالص
الـرأي
مـن
الـرأي
المشوب
|
قــد
بــراه
اللَــه
ملكـاً
ملكـا
|
طيــب
الأعــراق
تهــواه
القلـوب
|
جـاء
فـي
الحلـم
يضـاهي
الأحنفـا
|
وحجــىً
رضــوى
بــه
لــم
يــوزن
|
وذكـــاءً
وتقـــىً
مـــا
عرفـــا
|
لأيــــاس
و
أويــــس
القرنــــي
|
ترجمــت
خلقــك
لـي
ريـح
الصـبا
|
مــذ
ســرى
طبعــك
فـي
أنفاسـها
|
فســـرت
تفضــح
أزهــار
الربــى
|
بشــذىً
فــاق
الشــذى
مـن
آسـها
|
كـــاد
لــولا
شــأنه
أن
يشــربا
|
طبعــك
المصـبي
الطلا
فـي
كاسـها
|
بمـــراس
لـــك
لــو
لان
الصــفا
|
ملمســـاً
ملمســـه
لـــم
يلـــن
|
وشـــبا
عـــزم
يفــل
المرهفــا
|
ويقــود
الصــعب
قــود
المــذعن
|
أنتمـا
مـن
أسـرة
المجـد
الأثيـل
|
مــا
تخطــى
بعضــهم
عـن
بعضـهم
|
ورثــوا
المجـد
قـبيلاً
عـن
قبيـل
|
وتعــــاطوه
تعــــاطي
فرضـــهم
|
وإذا
مــا
أجـدب
الربـع
المحيـل
|
أخصــبت
جــوداً
مغــاني
أرضــهم
|
هــذه
العليــاء
لا
مــا
زخرفــا
|
مـــن
أســـانيد
دنـــيٌّ
لـــدني
|
شــــرفاً
آل
المعـــالي
شـــرفا
|
فيكـــم
أشـــرق
وجـــه
الزمــن
|
كــانت
الــدنيا
جمــاداً
يبســا
|
فســـقوها
وهــم
أنــدى
المــزن
|
بيــد
قــد
عــم
حيــن
انبجســا
|
ســيبها
أهــل
الصـحاري
والمـدن
|
وأبــــي
لــــولاكم
لا
ندرســــا
|
مربــع
العليـاء
لا
بـل
لـم
يكـن
|
وغــدا
المعــروف
قاعــاً
صفصـفا
|
ليــس
فــي
مغنــاه
غيـر
الـدمن
|
نتـــم
جـــددتموه
مـــذ
عفـــا
|
وأبنتــم
منــه
مــا
لــم
يبــن
|
أنتــم
النــاس
بلــى
ثــم
بلـى
|
والأيــادي
الــبيض
أقــوى
حجــج
|
أنتـــم
النـــاس
فخـــاراً
وعلا
|
وســـواكم
مـــن
ســوام
الهمــج
|
عطــل
الأجيــاد
مــن
كــل
حلــى
|
لــم
يســيروا
للعلـى
فـي
منهـج
|
حــاولوا
العـز
فنـالوا
الصـلفا
|
وتولــــوا
باشــــتباه
بيــــن
|
ســيري
الـرائي
إذا
مـا
انكشـفا
|
ذلـــك
الســر
انكشــاف
العلــن
|
فــرس
العليــاء
مــانفكت
جمـوح
|
لــم
تــرض
ظهــراً
لمـن
يركبهـا
|
كــم
رأت
مـن
جسـد
مـا
فيـه
روح
|
فرمتــــه
مــــا
دري
مـــذهبها
|
لا
تغرنـــك
أجســـاد
إلا
خزفـــا
|
أي
ومـــن
فـــي
فضــله
ســددني
|
ســل
عــن
العســجد
منـي
صـيرفا
|
إننــي
أدري
بمــا
فــي
معــدني
|
لا
تؤمـــل
مـــن
لئيـــم
كرمــا
|
ليـــس
للطـــرف
دخـــان
طيـــب
|
وإذا
اســـتجديت
يومـــاً
ديمــا
|
فـــاختبر
أي
الغمـــام
الصــيب
|
دع
أناســاً
قــد
تصــدوا
برمــا
|
وهـــم
فــي
جــب
جهــل
غيبــوا
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قـــد
تـــود
الأرض
أن
تنخســـفا
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وهـــم
فـــي
ظهرهـــا
كالبــدن
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لــم
تجـد
فلـي
مـائهم
قـط
صـفا
|
لا
ولا
فــي
الكــأس
غيــر
الـدرن
|
أنتــم
القــوم
الــذين
اتســعا
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فــي
معــاليهم
مجــال
الشــعرا
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حــاولوا
حصــراً
لهــا
فامتنعـا
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وأبــت
شــهب
الســما
أن
تحصـرا
|
ســلم
الفضــل
لكــم
لـو
أنصـفا
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مســـــتبد
بلجـــــاج
بيـــــن
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ذاك
لــو
أصــغى
لشـعري
انكسـفا
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وتلــــوي
كتلــــوي
المحجــــن
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يــا
أبـا
الهـادي
ومـا
أملحهـا
|
كنيـــةً
تحلـــو
مــذاقاً
بفمــي
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هاكهـــا
غـــراء
قـــد
وشــحها
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لؤلـــؤ
لـــولاك
لـــم
ينتظـــم
|
أملـــت
منـــك
بـــأن
تمنحهــا
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بقبـــول
منــك
يــا
ذا
الشــيم
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لــم
أقــل
مــا
قلــت
إلا
شـغفا
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بــك
يــا
حليــة
جيــد
الزمــن
|
ليــس
قصــدي
وقصــيدي
اختلفــا
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أنــا
مــن
وافــق
ســري
علنــي
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